डी.एन.ए. की खोज की कहानी बहुत नयी नहीं है, यह यात्रा उन्नींसवीं शताब्दी में शुरु हुयी थी। जब लोग जीन्स और आनुवाँशिकता के स्त्रोत के बारे में जिज्ञासु थे, और बहुत कुछ जानते भी नहीं थे। 1860 के बाद तक जीन रहस्यमयी ब्लैक-बॉक्स से कम नहीं था। लोग सोचते थे कि जीन प्रोटीन से मिलकर बना होना चाहिये। क्रोमोसोम में वास्तव में कुछ रहस्यमयी ही था, जिसे न्यूक्लिक एसिड यानि डी.एन.ए. के रूप में पहचाना गया। डी.एन.ए. को मानव शरीर से सबसे पहले स्वीडन के एक डॉक्टर फ़्रेडरिक मिशचर ने पृथक किया था। 1869 में डॉ. मिश्चर जर्मनी के ट्यूबिंगन शहर में घायल सैनिकों का इलाज़ और कुछ व्यक्तिगत शोध कर रहे थे। वहीं उन्होंने एक घायल सैनिक की पट्टी में लगे मवाद से उस सैनिक मरीज़ का डी.एन.ए. पृथक किया था। डॉ. मिशचर का अन्दाज़ा था कि शायद डी.एन.ए. ही आनुवाँशिकता की कुँजी है और यह आनुवाँशिकता की भाषा को उसी तरह दर्शा सकता है जैसे कि किसी भाषा के 20-30अक्षरों के ज़रिये पूरी भाषा का आधार तय होता है। लेकिन, डॉ. मिशचर इसे व्यक्तिगत विश्वास ही रख पाये और तब इस सम्बन्ध में कोई बड़ी खोज नहीं हुयी। साल दर साल बीतते चले गये।
बींसवी शताब्दी में जेम्स वाटसन नामक एक युवा वैज्ञानिक था जो यह मानता था कि जीन प्रोटीन से नहीं बल्कि डी.एन.ए. से बने होते हैं, लेकिन विज्ञान और व्यक्तिगत विश्वास में तब तक कोई सम्बन्ध होता जब तक व्यक्तिगत विश्वास को ठोस भौतिक आधारों पर सही न सबित कर दिया जाये। अपने व्यक्तिगत विश्वास को सही साबित करने के लिये जेम्स वाटसन कई संस्थानों से होते हुये और असंतुष्ट होकर सही संस्थान और साथियों की खोज में कैवेन्डिश लेबोरेटरी पहुँचा, जहाँ उसकी मुलाकात उसी के स्तर की प्रतिभा वाले युवा वैज्ञानिक “फ़्राँसिस क्रिक” से हुई। फ़्राँसिस क्रिक तब तक पैतीस साल का हो चुका था और उसके पास अब तक पी.एच.डी. की डिग्री भी नहीं थी। जिस इन्स्ट्रुमेंट यानि वैज्ञानिक उपकरण पर वह काम करके, गर्म जल की अत्यधिक दबाव की स्थिति में श्यानता(Viscosity) मापना चाह रहा था, वह उपकरण जर्मनी के द्वारा उसके विश्वविद्यालय में की गयी बमबारी में ध्बस्त हो गया था। यह बात द्वितीय विश्व युद्ध की है। परेशान होकर वह भौतिकी के साथ साथ जीवविज्ञान में भी रुचि लेने लगा। उसकी आदत थी कि वह अपनी परेशानियों से ज़्यादा दूसरों की परेशानियों की फ़िक्र किया करता। इसी आदत ने उसे जीन और डी.एन.ए. से परिचित करवाया। इसी के साथ जब तेजस्वी और जीवविज्ञान की समझ रखने वाला अमेरिकी “जेम्स वाटसन” और मेधावी, भौतिकी की समझ रखने वाला, मगर लक्ष्य हीन ब्रिटिश “फ़्राँसिस क्रिक” की जोड़ी बनी तो यह जोड़ी वैज्ञानिक इतिहास की सबसे बेहतरीन और सफ़ल जॊड़ी के रूप में उभरकर सामने आयी। इसी जोड़ी ने सन 1953 में डी.एन.ए. की संरचना की खोज की घोषणा की। “क्रिक” ने एक कार्यक्रम में खुश होकर कहा था “हमने जीवन का रहस्य खोज लिया है” । लेकिन “वाट्सन” को अब भी यह डर था कि उन लोगों से कोई बड़ी भूल तो नहीं हो गई है जिसके कारण इतने सनसनीखेज परिणाम आ रहे हैं। निश्चित रूप से वे लोग गलत नहीं थे और जीव विज्ञान के एक नये काल की शुरुआत हो चुकी थी। बाद में पता लगा कि डी.एन.ए. में एक कोड होता है जो कि दोहरी कुँडली में सीढियों की तरह सजा रहता है। इस रहस्यमयी कोड को डिकॊड यानि कि इसका रहस्य समझने की काफ़ी कोशिश की गयी। कई असफ़लताओं के बाद दो वैज्ञानिकों “मार्शल नीरेनबर्ग” और “जॉन मथाई” ने डी.एन.ए. की कोडिंग का रहस्य खोज लिया। यह भी वैज्ञानिक दुनियाँ की एक सनसनीखेज घटना थी। सन 1965, तक डी.एन.ए. के सभी कोड जाने जा चुके थे और इस तरह नये आनुवाँशिकी युग का नीव रखी जा चुकी थी।
