Thursday, October 20, 2011

ग्लोबल वॉर्मिंग समस्या के निदान के लिये महत्वाकाँक्षी प्रयोग

                                                                                               --मेहेर वान



      पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या ने विश्व स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। जहाँ देशों की सरकारें और आम जनता भी अब ग्लोबल वॉर्मिंग के विषय के बारे में चिंतित नज़र आती हैं, वहीं विश्व भर के पर्यावरण वैज्ञानिकों ने भी जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों पर विशेष रूप से शोध कार्य शुरु कर दिया है। जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिये ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करनी बहुत ही आवश्यक है। वर्तमान परिस्थितियों में यह कार्य में बहुत ही कठिन है। ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन उत्सर्जन का सीधा सम्बन्ध उद्योग जगत से है। फ़्रिज़ और एयर कंडीशनर एक तबके के जीवन की महत्वपूर्ण ज़रूरतें बन चुके हैं। तमाम उद्योगों और आम जीवन के कई उपकरणों का उपयोग अब हम बन्द नहीं कर सकते। यही कारण है कि अमेरिका जैसे विकसित देश विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन की मात्रा कम करने का दबाव बनाते रहते हैं। यह अलग बात है कि अब भी विकसित देशों की तुलना में विकासशील देश बहुत कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं। इस दबाव के पीछे विकसित देश अक्सर यह दलील भी देते हैं कि विकसित देशों में जीवन स्तर इतना ऊँचा हो चुका है कि उनका कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया जा सकता। साथ ही विकसित देश जीवन स्तर भी कम नहीं करना चाहते। इस कारण कार्बन उत्सर्जन की मात्रा बहुत कम करके जलवायु परिवर्तन रोकने का सपना निकट भविष्य में पूरा नहीं हो सकता। अतः इन परिस्थितियों में ग्लोबल वार्मिंग पर पूरा नियंत्रण हो पाना भी असंभव सा है।
       अमेरिका की सहायता से आइसलैंड के वैज्ञानिकों का एक दल इस विडम्बना से निबटने की तैयारी में है। यह दल आइसलैंड में ही उन स्थानों पर कुछ परीक्षण कर रहा है, जहाँ पिछले साल फ़ूटे ज्वालामुखियों से निकली राख और हानिकारक गैसों की मात्रा बहुत अधिक है। आइसलैंड की राजधानी के पास में ही स्थित रेकजाविक भूतापीय ऊर्जा केन्द्र के आसपास यह प्रयोग किया जायेगा। इस प्रयोग में लगभग 11 मिलियन डॉलर का खर्च आने की सम्भावना है। यहाँ यह भी बताते चलें कि आइसलैंड देश में भूतापीय रियक्टर्स ऊर्जा के प्रमुख स्त्रोतों में से एक हैं। इस तरह से उत्पन्न हुयी ऊर्जा से कार्बन उत्सर्जन बहुत कम मात्रा में होता है। इस नवीनतम प्रयोग के बाद आइसलैंड कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में सशक्त कदम उठाने वाला प्रमुख देश बन जायेगा। इस प्रयोग को ”कार्बफ़िक्स” नाम दिया गया है।
इस प्रयोग कॊ वातावरण में कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करने की दिशा में क्राँतिकारी प्रयास माना जा रहा है। 
