Wednesday, April 20, 2011

नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन पर पुनरावलोकन


                                         
जापान में आये अत्यधिक तीव्रता के भूकंप और सुनामी ने दुनियाँ को तबाही के एक और मंज़र का गवाह बना दिया। इस भूकंप से जापान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है, यह जापान में आये अब तक के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से एक है। शक्तिशाली भूकंप आने से जमीन के अन्दर टेक्टोनिक प्लेटों में हुई उथल पुथल से समुद्र में हलचल हुई और यह सुनामी में परिवर्तित हो गई। इस प्राकृतिक आपदा के सबसे गम्भीर प्रभावों में से एक फ़ुकुशिमा नाभिकीय रियक्टर में धमाके होना था। भूकंप और सुनामी से प्रभावित क्षेत्र में यातायात, जल और बिजली आपूर्ति ठप हो गयी थी, जिस कारण से फ़ुकुशिमा नाभिकीय रियक्टर में ईंधन कॊ ठंडा रखने वाले शीतकों ने काम करना बंद कर दिया और नाभिकीय़ ईंधन में धमाके हुये। इन धमाकों से रियक्टरों की स्थिति लगातार बिगड़्ती चली गयी और फ़ुकुशिमा में स्थित नाभिकीय रियक्टरों में आंशिक “नाभिकीय मेल्ट्डाउन” की आशंका जताई जाने लगी। नाभिकीय मेल्त्डाउन या नाभिकीय गलाव किसी नाभिकीय रियक्टर की वह स्थिति होती है,  जब परमाणु विद्युत उत्पादन यंत्र पूरी तरह विफल हो जाता है। नाभिकीय गलाव की स्थिति में परमाणु रिक्टरों में प्रयुक्त शीतलक काम करना बंद कर देते हैं। शीतलक के निष्क्रिय होने पर यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे विखंडनकारी पदार्थ परमाणु भट्टी को अत्यंत गर्म कर देते हैं। ऐसा होने से रेडियो-सक्रिय किरणें वायुमंडल और वातावरण में फैलकर जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों को घातक हानि पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि परमाणु भट्टी या परमाणु भवन इस्पात, कंक्रीट से पूरी तरह वायुबंद बनायी जाती है, जिसकी दीवार डेढ़ से ढाई मीटर मोटी होती है।  जापान के फ़ुकुशिमा स्थित परमाणु केन्द्र में छह परमाणु रियक्टर्स हैं। फ़ुकुशिमा परमाणु केन्द्र दुनियाँ के पन्द्रह सबसे बड़े परमाणु केन्द्रों में से एक है। इन रियक्टर्स में हो रहे धमाकों के बाद यह तक कहा जाने लगा कि हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु हमले के बाद जापान दूसरी नाभिकीय विभीषिका का सामना करने जा रहा है। हालाँकि बाद में जापान के वैज्ञानिकों ने स्थिति पर अनुमानित समय सीमा से बहुत पहले काफ़ी हद तक काबू पाकर अन्य देशों के सामने मिसाल पेश की। मगर इस परिघटना ने एक बार फिर वैज्ञानिकों और नीतिनिर्धारकॊं के समक्ष कई महत्वपूर्ण और गम्भीर सवाल खड़े कर दिये, जिनसे नीतिनिर्धारक लगातार स्वयं को बचाते चले आ रहे थे।
हमारी औद्यौगिक सभ्यता का सबसे बड़ा आधार ऊर्जा है, जिसमें 85% योगदान जीवाश्म ईंधनों, कोयला, खनिज तेल एवं पेट्रोलियम गैस का है। कोयला का औद्योगिक क्षेत्र में सबसे पहले प्रयोग ब्रिटेन में तब शुरु हुआ जब वहाँ के जंगल उदयीमान औद्यौगिक क्षेत्र की ऊर्जा ज़रुरतों की पुर्ति नहीं कर पा रहे थे। कोयला विश्व के लगभग भागों में पाया जाता है और यह कई शताब्दियों तक हमारी ज़रूरते पूरी करेगा। पेट्रोलियम ने कोयले का स्थान उन्नीसवीं सदी में ले्ना शुरु किया और पेट्रूलियम का प्रयोग लगातार बढ़ता ही गया। खपत की वर्तमान दर से अगर अनुमान लगाया जाये तो पेट्रोलियम अगले कुछ और दशकों तक ही हमारी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है। साथ ही खनिज तेल के स्त्रोत भी कुछ राजनीतिक रूप से अस्थिर समझे जाने वाले देशों में ही सीमित हैं। अतः खनिज ईंधनों का संरक्षण मात्र ऊर्जा समस्या का समाधान नहीं है, यह समस्या को मात्र टालना है। आँकड़ों के आधार पर, खनिज तेलॊं के दहन से वातावरण में प्रति वर्ष 2.30 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं, यानि कि लगभग 730 टन प्रति सेकेन्ड। इस कार्बन उत्सर्जन का आधा भाग पेड़-पौधों और समुद्रों द्वारा सोख लिया जाता है, शेष लगभग उत्सर्जित भाग से हमारा पर्यावरण गम्भीरता से प्रभावित होता है। वर्तमान में ऊर्जा के वैकल्पिक और नवीकरणीय साधन जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ईंधन या भूतापीय ऊर्जा औद्यगिक क्षेत्र की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में पूरी तरह से समर्थ नहीं हैं, और इस क्षेत्रों में अभी शोध की महती सम्भावनायें हैं। ऐसे में नाभिकीय ऊर्जा को, ऊर्जा की वर्तमान ज़रुरतों को पूरा करने वाले विकल्प के तौर पर माना जाने लगा था।
नाभिकीय ऊर्जा निश्चित रूप से स्वच्छ, विश्वस्यनीय, संहत, प्रतिस्पर्धा योग्य, और कभी खत्म ना होने वाले ऊर्जा के विकल्प की रूप में उभर कर सामने आया। वर्तमान में इस ऊर्जा को अस्तित्व में आये लगभग पचास साल से भी अधिक हो गये हैं, अतः कुछ लोग इसे ऊर्जा का विकसित विकल्प भी कहने लगे हैं। नाभिकीय ऊर्जा के तमाम सकारात्मक पहलू हैं। जिनमें से कुछ का ज़िक्र हम यहाँ कर सकते हैं। नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में कार्बन डाई ऑक्साइड, सल्फ़र डाई ऒक्साइड जैसी वायुमण्डल के लिये हानिकाराक गैसें उत्सर्जित नहीं होतीं हैं, जो कि खनिज तेलों के दहन में मुख्यता से उत्सर्जित होतीं हैं। नाभिकीय रियक्टर्स लगभग हमेशा क्रियान्वित रहते हैं। इनमें ऊर्जा उत्पादन तभी रुकता है जब इनमें ईंधन भरा जाता है। सौर ऊर्जा के स्त्रोत दिन के समय ही काम करते हैं और पवन ऊर्जा के स्त्रोत तभी काम करते हैं जब हवा चलती है।  नाभिकीय रियक्टर की औसत आयु चालीस साल होती है, मगर स्थिति के आधार पर इसे लगभग बीस साल का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। चूँकि अभी नाभिकीय ईंधन के स्त्रोतों का उतना बाज़ारीकरण नहीं हुआ है जितना खनिज तेलों का; इसलिये नाभिकीय नाभिकीय ईंधन अपेक्षतया सस्ता है जबकि कच्चे खनिज तेल की कीमत बाज़ार के भरोसे होती है। वैसे तो यूरेनियम थोडा बहुत हर देश में पाया जाता है मगर आस्ट्रेलिया और कनाडा में ही इसके बेहतर स्त्रोत हैं। नाभिकीय प्लाँट को लगाने के लिये अपेक्षतया कम जगह की आवश्यक्ता होती है। मगर इसके आसपास का क्षेत्र खतरनाक क्षेत्र माना जाता है। ऊर्जा उत्पादन के बाद बचे नाभिकीय कूड़ा की मात्रा भी खनिज तेलों, और कोयले के दहन के बाद बचे कूड़ॆ की मात्रा से बहुत कम होती है। इस तरह ऐसे तमाम कारण हैं जो कि नाभिकीय ऊर्जा को ऊर्जा के अन्य संसाधनों से बेहतर बनाते हैं, और यही कारण हैं जिनके कारण आज पूरे विश्व में सैकड़ों रियक्टर्स काम कर रहे हैं।
मगर इस सिक्के का दूसरे पहलू भी हैं। इस तकनीक के सम्बन्ध में सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। ब्रह्माण्ड के इकलौते ग्रह जिस पर जीवन है, पृथ्वी पर जलवायु, जीवन स्तर और जीवन यापन की प्रणाली समेत यहाँ बसने वालॊं का भविष्य इस बात पर भी निर्भर है कि यहाँ ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिये किन तकनीकों या प्रणालियों का सहारा लिया जाता है। यह भी उपेक्षा करने योग्य नहीं है कि आज भी दुनियाँ की आबादी के बड़े हिस्से को बिजली आदि उपलब्ध नहीं है। सवाल सिर्फ़ ऊर्जा उत्पादन की प्रणाली को बदलने का नहीं है। नाभिकीय ऊर्जा का इतिहास किसी दुःस्वप्न की तरह है। नाभिकीय ऊर्जा का इस दुनिंयाँ में पदार्पण ही हिरोशिमा और नागासाकी के ज़रिये हुआ था। हालाँकि किसी एक घटना से किसी तकनीक के भविष्य के बारे में दृढ़्ता के साथ कुछ कहना आसान नहीं हैं, लेकिन नाभिकीय ऊर्जा के साथ ऐसा नहीं है। आज नाभिकीय ऊर्जा पचास साल से भी अधिक पुरानी ऊर्जा है। इस समय में इस तकनीक ने नाभिकीय ऊर्जा उद्योग की शक्ल ले ली है, आज कई व्यक्तिगत कम्पनियाँ इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा न सिर्फ़ कई देशों में योजना निर्माण के केन्द्र में रहती है, बल्कि अन्य योजनाओं को प्रभावित भी करती है। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा से जुडी तमाम अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ, संस्थायें और समितियाँ हैं।