बींसवी शताब्दी में जेम्स वाटसन नामक एक युवा वैज्ञानिक था जो यह मानता था कि जीन प्रोटीन से नहीं बल्कि डी.एन.ए. से बने होते हैं, लेकिन विज्ञान और व्यक्तिगत विश्वास में तब तक कोई सम्बन्ध होता जब तक व्यक्तिगत विश्वास को ठोस भौतिक आधारों पर सही न सबित कर दिया जाये। अपने व्यक्तिगत विश्वास को सही साबित करने के लिये जेम्स वाटसन कई संस्थानों से होते हुये और असंतुष्ट होकर सही संस्थान और साथियों की खोज में कैवेन्डिश लेबोरेटरी पहुँचा, जहाँ उसकी मुलाकात उसी के स्तर की प्रतिभा वाले युवा वैज्ञानिक “फ़्राँसिस क्रिक” से हुई। फ़्राँसिस क्रिक तब तक पैतीस साल का हो चुका था और उसके पास अब तक पी.एच.डी. की डिग्री भी नहीं थी। जिस इन्स्ट्रुमेंट यानि वैज्ञानिक उपकरण पर वह काम करके, गर्म जल की अत्यधिक दबाव की स्थिति में श्यानता(Viscosity) मापना चाह रहा था, वह उपकरण जर्मनी के द्वारा उसके विश्वविद्यालय में की गयी बमबारी में ध्बस्त हो गया था। यह बात द्वितीय विश्व युद्ध की है। परेशान होकर वह भौतिकी के साथ साथ जीवविज्ञान में भी रुचि लेने लगा। उसकी आदत थी कि वह अपनी परेशानियों से ज़्यादा दूसरों की परेशानियों की फ़िक्र किया करता। इसी आदत ने उसे जीन और डी.एन.ए. से परिचित करवाया। इसी के साथ जब तेजस्वी और जीवविज्ञान की समझ रखने वाला अमेरिकी “जेम्स वाटसन” और मेधावी, भौतिकी की समझ रखने वाला, मगर लक्ष्य हीन ब्रिटिश “फ़्राँसिस क्रिक” की जोड़ी बनी तो यह जोड़ी वैज्ञानिक इतिहास की सबसे बेहतरीन और सफ़ल जॊड़ी के रूप में उभरकर सामने आयी। इसी जोड़ी ने सन 1953 में डी.एन.ए. की संरचना की खोज की घोषणा की। “क्रिक” ने एक कार्यक्रम में खुश होकर कहा था “हमने जीवन का रहस्य खोज लिया है” । लेकिन “वाट्सन” को अब भी यह डर था कि उन लोगों से कोई बड़ी भूल तो नहीं हो गई है जिसके कारण इतने सनसनीखेज परिणाम आ रहे हैं। निश्चित रूप से वे लोग गलत नहीं थे और जीव विज्ञान के एक नये काल की शुरुआत हो चुकी थी। बाद में पता लगा कि डी.एन.ए. में एक कोड होता है जो कि दोहरी कुँडली में सीढियों की तरह सजा रहता है। इस रहस्यमयी कोड को डिकॊड यानि कि इसका रहस्य समझने की काफ़ी कोशिश की गयी। कई असफ़लताओं के बाद दो वैज्ञानिकों “मार्शल नीरेनबर्ग” और “जॉन मथाई” ने डी.एन.ए. की कोडिंग का रहस्य खोज लिया। यह भी वैज्ञानिक दुनियाँ की एक सनसनीखेज घटना थी। सन 1965, तक डी.एन.ए. के सभी कोड जाने जा चुके थे और इस तरह नये आनुवाँशिकी युग का नीव रखी जा चुकी थी।
इन सब खोजों का जैविकी के नज़रिये से बहुत महत्व था और ये खोजें बहुत क्रांतिकारी और सनसनी के रूप में आविष्कारित हुयीं थी, मगर फिर भी इन खोजों का मानव की अद्वितीय पहचान से कोई सम्बन्ध नहीं था। सन 1985 तक यह सिद्ध नहीं हो पाया था कि हर व्यक्ति का डी.एन. ए. क्रम अलग अलग होता है, इसलिये यह धारणा प्रबल थी कि हर मानव का डी.एन.ए. क्रम (DNA sequence) समान होता है। सन 1985, में लिसेस्टर विश्व्वविद्यालय के डॉ. एलेक जेफ़री ने डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग की खोज करके एक बार फिर सनसनी फ़ैला दी। एलेक जैफ़री ने सिद्ध किया, कि हर एक का डी.एन.ए. क्रम किसी दूसरे से एकदम अलग होता है, चाहे जैविक रूप से वे एक दूसरे के सगे-सम्बन्धी ही क्यों ना हो। माँ और बेटा या भाई- भाई के डी.एन.ए. क्रम स्पष्ट रूप से अलग अलग होते हैं। यह बात और है कि बेटे के डी.एन.