      इस प्रयोग के तहत वैज्ञानिक वातावरण से कार्बन डाई आक्साइड जैसी महत्वपूर्ण ग्रीन हाउस गैस को वातावरण की तमाम गैसों से अलग करके कुछ लम्बे पाइपों की सहायता से भूगर्भ में हमेशा के लिये भंडारित कर देंगे। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भाग वातावरण की तमाम गैसों के मिश्रण से कार्बन डाई ऑक्साएड को अलग करना है, जिसके लिये वैज्ञानिक अत्यन्त आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेंगे। कार्बन डाई ऑक्साइड गैस ग्लोबल वॉर्मिंग में सबसे खतरनाक गैस मानी जाती है, इसीलिये इसपर नियंत्रण पाने की दिशा में लगतार कदम उठाये जाते हैं। पृथक की गयी कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को लम्बे पाइपों के जरिये भूगर्भ में सोलह हज़ार फ़ीट नीचे ज़मीन के अन्दर पानी में मिलाकर इतनी ही गहराई में फ़ैलीं बासाल्ट की चट्टाअनों पर बिखेर दिया जायेगा।  कार्बन डाई ऑक्साइड और पानी मिलकर एक प्रकार ले अम्ल का निर्माण करते हैं जो को बासाल्ट पत्थर से रासायनिक अभिक्रिया करके चूना पत्थर बना देता है। खास बात यह है कि यह चूना पत्थर हानि रहित होता है और इसकी निर्माण प्रक्रिया पूर्णतः प्राकृतिक होती है। इस प्रयोग से धरती को कोई खतरा नहीं होना चाहिये, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है।
        हाँलाकि, इस क्राँतिकारी प्रयोग के परिणाम आने में अभी वक़्त लग जायेगा। मगर इस प्रयोग से जुडे वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रयोग भविष्य में बहुत ही आसानी से और बहुत ही कम समय में पृथ्वी पर कार्बन की मात्रा को नियंत्रित कर देगा। अगले छः से बारह महीनों में लगभग दो हज़ार टन कार्बन डाई ऑक्साइड धरती के अन्दर भंडारित करके बासाल्ट से चूना पत्थर बनाने की योजना है। यह मात्रा कार्बन डाई ऑक्साइड की बहुत बड़ी मात्रा है, जो कि आइसलैंड के वातावरण में बहुत स्पष्ट परिवर्तन लायेगी। इस महत्वाकाँक्षी प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सिगुर्दर गिस्लसन का कहना है कि यह यह प्रयोग छः से बारह महीनों तक चलेगा और इसके बाद ही हम इस प्रयोग के निष्कर्षों के बारे में कुछ कह पायेंगे। लेकिन यह हमारे लिये बहुत ही महत्वाकाँक्षी प्रोजेक्ट है और इसके ज़रिये हम युवा वैज्ञानिकों को अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल विश्व की चुनौतियों से निबटने के लिये करने का मौका देंगे।
      इस प्रयोग के बारे में कोलंबिया विश्वविद्यालय के डॉ. वैलेस ब्रोकर का कहना है, “हम चाहे पचास साल बाद कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का भण्डारण करें, लेकिन हमें करना यही पड़ेगा। क्योंकि वर्तमान परिस्थियों में कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना बहुत ही असंभव कार्य है”। इसी प्रोजेक्ट से सम्बन्धित द्ल के एक और सदस्य डॉ. बर्गर सिग्फ़ुसन कहते हैं कि यह पता करने में काफ़ी वक़्त लग जायेगा कि बासाल्ट की चट्टानों के ऊपर पानी और गैस का मिश्रण किस तरह फैला है, और यह किस हद तक रासायनिक अभिक्रिया करता है, मगर यह प्रक्रिया प्राकृतिक है, जिसके कोई नुकसान नज़र नहीं आते।
      इसके अलावा कुछ वैज्ञानिक इस तरह के प्रयोगों को अतिवादी प्रयोगों की संज्ञा देते हैं। इनका मानना है कि इस तरह के प्रयोग भले ही निकट भविष्य में हानि रहित प्रतीत होते हों परन्तु धरती इस तरह के भण्डारण और अचानक बदलावों के प्रति सावधान नहीं हैं। इस तरह के प्रयोगों का सबसे बड़ा खतरा यही है कि इन प्रयोगों के सम्भावित परिणामों के बारे में पहले से कुछ नहीं कहा जा सकता। इन प्रश्नों के जबाब में कार्बफ़िक्स प्रयोग के एक वैज्ञानिक का कहना है कि कार्बन डाई आक्साइड गैस का पृथ्वी के अन्दर भण्डारण नया नहीं है, नॉर्वे की प्राकृतिक गैस की खदानों से उत्सर्जित कार्बन डाई ऑक्साइड पहले से ही उत्तरी सागर के पास कई सालों से भण्डारित की जा रही है।