अगर नाभिकीय ऊर्जा के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में बात की जाये तो, सबसे पहला बिन्दु नाभिकीय ऊर्जा के ईंधन यूरेनियम के खनन से सम्बन्धित है। य़ुरेनियम एक रेडियोएक्टिव यानि कि रेडियोसक्रिय पदार्थ होता है, जिससे अत्यधिक खतरनाक रेडियोसक्रिय विकिरण का उत्सर्जन होता है। यह रेडियोएक्टिव विकिरण जीवजन्तुऒं और पेड़ पौधों के लिये अत्यधिक हानि कारक होता है। इस विकिरण से कैंसर जैसा घातक रोग होने की आशंका रहती है। यह विकिरण सीधे तौर पर इसकी खुदाई करने वाले मज़दूरों को नुकसान पहुँचाता है। यूरेनियम खनिजों की चट्टानों से निकलने वाली रेडॉन गैस और रेडियम भी जीव जन्तुऒं के लिये हानिकारक होता है। इसके अत्यधिक ऊर्जा के कण आनुवाँशिक रोग और परिवर्तन करने में सक्षम होते हैं। इस विकिरण की अधिक मात्रा जीवों के प्रतिरक्षी तंत्र को हानि पहुँचाती है। उच्च कोटि के यूरेनियम खनिजों से खनन मज़दूर प्रष्ठ्भुमि विकिरण से एक हज़ार गुना तक गामा विकिरण प्राप्त करते हैं। यूरेनियम खनन की एक तकनीक “इन-सीटू लीचिंग” में भी इन रेडियोऎक्टिव पदार्थों का ज़मीनी-जल में घुलकर जनता तक पहुँचने का खतरा रहता है। खनिज खदानों में यूरेनियम को रसायनिक तरीकों से अन्य पदार्थों से अलग किया जाता है, इस प्रक्रिया में भी  यूरेनियम खनिज का कुछ भाग खदानों में छूट जाता है, यह अगर वायु में खुला छोड़ दिया गया तो हवा के साथ रिहायशी इलाकों में विकिरण के खतरे उत्पन्न करता है।  यही खतरा नाभिकीय ऊर्जा य्त्पादन के दौरान बचे नाभिकीय कचरे के साथ भी है। नाभिकीय ऊर्जा के सामाजिक क्षेत्र में आने के पचास साल बाद भी अब तक नाभिकीय खतरे को सफ़लता से बिना किसी हानिकारक प्रभावों के साथ डिस्पोज़ करने की मुकम्मल तकनीक किसी भी देश के पास नहीं है। एक बड़ा नाभिकीय रियक्टर वर्ष में 25-30 टन नाभिकीय कचरा उत्पन्न करता है जो कि अत्यधिक खतरनाक होता है। सन 2000 में दुनियाँ भर के रियक्टरों द्वारा उत्पन्न कचरे की मात्रा दो लाख बीस हज़ार टन थी जो कि (10000) दस हज़ार टन प्रति वर्ष के हिसाब से हर साल बढ रही है। अमेरिका ने अपने देश में उत्पन्न क्चरे को नेवादा राज्य में उस जगह पर भंडारित करने की योजना बनायी थी, जहाँ उसने हाइड्रोजन बमों का परीक्षण किया था जिसके कारण यह जगह पहले से ही विकिरण का शिकार है। मगर पर्यावरणविदों और स्वयं नेवादा राज्य के विरोध के कारण यह अब तक टल रहा है। आँकडों के अनुसार इंग्लैण्ड में आज भी कुळ नाभिकीय कचरे का बड़ा हिस्सा डिस्पोज़ करने के लिये आज भी बचा हुआ है।  फ़्राँस ने भी नाभिकीय कचरे को ग्रेनाइट की गुफ़ाओं में भंडारित करने की योजना बनायी थी, लेकिन इसका ज़िम्मेदारी से क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। भारत में भी नाभिकीय कचरा भंडारण एक बड़ा लक्ष्य है। वस्तुतः सभी देशों का प्रशासन खनन और भंडारण से जुड़ी समस्याओं पर गम्भीर नहीं रहा। सम्पूर्ण नाभिकीय उद्योग मूलतः य़ूरेनियम बेचने और नाभिकीय रियक्टर बनाने की तकनीक का व्यावसायिक फ़ायदा लेने में ही अपना अधिकतम ध्यान लगाता है क्योंकि यही वह क्षेत्र हैं जहाँ आर्थिक फायदों की संभावनायें रहतीं हैं।         
इसके अलावा भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जहाँ नाभिकीय ऊर्जा से इतर वैकल्पिक ऊर्जा के साधनों पर अत्यधिक ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है। नाभिकीय रियक्टर बनने में  और क्रियान्वित होने में लगभग दस वर्ष लग जाते हैं अगर रियक्टर निर्माण और नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन से जुडे सभी नियमों का पालन किया जाये। इसके बनिस्बत वैकल्पिक और नवीकरर्णीय ऊर्जा के केन्द्र बनाने में और इन्हें क्रियान्वित करने में आठ महीने लगते हैं। कई देशों में नाभिकी रियक्टर्स बीस साल तक “निर्माणा्धीन” रहे हैं। उदाहरण के लिये मैक्सिको में “लेग्युना वेर्दे” रियक्टर का निर्मण कार्य सन 1977 में शुरु हुआ और 1994 में खत्म हुआ।  मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऒफ़ टेक्नोलोजी के वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने के लिये दुनियाँ भर में कम से कम एक हज़ार नाभिकीय रियक्टर्स होने चाहिये, जो कि वास्तविकता से बहुत दूर है। नाभिकीय रियकटर के निर्माण में आने वाला खर्च भी एक बड़ा कारक है। दक्षिण अफ़्रीका की सरकार को सन 2008 में नाभिकीय रियक्टर के निर्माण से सम्बन्धित टेन्डर बापस लेना पड़ा था।फिलीपीन्स में “बतान नाभिकीय ऊर्जा” केन्द्र का निर्माण कार्य 1974 में शुरु किया गया। बाद में इसका निर्माण कार्य एक घटना के बाद रोक दिया गया, इसकी सुरक्षा जाँच में लगभग चार हज़ार कमियाँ पायीं गयीं। 23 करोड़ अम्रेरिकी डॉलर्स खर्च करने के बाद यह सन 1984 में पूरा हुआ, जो कि प्रस्तावित बजट का पाँच गुना था।  अगर भारत की बात करें तो दस नाभिकीय रियक्टरों के निर्माण में बजट से  तीन गुना खर्च आया है। साथ ही नाभिकीय रियक्टर्स का क्रियान्वयन मूल्य भी अन्य ऊर्जा संसाधनों की अपेक्षा काफ़ी अधिक है। नाभिकीय रियक्टर्स में विकिरण से बचने किसी भी अप्रत्याशित या प्रत्याशित घटना से निबटने के लिये हमेशा सावधान रहना पड़ता है। नाभिकीय रियक्टर्स पर आतंकी हमले किसी भी देश के लिये काफ़ी परेशान करने वाले हो सकते हैं। ऐसा कोई हमला न सिर्फ़ जान माल के भारी नुकसान का कारक बन सकता है, बल्कि इससे कई पीढियों के लिये विकिरण का खतरा उत्पन्न हो सकता है। नाभिकीय रियक्टर क्षेत्रीय जनता को न के बराबर रोज़गार के अवसर प्रदान करता है, जबकि ऊर्जा के नवीकरणीय साधन जैसे पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, बायोमास ईंधन एवं जैविक ईंधन के साधन क्षेत्रीय जनता के बडे भाग को रोज़गार के अवसर प्रदान करते हैं।
अंततः, नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की तकनीक नाभिकीय हथियार बनाने की तकनीक से काफ़ी समान है जिससे और अन्य देशो के द्वारा नाभिकीय हथियार बनाये जाने की संभावना से इंनकार नहीं किया जा सकता यदि नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की तकनीक का विश्व में विस्तार किया जाता है। अगर विश्व में हम हज़ारों नाभिकीय़ रियक्टर्स बनाकर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सफ़ल हो गये फ़िर भी भविष्य में इन सर्वत्र फ़ैले रियक्टर्स पर आतंकी हमले के प्रयास नहीं होंगें या प्राकृतिक आपदाओं से कोई हानि नहीं होगी, इसकी गारंटी कौन ले सकता है? इसके अलावा, भविष्य में जो नाभिकीय कचरा उत्पन्न होगा, उस उपेक्षित और खतरनाक नाभिकीय कचरे के विशालकाय भंडार का कोई गलत इस्तेमाल नहीं करेगा, यह कहने वाले हम कौन होते हैं?
इन सभी समस्याऒं का हल नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा संसाधन हैं। ऊर्जा उत्पादन के ये संसाधन अपेक्षाकृत सस्ते तो हैं ही साथ ही इनसे भविष्य में कॊई बडे खतरे नहीं है। ऊर्जा उत्पादन की इन प्रणालियों में क्षेत्रीय जनता को रोज़गार भी मिलता है। वैकल्पिक और नवीकरणीय़ ऊर्जा के संसाधनों का क्रियान्वयन मूल्य वरर्तमान में अन्य प्रणालियों से काफ़ी अधिक है, जिसे कि विश्व भर में शोध को और बढावा देकर के उचित स्तर तक लाया जा सकता है।  नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में जर्मनी और स्वीडन जैसे देशों ने काफ़ी अनुकरणीय कार्य किया है। उम्मीद है कि भविष्य में वैकल्पिक और नवीकरणीय़ ऊर्जा के ये स्त्रोत ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में क्रान्ति लायेंगे बल्कि, स्वच्छ, सुरक्षित, प्रतिस्पर्धा योग्य, और भय रहित ऊर्जा उत्पादन के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे।
                           -मेहेर वान
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Thursday, March 17, 2011