ए. क्रम माँ-पिता पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं मगर समान नहीं होते। इसी स्पष्टता और अद्वितीय विशेषताओं की फ़ोरेंसिक विज्ञान और स्पष्ट रूप से पहचान सुनिश्चित करने में ज़रुरत भी थी। यहीं से डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग की सहायता से मानव विशेष की पहचान का दौर शुरु हुआ। आज विश्व के लगभग हर देश के न्यायालय डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिग के साक्ष्यों कों सबसे ज़्यादा सटीक और विश्वस्यनीय मानते हैं। भारत विश्व का ऐसा तीसरा देश था जहाँ डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग को देश के न्यायालयों में उत्कृष्ट और सबसे अधिक विश्वस्यनीय साक्ष्य के रूप में मान्यता मिली थी और हमारे देश में अब तक कई बड़े और विवादास्पद मामले इस तकनीक से सुलझाये गये हैं।
इस तकनीक को भारत में इस मुकाम तक लाने में वैज्ञानिक और औद्यैगिक अनुसंधान परिषद के Center for Cellular and Molecular Biology, हैदराबाद के डॉ. लालजी सिंह को जाता है। डॉ. लालजी सिंह ने न सिर्फ़ भारत में बल्कि, डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक को बेहतर बनाने में सतत वैज्ञानिक स्तर पर योगदान दिया, साथ ही उन्होंने इस तकनीक को भारतीय न्यायालयों की न्यायप्रक्रिया में सहभागी बनाने में भी सक्रिय योगदान दिया, जिस कारण भारत इस तकनीक का न्यायालयों में उपयोग करने वाला अमेरिका और ब्रिटेन के बाद विश्व का तीसरा देश बना।
इस तकनीक को भारत में इस मुकाम तक लाने में वैज्ञानिक और औद्यैगिक अनुसंधान परिषद के Center for Cellular and Molecular Biology, हैदराबाद के डॉ. लालजी सिंह को जाता है। डॉ. लालजी सिंह ने न सिर्फ़ भारत में बल्कि, डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक को बेहतर बनाने में सतत वैज्ञानिक स्तर पर योगदान दिया, साथ ही उन्होंने इस तकनीक को भारतीय न्यायालयों की न्यायप्रक्रिया में सहभागी बनाने में भी सक्रिय योगदान दिया, जिस कारण भारत इस तकनीक का न्यायालयों में उपयोग करने वाला अमेरिका और ब्रिटेन के बाद विश्व का तीसरा देश बना।
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डी.एन.ए. क्रम विश्लेषण की तकनीक में अब इतनी प्रगति हो चुकी है कि रक्त की अल्प मात्रा या बाल की जड़ का टुकडा यानि उपयुक्त जीव की कोशिकाओं का छोटा सा टुकड़ा भी इन विश्लेषणों के लिये पर्याप्त है। अमेरिकी फ़ौज में हर नये सैनिक की भर्ती के समय ही उसका डी.एन.ए. सैम्पल ठंडे भंडारग्रहों में भंडारित कर लिया जाया है। जब कॊई सैनिक किसी युद्ध में मारा जाता है और उसकी पहचान उसके बिखर चुके टुकड़े टुकडे हो चुके शरीर से नहीं हो पाती है तो उस बिखरे हुये शरीर से कोशिकायें निकालकर उनका डी.एन.ए. विश्लेषण करवाकर, भंडार गृह में रखे गये सैम्पल्स से मिलान करवा कर मृतक सैनिक की सही पहचान की जाती है। आज इस तकनीक का इस्तेमाल पौधों की उत्कृष्ट संकरित प्रजातियाँ बनाने में या उनके उद्गम की सही पहचान में, जानवरों के लिंग परीक्षण और वन्य जीव संरक्षण में किया जाता है। इसके साथ ही इसका इस्तेमाल परिवारों के निजी मामलों को सुलझाने में जैसे- किसी बच्चे के असली पिता को पहचानने में, बच्चे के खो जाने की स्थिति में उसकी सही पहचान करने में या अस्तपालों में बच्चे के जन्म के समय बच्चा बदल जाने की स्थिति में सही माता पिता की सटीक पहचान में डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल भारत और विश्व में बड़ी विश्वस्यनीयता के साथ हो रहा है।
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--Meher Wan