        

Tuesday, September 6, 2011

डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग- (भाग-२)



डी.एन.ए. की खोज की कहानी बहुत नयी नहीं है, यह यात्रा उन्नींसवीं शताब्दी में शुरु हुयी थी। जब लोग जीन्स और आनुवाँशिकता के स्त्रोत के बारे में जिज्ञासु थे, और बहुत कुछ जानते भी नहीं थे। 1860 के बाद तक जीन रहस्यमयी ब्लैक-बॉक्स से कम नहीं था। लोग सोचते थे कि जीन प्रोटीन से मिलकर बना होना चाहिये। क्रोमोसोम में वास्तव में कुछ रहस्यमयी ही था, जिसे न्यूक्लिक एसिड यानि डी.एन.ए. के रूप में पहचाना गया। डी.एन.ए. को मानव शरीर से सबसे पहले स्वीडन के एक डॉक्टर फ़्रेडरिक मिशचर ने पृथक किया था। 1869 में डॉ. मिश्चर जर्मनी के ट्यूबिंगन शहर में घायल सैनिकों का इलाज़ और कुछ व्यक्तिगत शोध कर रहे थे। वहीं उन्होंने एक घायल सैनिक की पट्टी में लगे मवाद से उस सैनिक मरीज़ का डी.एन.ए. पृथक किया था। डॉ. मिशचर का अन्दाज़ा था कि शायद डी.एन.ए. ही आनुवाँशिकता की कुँजी है और यह आनुवाँशिकता की भाषा को उसी तरह दर्शा सकता है जैसे कि किसी भाषा के 20-30अक्षरों के ज़रिये पूरी भाषा का आधार तय होता है। लेकिन, डॉ. मिशचर इसे व्यक्तिगत विश्वास ही रख पाये और तब इस सम्बन्ध में कोई बड़ी खोज नहीं हुयी। साल दर साल बीतते चले गये। 
  बींसवी शताब्दी में जेम्स वाटसन नामक एक युवा वैज्ञानिक था जो यह मानता था कि जीन प्रोटीन से नहीं बल्कि डी.एन.ए. से बने होते हैं, लेकिन विज्ञान और व्यक्तिगत विश्वास में तब तक कोई सम्बन्ध होता जब तक व्यक्तिगत विश्वास को ठोस भौतिक आधारों पर सही न सबित कर दिया जाये। अपने व्यक्तिगत विश्वास को सही साबित करने के लिये जेम्स वाटसन कई संस्थानों से होते हुये और असंतुष्ट होकर सही संस्थान और साथियों की खोज में कैवेन्डिश लेबोरेटरी पहुँचा, जहाँ उसकी मुलाकात उसी के स्तर की प्रतिभा वाले युवा वैज्ञानिक “फ़्राँसिस क्रिक” से हुई। फ़्राँसिस क्रिक तब तक पैतीस साल का हो चुका था और उसके पास अब तक पी.एच.डी. की डिग्री भी नहीं थी। जिस इन्स्ट्रुमेंट यानि वैज्ञानिक उपकरण पर वह काम करके, गर्म जल की अत्यधिक दबाव की स्थिति में श्यानता(Viscosity) मापना चाह रहा था, वह उपकरण जर्मनी के द्वारा उसके विश्वविद्यालय में की गयी बमबारी में ध्बस्त हो गया था। यह बात द्वितीय विश्व युद्ध की है।  परेशान होकर वह भौतिकी के साथ साथ जीवविज्ञान में भी रुचि लेने लगा। उसकी आदत थी कि वह अपनी परेशानियों से ज़्यादा दूसरों की परेशानियों की फ़िक्र किया करता। इसी आदत ने उसे जीन और डी.एन.ए. से परिचित करवाया। इसी के साथ जब तेजस्वी और जीवविज्ञान की समझ रखने वाला अमेरिकी “जेम्स वाटसन” और मेधावी, भौतिकी की समझ रखने वाला, मगर लक्ष्य हीन ब्रिटिश “फ़्राँसिस क्रिक” की जोड़ी बनी तो यह जोड़ी वैज्ञानिक इतिहास की सबसे बेहतरीन और सफ़ल जॊड़ी के रूप में उभरकर सामने आयी। इसी जोड़ी ने सन 1953 में डी.एन.ए. की संरचना की खोज की घोषणा की। “क्रिक” ने एक कार्यक्रम में खुश होकर कहा था “हमने जीवन का रहस्य खोज लिया है” । लेकिन “वाट्सन” को अब भी यह डर था कि उन लोगों से कोई बड़ी भूल तो नहीं हो गई है जिसके कारण इतने सनसनीखेज परिणाम आ रहे हैं। निश्चित रूप से वे लोग गलत नहीं थे और जीव विज्ञान के एक नये काल की शुरुआत हो चुकी थी। बाद में पता लगा कि डी.एन.ए. में एक कोड होता है जो कि दोहरी कुँडली में सीढियों की तरह सजा रहता है। इस रहस्यमयी कोड को डिकॊड यानि कि इसका रहस्य समझने की काफ़ी कोशिश की गयी। कई असफ़लताओं के बाद दो वैज्ञानिकों “मार्शल नीरेनबर्ग” और “जॉन मथाई” ने डी.एन.ए. की कोडिंग का रहस्य खोज लिया। यह भी वैज्ञानिक दुनियाँ की एक सनसनीखेज घटना थी। सन 1965, तक डी.एन.ए. के सभी कोड जाने जा चुके थे और इस तरह नये आनुवाँशिकी युग का नीव रखी जा चुकी थी।
इन सब खोजों का जैविकी के नज़रिये से बहुत महत्व था और ये खोजें बहुत क्रांतिकारी और सनसनी के रूप में आविष्कारित हुयीं थी, मगर फिर भी इन खोजों का मानव की अद्वितीय पहचान से कोई सम्बन्ध नहीं था। सन 1985 तक यह सिद्ध नहीं हो पाया था कि हर व्यक्ति का डी.एन. ए. क्रम अलग अलग होता है, इसलिये यह धारणा प्रबल थी कि हर मानव का डी.एन.ए. क्रम (DNA sequence) समान होता है। सन 1985, में लिसेस्टर विश्व्वविद्यालय के डॉ. एलेक जेफ़री ने डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग की खोज करके एक बार फिर सनसनी फ़ैला दी। एलेक जैफ़री ने सिद्ध किया, कि हर एक का डी.एन.ए. क्रम किसी दूसरे से एकदम अलग होता है, चाहे जैविक रूप से वे एक दूसरे के सगे-सम्बन्धी ही क्यों ना हो। माँ और बेटा या भाई- भाई के डी.एन.ए. क्रम स्पष्ट रूप से अलग अलग होते हैं। यह बात और है कि बेटे के डी.एन.ए. क्रम माँ-पिता पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं मगर समान नहीं होते। इसी स्पष्टता और अद्वितीय विशेषताओं की फ़ोरेंसिक विज्ञान और स्पष्ट रूप से पहचान सुनिश्चित करने में ज़रुरत भी थी। यहीं से डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग की सहायता से मानव विशेष की पहचान का दौर शुरु हुआ। आज विश्व के लगभग हर देश के न्यायालय डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिग के साक्ष्यों कों सबसे ज़्यादा सटीक और विश्वस्यनीय मानते हैं। भारत विश्व का ऐसा तीसरा देश था जहाँ डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग को देश के न्यायालयों में उत्कृष्ट और सबसे अधिक विश्वस्यनीय साक्ष्य के रूप में मान्यता मिली थी और हमारे देश में अब तक कई बड़े और विवादास्पद मामले इस तकनीक से सुलझाये गये हैं। 