एक बार फिर कटघरे में आईपीसीसी

पिछ्ले कुछ सालों से जलवायु परिवर्तन, बहस का एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है। तमाम देशों की सरकारों ने अपने बज़ट में से भारी-भरकम राशि जलवायु परिवर्तन पर शोधकार्य के लिये आवंटित करना शुरु कर दी है, साथ ही जलवायु परिवर्तन से बचने के उपायों के अमल में लाने के लिये जनजागरुकता उत्पन्न करने पर ज़ोर-शोर से खर्च हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मेलनों में विकासशील देशो के प्रधानमंत्रियों पर दबाव डाला जाने लगा कि वे अपने अपने देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर आंकड़े इकट्ठे करायें और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लायें। अमेरिका जैसे विकसित देश, भारत जैसे विकासशील देशों पर राजनीतिक दबाव बनाने में सफ़ल रहे, और इस राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल कई बार अपने हितों को साधने के लिये किया गया। विश्व बैंक ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर विकासशील और अविकसित देशों को अरबॊं डॉलर कर्ज़ बाँटा।
     जलवायु परिवर्तन के लिये सबसे अधिक ज़िम्मेदार ग्रीन हाउस गैसों को माना जाता है। ग्रीन हाउस गैसें वो गैसें होतीं हैं जो कि बाहर से मिल रही गर्मी या ऊष्मा को अपने अन्दर सोख लेतीं हैं। ग्रीन हाउस गैसों का इस्तेमाल सामान्यतः अत्यधिक सर्द इलाकों में उन पौधों को को गर्म रखने के लिये किया जाता है जो कि अत्यधिक सर्द मौसम में खराब हो जाते हैं। ऎसे में इन पौधों को काँच के एक बन्द घर में रखा जाता है और उस काँच के घर में ग्रीन हाउस गैस भर दी जाती है। यह गैस सूरज से आने वाली किरणों की गर्मी सोख लेती है और पौधे गर्म रहते हैं।  ठीक यही प्रक्रिया पृथ्वी के साथ होती है। सूरज से आने वाली  किरणों की गर्मी की कुछ मात्रा को पृथ्वी के पर्यावरण द्वारा सोख लिया जाता है। इस प्रक्रिया में हमारे पर्यावरण में फ़ैली ग्रीन हाउस गैसॊं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पृथ्वी को गर्म रखने में इन गैसों का महत्वपूर्ण योगदान है। अगर इन गैसों का अस्तित्व हमारे पर्यावरण में न होता तो पृथ्वी पर तापमान वर्तमान तापमान से काफ़ी कम होता।
      ग्रीन हाउस गैसों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण गैस कार्बन डाई ऑक्साइड है, जिसका हम जीवित प्राणी अपनी साँस के साथ उत्सर्जन करते हैं। शोध के दौरान, पर्यावरण विज्ञानियों ने पाया कि पिछ्ले कुछ वर्षों में पृथ्वी पर कार्बन डाई ऑक्साइड गैस की मात्रा लगातार बढ़ी है। साथ ही यह भी पाया गया कि सन 1995 के बाद के साल पृथ्वी पर पिछ्ले कुछ सौ वर्षों में सबसे गर्म वर्षों में से थे। कुछ वैज्ञानिकों ने कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन और तापमान वृद्धि में गहरा सम्बन्ध बताया। सन 2006  में एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म आयी-“द इन्कन्वीनियेंट ट्रुथ”। यह डॉक्यूमेन्ट्री फ़िल्म तापमान वृद्धि और कार्बन उत्सर्जन पर केन्द्रित थी। इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका में थे- अमेरिकी उप-राष्ट्रपति “अल गोर” और इस फ़िल्म  का निर्देशन डेविस गुग्न्हेम ने किया था। इस फ़िल्म में ग्लोबल वार्मिंग को एक विभीषिका की तरह दर्शाया गया था, जिसका प्रमुख कारण मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस माना गया। इस फ़िल्म को बहुत सराहा गया और फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेन्ट्री का ऑस्कर अवार्ड भी मिला। हालाँकि ग्लोबल वार्मिंग पर वैज्ञानिकों द्वारा शोध कार्य जारी रहा, मगर इस बीच यह मान्यता बन गयी कि पृथ्वी पर हो रही तापमान वृद्धि के लिये ज़िम्मेदार कार्बन उत्सर्जन है जो कि मानव जनित है। इसका प्रभाव विश्व के राजनीतिक घटनाक्रम पर भी पड़ा। विश्व बैंक को गरीब देशों को कर्ज़ देने का एक और मुददा मिल गया। इसके कुछ वर्षों पहले “जलवायु परिवर्तन के लिये अन्तर्सरकारी दल’(Intergovernmental Panel on Climate Change) का गठन किया गया था। सन 2007 में इस अन्तर्सरकारी दल और तत्कालीन अमेरिकी  उपराष्ट्रपति अल गोर को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। सन 2007 में आयी आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट में पूरी तरह से इस बात पर सहमति बन गयी थी कि वर्तमान में पर्यावरण में हो रही तापमान वृद्धि के लिये पूरी तरह से ज़िम्मेदार मानव जनित ग्रीन हाउस गैसें हैं, जिनमें कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा सबसे ज़्यादा है। रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि सन 2035 तक  हिमालय के ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जायेंगे।
     आईपीसीसी वस्तुतः एक ऎसा अंतर्सरकारी वैज्ञानिक संगठन है जो कि विश्व भर में अर्जित की गयी उन अद्यतन वैज्ञानिक, सामाजिक-आर्थिक जानकारियों को इकट्ठा और समीक्षा करता है जो कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई होती हैं। आईपीसीसी का गठन सन 1988 में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेम्बली के दौरान हुआ था।  यह दल खुद शोध कार्य नहीं करता और न ही जलवायु के विभिन्न कारकॊं पर नज़र रखता है। यह दल सिर्फ़ प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित शोध पत्रों के आधार पर जलवायु परिवर्तन पर अपनी राय बनाता है, इसका प्रमुख केन्द्र जलवायु को प्रभावित करने वाले मानव जनित कारक होते हैं । इस राय को आईपीसीसी अपनी रिपोर्ट्स के ज़रिये सरकारों और आम जनता तक पहुँचाता है। आईपीसीसी की रिपोर्ट्स का हवाला विश्व भर में तमाम नीति निर्धारक संगठनॊं और सरकारों द्वारा दिया जाता है। इन रिपोर्ट्स को आधार बनाकर सरकारें अपना बज़ट और नीतियाँ तय करती हैं।
आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट की आलोचना, सन 2007 से लगातार हो रही है। 13 मार्च, 2010 को जलवायु वैज्ञानिकों ने आईपीसीसी को एक खुला खत लिखा था जिसमें कि लगभग 250 जलवायु वैज्ञानिकों के हस्ताक्षर थे। इस खुले खत में जलवायु वैज्ञानिकों ने आईपीसीसी पर यह आरोप लगाया था कि आईपीसीसी ने तथ्यों को बढाचढा कर पेश किया है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना था कि जलवायु परिवर्तन पर मानव जनित कारकॊं का प्रभाव दर्शाते हुये आईपीसीसी ने अन्य प्राकृतिक और महत्वपूर्ण कारकों के प्रभावों की उपेक्षा की है।
इसी क्रम में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक भारतीय जर्नल “करेंट साइंस” के 100वें वॉल्यूम में एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ है, जिसमें आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट के निष्कर्षों पर सवालिया निशान लगाये गये हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग में 90% योगदान मानव जनित कार्बन उत्सर्जन का है। जबकि प्रोफ़ेसर यू.आर.राव अपने शोध के आधार पर कह रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग में 40% योगदान तो सिर्फ़ कॉस्मिक विकिरण का है। इसके अलावा कई अन्य कारक भी हैं जिनका ग्लोबल वार्मिंग में यॊगदान है जिनके बारे में शोध कार्य पूरा नहीं हुआ है। प्रोफ़ेसर यू.आर. राव का कहना है कि मानव जनित कार्बन उत्सर्जन के जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव को आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट में बढा-चढाकर पेश किया गया।
इसरो के पूर्व चेयरमेन और भौतिकविद प्रोफ़ेसर यू.आर.राव अपने शोध पत्र में लिखते हैं कि कॉस्मिक विकिरण का सीधा सम्बन्ध सौर कियाशीलता से होता है। अगर सूरज की क्रियाशीलता बढती है तो ब्रह्माण्ड से आने वाले कॉस्मिक विकिरण की मात्रा कम हो जाती है। यह कॉस्मिक विकिरण निचले स्तर के बादलॊं के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाता है। यह बात सबसे पहले स्वेन्समार्क और क्रिस्टेन्सन नामक वैज्ञानियों ने भी कही थी जिस पर अब वैज्ञानिकों में आम सहमति है। यह निचले स्तर के बादल सूरज से आने वाले विकिरण को परावर्तित कर देते हैं। जिस कारण से पृथ्वी पर सूरज से आने वाले विकिरण के साथ आयी गर्मी भी परावर्तित होकर ब्रह्माण्ड में वापस चली जाती है। सन 1925 से सूरज की क्रियाशीलता में लगातार वृद्धि हुई है। जिसे कि सूरज पर निर्मित स्पॉट्स और सूरज से आने वाली चुम्बकीय हवाऒं से मापा जाता है। विश्व भर के वैज्ञानिक इन कारकों पर लगातार नज़र रखते हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि सन 1925 से सूरज की क्रियाशीलता में लगातार वृद्धि हुई है। सूरज की क्रियाशीलता में वृद्धि के कारण पृथ्वी पर आपतित होने वाले कॉस्मिक विकिरण में लगभग 9% कमी आयी है। इस विकिरण में आयी कमी से पृथ्वी पर बनने वाले खास तरह के निचले स्तर के बादलॊं के निर्माण में भी कमी आई है, जिससे सूरज से आने वाला विकिरण परावर्तित नहीं हो पाता है। यह विकिरण पृथ्वी के पर्यावरण द्वारा सोख लिया जाता है और इस कारण से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि दृष्टिगोचर होती है। ग्लोबल वार्मिंग में इस प्रक्रिया का 40% योगदान है। जबकि इस प्रक्रिया मानव जनित नहीं है और न ही मानव इसे संचालित कर सकता है। इस तरह यह शोध आईपीसीसी के इस निष्कर्ष का खंडन करता है कि ग्लॊबल वार्मिंग में 90% योगदान मानव का है। अगर ग्लॊबल वार्मिंग के अन्य कारकॊ का अध्य्यन किया जाये तो मानव का योगदान आईपीसीसी की रिपोर्ट की अपेक्षा बहुत कम होगा।
यू.आर.राव के शोध पत्र के प्रकाशन के ठीक दो दिन बाद विश्व के जाने माने वैज्ञानिक जर्नल “नेचर” में यूनीवर्सिटी ऑफ़ लीड्स के प्रोफ़ेसर ऎन्ड्र्यू शेफ़र्ड का शोध पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है कि, ग्रीनलैंड की बर्फ़ को पिघलने में उस समय से कहीं अधिक समय लगेगा जितना कि आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट में कहा गया है। एन्ड्र्य़ू शेफर्ड अपने शोधपत्र में लिखते हैं कि ग्रीन लैंड की बर्फ़ अपेक्षाकॄत सुरक्षित है, उसे पिघलने में काफ़ी वक्त लगेगा। इसी तरह आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया था कि हिमालय के ग्लेशियर सन 2035 तक पिघल जायेंगे। शायद आपको याद होगा कि सन 1999 मे डॉ. वी.के.रैना ने अपने शोध के दौरान पाया था कि हिमालय के ग्लेशियर भी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। इस पर आईपीसीसी के चेयरमेन राजेन्द्र पचौरी को बाद में सहमति भी जतानी पड़ी थी, भले ही शुरुआत में उन्होंने रैना के शोध को अपूर्ण बताया था।
इस तरह से वर्तमान में हो रहे जलवायु परिवर्तन पर शोध के परिणाम बहुत ही गम्भीर हो सकते हैं। अगर वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय इस बात पर सहमत हो जाता है, कि कॉस्मिक विकिरण का ग्लोबल वार्मिंग में महत्वपूर्ण योगदान है, अर्थात मानव का योगदान बहुत कम है, तो भारत जैसे तमाम विकासशील और अविकसित देशॊं पर कार्बन उत्सर्जन पर लगाम लगाने का दबाव बहुत हद तक कम हो जायेगा। भारत के केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि” इस शोध के कारण हम कार्बन उत्सर्जन कम करने के घरेलू प्रयास कम नहीं कर रहे है, लेकिन अगर यह सत्य है तो अंतर्राष्टीय वार्ताऒं में हम पर दबाव काफ़ी कम हो जायेगा।“ वहीं आईपीसीसी के पूर्व चेयरमेन रॉबर्ट वाटसन ने कहा था, “आईपीसीसी के द्वारा की जाने वाली गलतियाँ इस दिशा में जा चुकीं हैं, जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बढा-चढाकर पेश करने से यह महसूस कराना चाह्ते हों कि जलवायु परिवर्तन मामले गम्भीर हैं। यह चिंतित करता है। आईईसीसी को इस मामले पर पुनरावलोकन करना चाहिये और स्वयं से पूछना चाहिये कि ऎसा क्यों हुआ?” वाट्सन के ये शब्द मामले की गम्भीरता को प्रकट करते हैं। क्योंकि आईपीसीसी को जिस तरह सरकारों ने मान्यता दी है, आईपीसीसी की रिपोर्ट्स का असर देशों की राजनीति से लेकर बज़ट, विकास और लाइफ़ स्टाइल पर पड़ा है। कहीं ऎसा ना हो कि विज्ञान जिस पर आज भी आम जनता का भरोसा कायम है, विकसित देशों की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के हाथॊं का एक खिलौना बन जाये।   
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                                                                         मेहरबान राठौर