इस तकनीक को भारत में इस मुकाम तक लाने में वैज्ञानिक और औद्यैगिक अनुसंधान परिषद के Center for Cellular and Molecular Biology, हैदराबाद के डॉ. लालजी सिंह को जाता है। डॉ. लालजी सिंह ने न सिर्फ़ भारत में बल्कि, डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक को बेहतर बनाने में सतत वैज्ञानिक स्तर पर योगदान दिया, साथ ही उन्होंने इस तकनीक को भारतीय न्यायालयों की न्यायप्रक्रिया में सहभागी बनाने में भी सक्रिय योगदान दिया, जिस कारण भारत इस तकनीक का न्यायालयों में उपयोग करने वाला अमेरिका और ब्रिटेन के बाद विश्व का तीसरा देश बना।
  वर्तमान में जीवन के तमाम क्षेत्रों में व्यक्ति की सही पहचान करने के लिये डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग का इस्तेमाल होता है। इस तकनीक की सहायता से वर्तमान में सबसे अधिक उत्कृष्टता और विश्वस्यनीयता के साथ जीव की पहचान की जाती है। आपराधिक मामलों में घटना स्थल पर मिले खून के छींटॊं से डी.एन.ए. सेम्पल एकत्र करके उनका मिलान अभियुक्यतों के डी.एन.ए. से करके सही अपराधी को पहचाना जाता है। यह प्रक्रिया भारत और विश्व के अन्य तमाम देशों में कई महत्वपूर्ण मामले सुलझा चुकी है। आजकल बाज़ार में नकली उत्पादों की भरमार है। हर एक उत्कृष्ट उत्पाद का नकली संस्करण बाज़ार में उपलब्ध है। इस समस्या से मिबटने के लिये कम्पनियों ने अपने उत्पाद के रैपर पर होलोग्राम देना शुरु कर दिया। लेकिन, इससे भी बेहतर तकनीक उपलब्ध कराई डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक ने। आज विश्व की सर्वश्रेष्ठ कम्पनियाँ अपने सर्वोत्कृष्ट उत्पादों के कवर के नीचे, अपनी जानकारी वाले डी.एन.ए. क्रम से युक्त पदार्थ रख देती हैं, जिससे समय समय पर बाज़ार में संशय होने पर उत्पाद की सत्यता की जाँच आसानी से डी.एन.ए. डिकोडिंग करके की जाती है। जो लोग अच्छी नस्ल के कुत्ते, तेज़ दौड़ने वाली असली नस्ल के घोड़े या अन्य जानवर पालते हैं वो जानवर खरीदने से पहले ही उस जानवर की डी.एन.ए. क्रम का विश्लेषण करवा करके यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि जानवर जिस नस्ल का बताकर दिया जा रहा है, वस्तुतः वह उस नस्ल का है या नहीं।