Thursday, March 3, 2011

एफ़.एम. प्रसारण: बाज़ारवाद का शिकार हुई उत्कृष्ट तकनीक

    भारत में रेडियो प्रसारण के लगभग 75 वर्ष बीतने को हैं। इस लम्बे समय में प्रसारण की संरचना और तरीकों में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं। रेडियो प्रसारण के शुरुआती दौर में जहाँ चुम्बकीय टेप में रिकार्ड किये गये कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था, वहीं आज डिजिटल तकनीक पर आधारित ऑडियो प्लेयर्स की सहायता से कार्यक्रमों को प्रसारित किया जाता है। डिजिटल तकनीक पर आधारित कार्यक्रमों के प्रसारण की गुणवत्ता में काफ़ी सुधार हुआ है। चुम्बकीय टेप में मोनो ट्रेक में रिकॉर्डिंग की जाती थी और अब डिजिटल तकनीक से स्टीरियो और मल्टी ट्रेक्स में रिकॉर्डिंग होने से  कई इफ़ेक्ट्स के साथ कार्यक्रमों को रिकॉर्ड करके प्रसारण की गुणवत्ता में सुधार किया जा रहा है। रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में सबसे क्रान्तिकारी घटना थी एफ़.एम.प्रसारण की शुरुआत होना। मेरे हिसाब से, यदि तकनीकों के दुरुपयोग के बारे में अध्य्यन किया जाये तो रेडियो प्रसारण की एफ़.एम. तकनीक भी दुनियाँ की सबसे ज़्यादा दुरुपयोग का शिकार हुई तकनीकों में से एक साबित होगी।
    दरअसल, एफ़.एम.रेडियो प्रसारण की ऎसी तकनीक है, जिसकी सहायता से अत्यन्त उच्च कोटि की गुणवत्ता के साथ रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा सकता है। रेडियो प्रसारण के शुरुआती दौर में कार्यक्रमॊं का प्रसारण ए.एम. अर्थात एम्प्लीट्यूड मोड्युलेशन पर आधारित तकनीक की सहायता से होता था। आकाशवाणी अर्थात ऑल इंडिया रेडियो के सभी प्राइमरी चैनलों का प्रसारण एम्प्लीट्यूड मोड्युलेटेड वेव्स की आवृत्ति (frequency) के बैंड पर होता था। समय के साथ शॉर्ट वेव पर भी प्रसारण किया जाने लगा। मगर इन दोनों तकनीकों में प्रसारण की गुणवत्ता लगभग समान ही थी। प्रसारण के बीच में खरखराहट और अनावश्यक और अवाँछित ध्वनियाँ भी प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों के साथ सुनाई देती थीं। शॉर्ट वेव और मीडियम वेव पर कार्यक्रम सुनने वाले लोग इस परेशानी के बारे में परिचित होंगे। इन अनावश्यक और अवाँछित ध्वनियों और खरखराहट से निजात पाने के लिये और प्रसारण की गुणवत्ता में सुधार के प्रयास लगातार होते रहे, क्योंकि रेडियो ने संचार क्राँति को नये आयाम दिये थे, और रेडियो, सूचनाओं के प्रसार का महत्वपूर्ण साधन बनकर उभर रहा था। इसी दौर में रेडियो प्रसारण की एफ़.एम.तकनीक का भी आविष्कार हुआ। जिसने रेडियो प्रसारण की परिभाषा बदल दी। खरखराहट और अवाँछित ध्वनियों से मुक्त प्रसारण, एफ़.एम. यानि फ़्रीक्वेन्सी (आवृत्ति) मॉड्युलेशन पर आधारित प्रसारण के कारण ही संभव हो सका। इतना साफ़ और स्पष्ट प्रसारण ए.एम और शॉर्ट वेव पर प्रसारण में कभी संभव नहीं था। अब हम रेडियो पर कार्यक्रमों को उसी गुणवता के साथ सुन सकते थे जिस तरह कार्यक्रम को सामने बैठ कर सुन रहे हों। मूलतः एफ़.एम. रेडियो तरंगों के प्रसारण की एक तकनीक है, लेकिन इस तकनीक पर बाज़ार के प्रभाव के कारण रेडियो पर कार्यक्रमों द्वारा मनोरंजन की एक शैली को एफ़.एम शैली के नाम से जाना जाने लगा। इस उच्च कोटि की प्रसारण विधि का बाज़ार और नव-उपनिवेशवादियों ने अपने लाभ के लिये मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया। इस तरह जनकल्याण में प्रयोग की जा सकने वाली और जनता को सूचना सम्पन्न करने में सक्षम उच्च कोटि की गुणवत्ता वाली तकनीक को खोखले और लक्ष्यहीन मनोरंजन का साधन बनाया गया। दुनियाँ के युवाऒं और जनता का विश्व की अत्यन्त मूलभूत और अपरिहार्य समस्याऒं से ध्यान हटाकर खोखले और विचारहीन मनोरंजन के द्वारा एक गैरज़िम्मेदार और बौद्धिक विपन्न समाज बनाने में इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया। दुनियाँ के तमाम समाजशास्त्री और प्रगतिवादी, तथाकथित प्रगति की इस प्रक्रिया के मूक दर्शक बने रहे, और नवउपनिवेशवादी बाज़ार ने दुनियाँ के तमाम देशों के युवाऒं और जनता को प्रगति, आधुनिकता की चादर ऒढे छलायोजित मनोरंजन के द्वारा खोखला बनाया, और आज भी बना रहा है। 
   बींसवी सदी में तकनीक के क्षेत्र में अकल्पनीय प्रगति हुई। बीसवीं सदी में ही एक प्रतिभावान इंजीनियर पैदा हुआ था, जो कि तकनीक और उसके बाज़ारीकरण की चकाचौंध में गुम हो गया। उसके द्वारा आविष्कृत तकनीक का कोर्पोरेट शक्तियों ने भरपूर और मनमाना इस्तेमाल किया और लाभ कमाया। मगर शायद ही आपने किसी “एड्विन हॉवार्ड आर्मस्ट्रॉग” का नाम सुना हो। एड्विन आर्मस्ट्राँग बीसवीं सदी के प्रतिभावान और महत्वपूर्ण इंजीनियर्स में से एक था, जिसने रेडियो प्रसारण की एफ़.एम. तकनीक का आविष्कार किया था। तब एड्विन आर्मस्ट्राँग मात्र ग्यारह साल का ही रहा होगा, जब मारकोनी ने व्यावसायिक टेलीफॊनी का आविष्कार करके सनसनी फ़ैला दी थी। मारकोनी की इस सफ़लता से प्रभावित होकर एडविन आर्मस्ट्राँग ने वायरलेस तकनीक में शोध करने और इस दिशा में अपना कुछ योगदान करने का निर्णय लिया था। एडविन आर्मस्ट्राँग ने रेडियो प्रसारण की एफ़.एम.अर्थात फ़्रीक्वेन्सी मोड्यूलेशन पर आधारित तकनीक का आविष्कार करके रेडियो प्रसारण को एक नयी दिशा देते हुये टेलीविज़न, राडार और सेल्यूलर टेलीफ़ॊनी जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों का रास्ता तैयार किया। आज भी एडविन आर्मस्ट्राँग की तकनीक इन तकनीकी सेवाऒं का आधार है। मगर आज तक एड्विन आर्मस्ट्राँग को अपनी मेहनत और खोजों के लिये कोई पहचान नहीं मिली। जब तक वह ज़िन्दा रहा, अपनी इन महत्वपूर्ण खोजों के लिये एक साधारण पहचान पाने का प्रयास करता रहा और ठीक उसी समय कॉरपोरेट इन महत्वपूर्ण खोजों का इस्तेमाल बिना किसी जिम्मेदारी के अपने लाभ के लिये करता रहा। अंततः, यह संघर्ष एडविन आर्मस्ट्राँग को गहरे निराशावाद की तरफ़ ले गया और उसने सन 1954 में आत्महत्या कर ली।
    सन 1933 में, एडविन आर्मस्ट्राँग एफ़.एम.तकनीक के आविष्कार में सफ़ल हो गया था, और नव-उपनिवेशवाद अस्सी के दशक तक इस तकनीक को अफ़्रीका में विचारहीन और खॊखले मनोरंजन के साथ पैसे कमाने में उपयोग कर रहा था। जिस तकनीक का उपयोग समाज को सूचना सम्पन्न और अपने समय की समस्याऒ के लिये जागरुक और ज़िम्मेदार बनाने में होना चाहिये था, उस तकनीक का उपयोग युवाऒं को छलायोजित मनोरंजन में मस्त होकर लम्पट और गैरजिम्मेदार बनाने का साधन बनाने में किया गया। वहीं बाज़ार ने एक नयी शब्दावली गढी- एफ़.एम.रेडियो चैनल की शब्दावली। वर्तमान में, एफ़.एम.शब्द का मतलब सामान्यतः एफ़.एम. रेडियो चैनल होता है, जिसपर एक रेडियो जॉकी नामक प्राणी बिना सिर-पैर की और अर्थरहित बातों को सतत, बिना रुके बोलता चला जाता है, और लोग उसे मनोरंजन का नाम दे देते हैं। रेडियो जॉकी की इन बातों का सामाजिक ज़िम्मेदारी से कोई लेना देना नहीं होता। न ही उसे जनता को सूचना सम्पन्न बनाने के सवाल से कोई सरोकार होता है। उसे तो सिर्फ़ आधुनिक और बॊल्ड होना होता है, जिसका मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़, किसी भी बात को कामुकता या लम्पटई से जोडकर कहने की महारत होता है। जो रेडियो जॉकी अपने श्रोताओं से जितने कामुक और लम्पट ढंग के साथ बात कर ले वही अच्छा कलाकार कहा जाता है। लेकिन यह किस तरह सी कला है, और किस तरह की कला सम्पन्नता?
   यहाँ पर कुछ महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। जिन एफ़.एम.चैनलों और जिस एफ़.एम.शैली की बात अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं में होती है, वे सारे चैनल व्यक्तिगत या प्राइवेट होते हैं। वस्तुतः इन प्राइवेट चैनलॊं के लिये न तो कोई नियमावली है और न इनकी कोई ज़िम्मेदारी तय की गयी है। यहाँ तक कि यह चैनल जिन गीतों को अपने कार्यक्रमों में बजाते है उन गीतों का जनता के बीच प्रसारण के द्वारा लाभ कमाने के बद्ले, ये प्राइवेट चैनल न तो गीतों के अधिकार रखने वालों को रॉयल्टी देते हैं, न अपने कर्मचारियों अर्थात रेडियो जॉकी को मेहनत के मुताबिक वेतन। कहा जाता है कि युवाऒं को आसानी से छला जा सकता है क्योंकि वे जल्दबाज़ आशावादी होते हैं। एक बार जो युवा रेडियो जॉकी के पेशे की तरफ़ आ जाता है उसे इनके द्वारा दिये जाने वाले पैसों के एवज़ में मालिकों के मन-माफ़िक प्रदर्शन करना पडता है। कॉर्पोरेट द्वारा युवाऒं से यह कराना तब और आसान हो जाता है जब इसे आधुनिकता और बोल्ड्नेस से जोड दिया जाता है। अगर ध्यान से देखा जाये तो ये प्राइवेट एफ़.एम. चैनल इस बात पर भी सहानुभूति के पात्र नहीं हैं कि ये बडी मात्रा में रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराते हों। इस तरह यह चैनल, केवल युवाऒं की गतिशील विचार प्रक्रिया को निशाना बनाकर मुनाफ़ा कमाने और समाज में विवेक हीनता के साथ लम्पट मनोरंजन की परंपरा का निर्वाह करने वाली इकाई हैं।
   यहाँ पर सरकारी एफ़.एम.चैनलॊं के सम्बन्ध में भी बहस होना आवश्यक है। आज सम्पूर्ण भारत में कई शैक्षिक और स्वस्थ मनोरंजन उपलब्ध कराने वाले रेडियो चैनल एफ़.एम.तकनीक की सहायता से चल रहे हैं, जो कि ध्यान न दिये जाने के अभाव में अपना स्तर और श्रोताओं में पहुँच कम करते जा रहे है। सरकारी मदद से चलने वाले एफ़.एम.चैनल “ज्ञानवाणी” जैसे चैनल युवाऒं के लिये और अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं, यदि इनमें कार्यक्रमॊं की गुणवत्ता में सुधार करते हुये, इन पर उचित रूप से ध्यान दिया जाये। आज भी “आकाशवाणी” का एफ़.एम. पर आधारित चैनल “विविध भारती” अपने कार्यक्रमॊं की गुणवत्ता और स्वस्थ मनोरंजन के लिये उदाहरण के रूप में पेश किया जा सकता है। प्राइवेट चैनलॊं की अपेक्षा इन सरकारी चैनलों पर ध्यान दिया जाये और इस तकनीक का इस्तेमाल सूचनाऒं और ज्ञान के संचार सहित स्वस्थ मनोरंजन के लिये किया जाये तो एफ़.एम. की छवि “छलायोजित आनंद” देकर बाज़ार के बदनाम हथियार के रूप में न होकर जन कल्याण और समाज को ज्ञानवान बनाकर ज़िम्मेदार बनाने का उपकरण के रूप में स्थापित होगी।
   “एफ़.एम.” रेडियो प्रसारण की एक उच्च कोटि की तकनीक है, और उस तकनीक का उपयोग समाचार, और सामाजिक मसलों पर बहसों में जनसामान्य की भागीदारी बढाने के लिये किया जाना चाहिये। एक समय में रेडियो ने सूचनाऒ के प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय कार्यक्रमॊं का प्रसारण “ए.एम.” अर्थात प्राइमरी चैनल और शॉर्ट वेव पर होता था। इन तकनीको की सहायता से प्रसारण साफ़ और स्पष्ट सुनाई नहीं देता, साथ ही इन फ़्रीक्वेन्सीज़ पर प्रसारण में खरखराहट और अनावश्यक ध्वनियाँ भी प्रसारण को उबाऊ बना देती है। आज के समय यदि समकालीन मुद्दों पर चर्चायें, समाचार, स्वस्थ मनोरंजन आकर्षक, रोचक और बेहतर ढंग से एफ़.एम फ़्रीक्वेन्सी बैंड पर एफ़.एम. तकनीक की सहायता से प्रसारित किये जायें तो यह कार्यक्रम साफ़, स्पष्ट और बेहतर गुणवत्ता के साथ जनता तक पहुँच सकेंगे। इसके साथ ही रेडियो एक बार फिर राष्ट्र निर्माण में कल्याणकारी भूमिका निभाते हुये, विज्ञान और तकनीक के बेहतर उदाहरण के रूप में उभर कर सामने आयेगा। अन्यथा, यह तकनीक किसी परमाणु बम से कम विनाशकारी नहीं साबित होगी, जो कि एक विचारहीन, विवेकहीन, और गैरज़िम्मेदार, अपंग पीढियों का निर्माण करेगी।          
   