 डी.एन.ए. क्रम विश्लेषण की तकनीक में अब इतनी प्रगति हो चुकी है कि रक्त की अल्प मात्रा या बाल की जड़ का टुकडा यानि उपयुक्त जीव की कोशिकाओं का छोटा सा टुकड़ा भी इन विश्लेषणों के लिये पर्याप्त है। अमेरिकी फ़ौज में हर नये सैनिक की भर्ती के समय ही उसका डी.एन.ए. सैम्पल ठंडे भंडारग्रहों में भंडारित कर लिया जाया है। जब कॊई सैनिक किसी युद्ध में मारा जाता है और उसकी पहचान उसके बिखर चुके टुकड़े टुकडे हो चुके शरीर से नहीं हो पाती है तो उस बिखरे हुये शरीर से कोशिकायें निकालकर उनका डी.एन.ए. विश्लेषण करवाकर, भंडार गृह में रखे गये सैम्पल्स से मिलान करवा कर मृतक सैनिक की सही पहचान की जाती है। आज इस तकनीक का इस्तेमाल पौधों की उत्कृष्ट संकरित प्रजातियाँ बनाने में या उनके उद्गम की सही पहचान में, जानवरों के लिंग परीक्षण और वन्य जीव संरक्षण में किया जाता है। इसके साथ ही इसका इस्तेमाल परिवारों के निजी मामलों को सुलझाने में जैसे- किसी बच्चे के असली पिता को पहचानने में, बच्चे के खो जाने की स्थिति में उसकी सही पहचान करने में या अस्तपालों में बच्चे के जन्म के समय बच्चा बदल जाने की स्थिति में सही माता पिता की सटीक पहचान में डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल भारत और विश्व में बड़ी विश्वस्यनीयता के साथ हो रहा है। 
बेशक़ डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिटिंग तकनीक ने जैविक पहचान को सुनिश्चित करने की दिशा में क्राँतिकारी बदलाव लाया है। लेकिन अभी यह तकनीक आम जनता के रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहचान साबित करने के लिये उपयुक्त नहीं है। डी.एन.ए.क्रम की पहचान हमारे जैविक  इतिहास और आनुवाँशिकता से जुडी पहचान है। इस पहचान का इस्तेमाल “विशिष्ट पहचान प्राधिकरण” द्वारा संचालित किये जा रहे हर एक भारतीय निवासी की पहचान सुनिश्चित करने के क्रम में नहीं किया जा सकता। इसके कई वाजिब कारण हैं। यह अभी अपेक्षतया बहुत मँहगी तकनीक है। इस तरह से पहचान का प्रमाणन सिर्फ़ उच्च कोटि की विश्वस्यनीय प्रयोगशालाओं में ही हो सकता है। एक अरब से भी अधिक लोगों का डी.एन.ए. डाटा एकत्र करना और उसे संग्रहित करना बहुत ही चुनौती और खतरे भरा कार्य है। किसी व्यक्ति के डी.एन.ए. डाटा में की गयी छॆड़्छाड़ के बहुत ही गंभीर परिणाम होंगे। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिये कि डी.एन.ए. और जीनोम के संबन्ध में पूरे विश्व में जिस गति के साथ शोध कार्य चल रहा है, उससे यह प्रतीत होता है कि शायद वह दिन दूर नहीं जब मानव डी.एन.ए. को परिवर्तित करने की विधि जान जाये। अगर ऐसा हो जाता है तो इस डी.एन.ए. फ़िंगर प्रिटिंग तकनीक विश्वस्यनीय नहीं रहेगी। उस समय वैज्ञानिकों को अपराधियों की पहचान के नये तरीके खोजने पड़ेंगे। डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिटिंग तकनीक के सम्बन्ध में ऎसे तमाम खतरों और जटिलता को देखते हुए इसे भारतीय अद्वितीय पहचान प्राधिकरण ने अद्वितीय पहचान कार्यक्रम की परिधि से अब तक बाहर रखा है।   
                               --Meher Wan