                                                                                       
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                                                       -मेहरबान राठौर

Thursday, February 24, 2011

मानव की अगली पीढी: साइबोर्ग

            चर्चित वैज्ञानिक “क्रेग वेन्टर” के कुछ समय पहले कृत्रिम कोशिका के निर्माण की घोषणा के बाद मानव प्रकृति सम्बन्धॊं पर एक नयी बहस शुरु हो गयी है| भले ही उन्होंने नयी कोशिका का निर्माण नहीं किया है फिर भी इस तरह का प्रयोग मानव के भविष्य पर गहरा प्रभाव डालेगा| कृत्रिम  जीवन की रचना के इतर भी विज्ञान की कई अन्य दिशाऒं में शॊध कार्य जारी है, जिस पर कि बहस होना ना सिर्फ़ महत्वपूर्ण है बल्कि आवश्यक भी हॊ पडा है|
     लन्दन में रीडिंग विश्वविद्यालय के साइबर्नेटिक्स विभाग में प्रोफ़ेसर केविन वारविक भी उन वैज्ञानिकों की श्रॆणी में रखे जा सकते हैं, जो कि अपनॆ अनुसन्धान के द्वारा प्रकृति और मानव के बीच के रिश्ते की परिभाषा बदल रहे हैं| अगर उनकॆ अनुसन्धान पर नज़र डाली जाये तो उनके अनुसन्धान कॊ दो स्तरॊं में देखा जा सकता है| साइबोर्ग पर अनुसन्धान के क्रम में, शुरुआत २४ मई,१९९८ से उन्हॊनॆ अपनॆ शरीर में ही खाल के नीचे एक  RFID  ट्रान्समिटर लगा कर की थी| ट्रान्समिटर इम्प्लान्टॆशन का प्रमुख उद्देश्य यह जांचना था कि इस तरह के ट्रान्स्मिटर चिप को शरीर आसानी से स्वीकार करता है या नहीं? यह भी कि इस तरह की चिप से क्या शरीर अर्थवान सिग्नल प्राप्त करके उनके अनुसार प्रतिक्रिया दे पाता है या नहीं? इस चिप की सहायता से वे अपने आस-पास लगे कम्प्यूटर नियन्त्रित  यन्त्रॊं को सिर्फ़ सॊचकर चला सकते थे| केविन वारविक ने उस समय के अनुभवॊं के बारे में लिखा है:- “जब सुबह-सुबह मैं चिप के साथ, रीडिंग विश्वविद्यालय के साइबर्नेटिक्स विभाग पहुँचा तो परदे और खिड्कियाँ अपने आप खुल गयॆ,  कम्प्यूटर्स स्वतः चालू हो गये यहां तक कि कम्प्यूटर्स ने मुझॆ हैलॊ बोला”|उन्होने लिखा कि जब उस चिप को मेरे शरीर से निकाल दिया गया मैं अपनॆ आप को पहले की अपेक्षा कम शक्तियों वाला मह्सूस कर रहा हूँ| इसी दिशा में दूसरा प्रय़ोग हुआ १४ मार्च २००२ कॊ, रीडिंग विश्वविद्यालय के ही एक  डॊक्टर मार्क गैसोन की सहायता से| इस बार केविन वारविक ने अपने बाँये हाथ में एक चिप को सर्ज़री के दौरान लगाया और चिप की  सहायता से अपने तत्रिका तन्त्र को कम्प्युटर से जोड लिया| इस तरह वे नील हर्बिसन के बाद दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण साइबोर्ग बन गये|

     साइबोर्ग उस मानव या जीव को कहा जा सकता है, जो कि अपनी शारीरिक या मानसिक क्षमताऒं में वृद्धि के लिये टैक्नोलोजी का सहारा लेता हो| लेकिन चश्मा जैसे यन्त्र पहनने वाले को साइबोर्ग नहीं कहा जा सकता क्यॊंकि इसमें किसी भी तरह से साइबर्नेटिक्स या कम्प्यूटर्स का इस्तेमाल नहीं है| विशेषज्ञॊं का ये मानना है कि साइबोर्ग मानव तक्नीक का  ऐसा संगम है, जिसमें यान्त्रिक स्थिति में किये गये परिवर्तनॊं को शारीरिक या मानसिक प्रतिक्रियायॊं से सम्बद्ध किया जा सके| ठीक उसी तरह जैसे कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोड्कर कम्प्यूटर की क्षमता में काफ़ी वृद्धि कर दी जाती है|वर्तमान के साइबोर्ग, मानव के दिमाग का मशीन के साथ संगम हैं| केविन वारविक ने जब स्वयं को चिप के सहारे कम्प्यूटर से जोडा तो मानव की शक्तियॊं के विकास का एक अध्याय शुरु हो चुका था| केविन वारविक के तन्त्रिका तन्त्र को इंटरनेट से कोलम्बिया विश्वविद्यलय, न्यूयॊर्क में जोडा गया और रीडिंग विश्वविद्यालय लन्दन मे रखे रोबोट को भी इंटरनॆट से जोडा गया| इस प्रक्रिया के सम्पन्न होने के बाद केविन अपने हाथ को जिस तरह घुमाते उसी तरह से रॊबॊट भी घुमाता| यहाँ तक कि जब ऐसी ही चिप उनकी  पत्‍नी ने लगा ली और वे जब इन्टर्नॆट के ज़रिये एक दूसरे से जुडते, अपनी भावनायें बिना बोले आपस में बाँट पाते| इसे उन्होंने टॆलीपेथी के जैसा कुछ कहा| वे बिना भाषा के अपने विचार बाँट रहे थॆ| इंटरनेट से जुड जाने पर उनकी याद्दाश्त में अप्रत्याशित वृद्धि हो गयी थी| कुछ समय के बाद केविन वारविक ने चिप अपनी बाँह से अलग कर ली|
     अगर ध्यान से देखा जाये तो इस तरह के आविष्कार दुनिंयाँ में तमाम तरह की शारीरिक और मानसिक कमज़ॊरियॊं वाले लोगों के लिये वरदान की तरह हैं| हम जानते हैं कि वैज्ञानिक हाथ पाँव से लेकर दिल के पेसमेकर तक के कृत्रिम यंत्र बना चुके हैं| अब तक दिमाग ही एक ऐसी संस्था है जिसे कि पूर्ण रूप से बनाना अभी बाकी है| अगर हम सिंथेटिक दिमाग नहीं बना सकते और इसके स्थान पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले कम्प्यूटर्स का इस्तेमाल बिना किसी समस्या के कर सकते है तो कोइ बुरी बात नहीं है|  साइबोर्गॊं की मेडीसिन के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका हो सकती है| अन्ध्त्व, बहरापन से लेकर सीज़ोफ़्रेनिया और अल्ज़ाइमर जैसे रोगों का इलाज़ इस तकनीक की सहायता से कियॆ जाने के प्रयास किये गये हैं और शुरुआती सफ़लता भी मिली है| साइबोर्ग के अम जीवन मे आ जाने पर स्कूलॊं मे पढाई के मायने बदल जायेंगे| शिक्षा व्यवस्था कॊ एक बार फिर से निर्मित करना पडेगा| बडी बडी सूचनायें याद करना सेकेन्ड का काम हो जायेगा| ये आविष्कार एक नवजात की तरह है जिसके चिक्ने पांव देखकर उसके भविष्य के बारे मे बोलना जल्दबाज़ी होगी|
     यहाँ पर कुछ समय ठहरकर यह भी सुनिश्‍चित कर लेना चाहिये कि हर एक नयी खॊज अपने साथ कई नयी ज़िम्मेदारियाँ लेकर आती है| अगर उसका इस्तेमाल उन ज़िम्मेदारियोँ को दरकिनार करते हुए किया जाता है तो बहुत ही कल्याण्कारी खोज विनाश का आधार बन जाती है| आज जब चारॊं ऒर पूँजी का बोलबाला है, बाज़ार पूरी तरह से अनियन्त्रित हो चुका है, ऐसे में नये आविष्कारॊं कॆ सही इस्तेमाल की सम्भावना बहुत ही कम हो जाती है| साइबोर्ग पीढी को पोस्ट-ह्यूमन पीढी माना जा रहा है| उत्‍तर- मानव पीढी क मतलब है कि चॆतना का शरीर मे ओर्गॆनिज़्म की तरह होना न कि ऒर्गन की तरह होना| साइबोर्ग से सम्बन्धित अब तक के सबसे विश्वस्यनीय दस्तवेज़ लिखने वाली “डॊना हारावॆ” साइबोर्ग मेनीफ़ेस्टो में लिखती है कि “साइबोर्ग मानवता के अन्तिम बिन्दु होंगे; और मानवीय सह्जीवन के भी”| वहीँ वैज्ञानिक “गुस्तएरसन” कहते हैं “ सबसे बडी चिंता इस बात की है कि चीज़ें नियन्त्रण के बाहर हो चुकीं है, हो सकता है कि हमारा विनाश उसी टैक्नोलोज़ी के द्वारा हो जिसका हमने आविष्कार किया है|” चिंता जायज़ है क्यॊंकि जिस तरह से अभी जब यह साइबोर्ग टेक्नोलोज़ी अभी शैशव अवस्था मे है और इसके सेना और युद्धॊं मे प्रयोगों की बात की जा रही है अगर ऐसे रोबोट जो कि न्य़ूयॊर्क से संचालित होकर दुनियाँ के किसी हिस्से मे दिये गये आदेशॊं का पालन कर सकते है, परमाणु बमॊं से भी ज़्यादा खतरनाक सिद्ध होंगे|
   अंततः , दुनियां भर में जिस तरह सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व पूंजी के आगे नतमस्तक है, वैज्ञानिकॊं को अपने आविष्कारों के सकारात्मक प्रयॊगॊं के प्रति और समाज से सरॊकारॊं के प्रति स्वयं को और अधिक सचॆत और सतर्क बनाना होगा| साथ ही जनता को भी एक हद तक जागरुक होकर आविष्कारॊं से जुडी ज़िम्मेदारियों को समझना होगा| एक परमाणु बम से जहाँ कई नस्लें तबाह की  जा सकती है वहीं इसी तकनीक की मदद से अनगिनत घरॊं को रॊशन भी किया जा सकता है|
                                                                                                                              मेहरबान


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Tuesday, February 15, 2011

सूचना संचार की रेस के मील के पत्थर

  २१ वीं सदी के पहले दस साल सूचना संचार के क्षेत्र में क्रांति के लिये सदैव याद किये जायेंगे। कल्पना कीजिये कि अगर आप उस समय में पैदा हुये होते, जिस समय में राजा महाराजा अपने संदेश किसी विशेष व्यक्ति के हाथों कपडें पर लिखवाकर भेजा करते थे, या प्रेमी प्रेमिकायें को अपने संदेश भेजने के लिये कबूतरों की सहायता लेनी पड़ती थी। कल्पना कीजिये कितना मुश्किल होता होगा, अपने संदेश को उपयुक्त व्यक्ति तक पहुँचाना; कबूतर ने अगर उपयुक्त व्यक्ति को पहचानने में थोड़ी भी गड़्बड़ कर दी, तो सूचना संप्रेषण के उद्देश्य और परिणाम बदल जाते होंगे। साथ ही सूचना संप्रेषण के यह तरीके बहुत धीमे थे और इन माध्यमों की सहायता से सुदूर संदेश नहीं भेजा जा सकता था। २१ वीं सदी में सूचना संप्रेषण की दिशा में न सिर्फ़ नये आयामों को अस्तित्व मिला बल्कि सूचना संप्रेषण की गति में भी अकल्पनीय रूप से विकास हुआ। सूचना क्रान्ति के फलस्वरूप आज हज़ारों किलोमीटर दूर बैठा डॉक्टर भी किसी मरीज़ का ऑपेरेशन सफ़लता और आसानी से कर सकता है। वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बैठे हुये चन्द्रमा पर गये वैज्ञानिकों से बात कर रहे होते हैं। और हम खुद घर पर बैठे, विदेश में चल रहे क्रिकेट मैच का सीधा प्रसारण देख रहे होते हैं या विदेश में रह रहे किसी मित्र को एसएम्एस के माध्यम से “गुड मॉर्निंग” कह रहे होते हैं।
       राजाओं द्वारा किसी विशेष व्यक्ति की की सहायता से कपडे पर लिखकर सूचना संप्रेषण या कबूतरों के माध्यम से चिट्ठी का आदान-प्रदान सूचना-सम्प्रेषण की पहली पीढी या फ़र्स्ट जनरेशन के पूर्व के माध्यम माने जाते हैं। सूचना सम्प्रेषण के क्षेत्र में पहली पीढी के यंत्रो या कहें कि तकनीक का आगमन 19वीं सदी में हुआ। सूचना तकनीक की पहली पीढी के यंत्र डिजिटल तकनीक पर आधारित नहीं थे। इन यंत्रों का आधार एनालोग तकनीक थी। इन यंत्रों की सहायता से सिर्फ़ आवाज़ एक स्थान से दूसरे स्थान तक सिग्नल के रूप में भेजी जाती थी। इस तरह के सूचना सम्प्रेषण में सिग्नल सिर्फ़ एक ही दिशा में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जा सकता था। पुराने वायरलेस यंत्र इसी तकनीक पर आधारित होते थे। इन यंत्रो से बातचीत करते समय पहले एक सिरे पर बैठा व्यक्ति अपनी बात कहता था, और जब पहले की बात खत्म हो जाती थी तो दूसरे सिरे पर बैठा व्यक्ति अपनी बात कहता था। याद कीजिये, पुराने वायरलेस से बात करते समय लोग “ओवर” या ऐसा ही कोई और शब्द अपनी बात खत्म करने के बाद कहा करते थे, ये शब्द अपनी बात के पूरे होने का संकेत होते थे और दूसरे व्यक्ति को बात कहने का इशारा भी। सन 1980 तक इस तकनीक का इस्तेमाल दुनियाँ के कई क्षेत्रो में शुरु हो गया था और इनकी सामाजिक उपयोगिता भी अस्तित्व में आ गई थी। कई मूलभूत समस्याओं कॊ सुलझाने में इस तरह के यंत्रों ने अहम भूमिका निभाई थी। आज भी कई पिछ्ड़े देश इन यंत्रो का उपयोग करते है। इन यंत्रों के क्रियान्वयन में ऊर्जा की अत्यधिक मात्रा की आवश्यक्ता होती थी।
    सन 1980 से ही सेकेन्ड जनरेशन यानि सूचना सम्प्रेषण की दूसरी पीढी के यंत्र भी आने शुरु हो गये थे। सूचना संचार की सेकेन्ड जनरेशन यानि दूसरी पीढ़ी के यंत्रो और तकनीक को 2G (second generation) तकनीक  के  संक्षिप्त नाम से भी जाना जाता है। सूचना संचार की दूसरी पीढी यानि 2G के सभी यंत्र डिज़िटल तकनीक पर आधारित हैं। हमारे मोबाइल फ़ोन इसी पीढी के यंत्र हैं। इस तरह के संचार यंत्रों मे ऊर्जा की खपत पहली पीढी के यंत्रों की अपेक्षा कम होती है, इसलिये ये यंत्र पोर्टेबल होते हैं। साथ ही दूसरी पीढी के यंत्रॊ  की सहायता से सिग्नल का दोतरफ़ा संचार भी सम्भव हो सका, यानि अब दो लोग, एक सिरे पर बैठे व्यक्ति की बात पूरी हुये बिना, या उसे बीच में ही रोक कर अपनी बात कह सकते थे। इस तकनीक की सहायता से सामान्यतः आवाज़ के सिग्नल्स को कूट भाषा में बदल कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता था। मगर दूसरी पीढी के सूचना संचार के यंत्रों की क्षमता सिर्फ़ इतनी ही थी कि आवाज़ को सिग्नल में बदल कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जा सकता था, इसके माध्यम से चित्र या वीडियो नहीं भेजे जा सकते थे। ध्वनि के कूट भाषा में बदलने से संदेश की सुरक्षा और बेहतर हो गयी। पहली पीढी के यंत्रॊं में समान फोन नम्बर के कई यंत्र बनाया जा सकते थे अतः सूचना की सुरक्षा यहाँ एक गम्भीर  समस्या थी। दूसरी पीढी के यत्रों में ऐसा नहीं हो सकता था, इसका प्रमुख कारण यंत्रों का आधार डिज़िटल तकनीक का होना था। डिज़िटल तकनीक का एक बड़ा फ़ायदा यह भी हुआ कि एसएमएस यानि लिखित संदेश भी भेजना संभव हो सका। सेल्यूलर टेलीकोम के क्षेत्र में या कहें कि मोबाइल टेलीफ़ोनी के व्यावसायिक उपयोग के क्षेत्र में 2G नेट्वर्क को पहली बार सन 1991  में फ़िन्लैंड में लॉन्च किया गया था। इन सेवाऒं का आधार GSM प्रणाली थी। बाद में CDMA प्रणाली का भी उद्भव हुआ। यह प्रणालियाँ सिग्नल्स को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने की दो अलग अलग तरह की तकनीकें मात्र हैं। यह तथ्य सर्वविदित है कि वायरलेस संचार विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के माध्यम से होता है। इन विद्युत चुम्बकीय तरंगों की एक अद्वितीय आवृत्ति या फ़्रीक्वेन्सी होती है। चूँकि वातावरण में कई आवृत्तियों की तरंगे पहले से ही मौजूद रहती हैं, अतः वातावरण की तरंगो का  मोबाइल की तरंगों में हस्तक्षेप रोकने के लिये इन्हें एक निर्धारित फ़्रीक्वेन्सी बैंड में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता है। इसी निर्धारित फ़्रीक्वेंसी बैंड को स्पेक्ट्रम कहा जाता है। समस्त मोबाइल ऑपेरेटर कम्पनियों को सूचना संचार के लिये एक निश्चित आवृत्ति बैंड या स्पेक्ट्रम का आवंटन भी किया जाता है। सूचना संचार की दूसरी पीढी यानि 2G के यंत्रो के क्रियान्वयन के लिये आवंटित किये गये फ़्रीक्वेन्सी बैंड को 2G स्पेक्ट्रम कहा जाता है। देश की मोबाइल ऑपेरेटर कम्पनियों को निर्धारित स्पेक्ट्रम से कमाये गये लाभ के बदले  सरकार को विनिमय शुल्क देना होता है, इसका निर्धारण सामान्यतः नीलामी के माध्यम से होता है। पिछ्ले दिनों इसी 2G स्पेक्ट्रम के आवंटन के लिये की नीलामी में भारी गड़्बड़ी का खुलासा हुआ। जिसमें सरकार को पौने दो लाख करोड़ से भी ज़्यादा का घाटा होने के आंकड़े सामने आये।
   2G  यानि दूसरी पीढी के संचार यंत्रों और तकनीक को लगातार और बेहतर और उपभोक्ता की सहूलियतें बढाने के लिये परिवर्धित और विकसित करने का कार्य जारी रहा। इसी विकास के क्रम में सूचना संचार के कुछ और महत्वपूर्ण विकल्पों का अस्तित्व सामने आया। जिनमें से एक GPRS है। GPRS की सहायता से छोटे छोटे सूचना पैकेटों  को भी मॊबाइल की सहायता से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाया जाता है, जो कि ध्वनि के कूट भाषा मे परिवर्तित किये गये सिग्नल से बडॆ होते हैं। साथ ही सूचना पैकेटों के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाये जाने की गति भी पहले की अपेक्षाकृत तेज़ होती है। इसे लोगों ने सूचना संचार की 2.5G यानि सेकेन्ड एंड हाफ़ जनरेशन तकनीक  कहा।
   सूचना संचार की प्रक्रिया में डेटा ट्रान्स्फ़र में तेज़ी की मांग ने और लैपटॉप कम्प्यूटर के सामान्य अनुप्रयोग में आने के साथ मोबाइल वायरलेस सूचना संचार की ज़रूरत ने 2.75G यानि दूसरी पीढी के सम्वर्धित संस्करण बाज़ार में लॉन्च किया गया। जिसे EDGE के रूप में भी जाना जाता है। इसकी सहायता से GPRS की अपेक्षा तीन गुनी डॆटा ट्रान्स्फ़र की स्पीड पायी जा सकती है। एमएमएस की सुविधा भी इसकी सहायता से पाना आसान और बेहतर हो गई। अगर इस विकास क्रम का परिणाम खोजा जाये तो अब पहले से बेहतर और अधिक गति से डेटा ट्रान्सफ़र हो सकता था। लेकिन अब भी ध्वनि यानि आवाज़ सूचना संचार में एक प्रभावी माध्यम थी। दूसरी पीढी के सूचना संचार यंत्रों की सहायता से वीडियो और बडे डेटा पैकेट्स एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से नहीं भेजे जा सकते थे, अर्थात इस प्रकिया की गति बहुत धीमी थी। इस समस्या से निबटने के लिये एक और नयी पीढी के सूचना संचार यंत्रों का उदय हुआ, जिन्हें सूचना तकनीक की 3G यानि तीसरी पीढी कहा गया।
  सूचना संचार के यंत्रॊं की तीसरी पीढी में डेटा ट्रान्सफ़र की गति में क्राँतिकारी परिवर्तन आया है। कई देशों में उपभोक्ता मोबाइल पर वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिंग की सुविधा का लाभ ले रहे हैं। इसकी सहायता से उपभोक्ता अपने मोबाइल पर ही टेलीविज़न देखने का आनन्द उठा सकता है। इस तकनीक का टेलीमेडीसिन के क्षेत्र में भी उपयोग हो रहा है, जिसमें डॉक्टर सुदूर ऑपेरेशन थियेटर में मरीज़ का ओपेरेशन कर सकता है। उच्च स्तर की मीटिंग्स भी लोग सुदूर बैठकर विडियो कॉन्फ़्रेन्सिग की सहायता से करने लगे हैं। भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने भी भारत में मोबाइल ऑपेरेटर कम्पनियों से जुलाई के अन्त तक वीडियो कॉलिंग की सुविधा आम उपभोक्ताऒं को देने का निर्देश दिया है। 3G की सहायता से क्षेत्रीय सुविधाऒं में भी वृद्धि की जा सकती है। जैसे कि कई जनकल्याणकारी और सामान्य ट्रेनिंग उपभोक्ताऒं को फोन के माध्यम से दी जा सकती है। सूचना संचार की तकनीक में इतनी तेज़ी से विकास हो रहा है कि इस साल के अन्त तक सूचना संचार की चौथी पीढी के यंत्र भी बाज़ार में आने की सम्भावना है।
  सूचना संचार की चौथी पीढी के यंत्रॊं की सहायता से अत्यधिक तेज़ गति से डेटा ट्रान्सफ़र किया जा सकेगा। इसकी गति तीसरी पीढी के मोबाइल कनेक्शन्स से कई गुना अधिक होगी। चौथी पीढी के सूचना संचार की सबसे अहम बात यह होगी कि सूचनायें “कहीं भीं और कभी भी” की तर्ज़ पर उपलब्ध होंगी। इस नेटवर्क की सहायता से फोटो, वीडियो, और बडे बडे सूचना पैकेट आदि सब मोबाइल सेट की सहायता से पलक झपकते ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाये जा सकेंगे। इस व्यवस्था में मोबाइल सेट्स को भी “आईपी एड्रेस” इंटरनेट प्रोटोकाल पता दिया जायेगा। ऐसे में मोबाइल सेट भी लैपटॉप की तरह हो जायेंगे। मगर इन्हें एक बार में सिर्फ़ एक नेट्वर्क से ही जोडा जा सकेगा।
 सूचना संचार की पाँचवीं पीढी के बारे में अभी से कहा जा रहा है कि पाँचवी पीढी के आते ही मोबाइल सेट सूचना संचार के क्षेत्र में हमारे दिमाग की तरह हो सकेगा। यह एक ही समय कई तरह की नेटवर्क प्रणालियों से जुड़ सकेगा, जैसे GPRS, EDGE, WLAN, WiFi आदि। इसे संज्ञानात्मक नेटवर्क की संज्ञा दी जा रही है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में सूचना संचार की गति इतनी तीव्र हो जायेगी कि डेटा ट्रान्स्फ़र की प्रक्रिया में डेटा की प्रक्रिति पर नज़र रख पाना बहुत मुश्किल होगा। देशों कीं सुरक्षा एजेंसियाँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे डेटा पर नज़र रख पाने में असमर्थ होंगीं। याद हो कि अभी कुछ दिनों पहले मोबाइल बनाने वाली कम्पनी “मोबाइल इन मोशन”, जो कि ब्लैकबेरी फोन बनाती है, को भारत सरकार ने बैन करने की बात कही थी क्योंकि इन फोन्स पर की जा रही बातचीत या अन्य डेटा ट्रान्स्फ़र के बारे में सुरक्षा एजेन्सियां जानकारी नहीं जुटा पाती थीं, जिस कारण से इनका उपयोग नकारत्मक कार्यों में होना शुरु हो गया था। चौथी और पाँचवी पीढी के सूचना संचार में भी इसी तरह की समस्यायें भी आयेंगीं। इसी कारण से कई देश इन सुविधाऒं के बाज़ार में लाने पर सहमत नहीं हैं। वैज्ञानिक और कम्प्यूटर इंजीनियर्स इस ओर भी शोध कार्य कर रहे हैं। आशा है कि डेटा ट्रान्सफ़र की गति को तेज़ करने की अंधी दौड़ में सामाजिक हितों का पूरा खयाल रखा जायेगा।