• डी.एन.ए.- फ़िंगरप्रिंटिंग-( भाग-१)



2०वीं और २१वीं सदी में समय बहुत तेज़ी से बदला और समय के साथ मानव की पहचान सुनिश्चित करने के मानक भी बदलने पड़े। एक समय फोटो पहचान पत्र ने ऑफ़िसों, खुफ़िया संस्थानों और रक्षा-अनुसंधान से जुड़े संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों की पहचान सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया था, लेकिन डिजिटल फ़ोटोग्राफ़ी के अस्तित्व में आने के बाद फोटो से छेड़-छाड़ इतनी आसान हो गई कि फोटो पहचान पत्रों की विश्वस्यनीयता खतरे में पड़ गई। इसके बाद सर विलियम हर्शेल ने, जो कि 19वीं सदी के ब्रितानी प्रशासक थे, उँगलियों के निशानों को मानव पहचान का आधार साबित किया। इस तरह बींसवीं सदी के अन्त तक उंगलियों के निशान रोज़मर्रा के कार्यों में सामान्य जनता की पहचान सुनिश्चित करने का साधन बने रहे, मगर ज्ञान के विस्तार से कुछ लोगों ने इस तकनीक के दुरुपयोंगों को भी ढ़ूंढा। तब पहचान का नया आधार तलाशा जाने लगा। तत्पश्चात, आँख की पुतली का फोटोग्राफ़ पहचान का आधार उभरकर सामने आया। इसी बीच फ़ोरेंसिक, आपराधिक या अन्य पहचान सम्बन्धी मामलों में डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग का भी उद्भव हुआ। डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग के आविष्कार के पीछे मूल रूप से आपराधिक और फ़ोरेंसिक मामलों की जटिलता थी, जिसे कि वैज्ञानिक सुलझाना चाह्ते थे, मगर अब कुछ लोग इसे सामान्य जन के लिये भी पहचान का एक सशक्त आधार मान रहे हैं। समय के साथ इस तकनीक ने भी विस्तार पाया, इस तकनीक को आसान बनाने के प्रयास हुये, जिनमें से कई प्रयास बड़े स्तर पर सफ़ल भी हुये, इन प्रयासों के कारण यह तकनीक आज भारत समेत विश्व के तमाम न्यायालयों में पहचान सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण साधन मानी जाती है।    

डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक के पीछे जैव-तकनीकी के विकास की लम्बी कहानी है। असल में इस तकनीक की खोज से पहले, मानव या जीव की पहचान साबित करने में इसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में नहीं सोचा गया था। ऐसा कहना ज़्यादा उचित होगा कि वैज्ञानिक मानव शरीर सम्बन्धी विषयों पर विस्तृत अध्य्यन कर रहे थे, इसी बीच उन्हें कुछ परिणाम मिले, जिनके आधार पर डी.एन.ए. फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक का उद्भव हुआ। यह एक तरह का संयोग ही था और उस समय यह खोज किसी सनसनी से कम नहीं थी। 20वीं सदी की शुरुआत तक अपराधी उँगलियों के निशानों के ज़रिये पकड़े जाने और अपराध के कारण सजा भुगतने के बारे में जान चुके थे। इससे पहले कई अपराधी अपनी उँगलियों के निशानों के अपराध के स्थान पर छूट जाने के कारण पकड़े गये थे और सजा पा चुके थे। इसीलिये नये अपराधियों ने ऊँगलियों के निशान अपराध के स्थान पर छोड़ने से बचने की तरकीब खोजनी शुरु की। कुछ अपराधियों ने हाथों में ग्लॉव्स पहनकर इससे बड़ी आसानी से छुटकारा भी पा लिया। अब ऊँगलियों के निशानों से अपराधियों को कॊई डर नहीं था।


 इस तरह, वैज्ञानिकों ने अपराधियों को पहचानने, पकड़ने की नयी तरकीब खोजनी शुरु की। चूँकि, कत्ल, जैसे अपराधों में सामान्यतः खून बहुत बिखरा पड़ा मिलता था, और उँगलियों के निशान जलकर, कटकर, ग्लॉव्स पहनकर या किसी अन्य कारण से खत्म किये या छुपाये जा सकते थे। ऐसे में खून एक महत्वपूर्ण पदार्थ था, जिसका कि व्यक्ति की पहचान में उपयोग किया जा सकता था। लेकिन, सन 1901  तक मानव शरीर के बारे में हमारी समझदारी इतनी स्पष्ट नहीं हो पायी थी कि हम रक़्त‍ को मानव पहचान का सक्षम साधन मान सकें। असल में 1901ईo  तक वैज्ञानिकों के बीच यह मत था कि हर मानव का रक्त एक दूसरे के एकदम समान होता है। यह एक ऐसा विश्वास था जिसके कारण डॉक्टर्स किसी भी मरीज़ के शरीर में ज़रूरत पड़ने पर किसी का भी रक्त डाल देते थे, और यह रक्त आपस में कई बार अभिक्रिया करके मरीज़ की जान ले लेता था। 19वीं शताब्दी में इस तरह अनगिनत मरीज़ मारे गये। जिन्हें सिर्फ़ इसलिये नहीं बचाया जा सका, क्योंकि हम रक्त समूहों के बारे में नहीं जानते थे और यह भी नहीं जानते थे कि कुछ रक्त समूह आपस में एक दूसरे से अभिक्रिया करके मरीज़ की जान ले लेते हैं। 


वस्तुतः, मानव रक्त चार प्रकार का होता है A, B, AB, और O| इन चार समूहों के बारे में सबसे पहले 1901 में वैज्ञानिक “कार्ल लैण्डस्टेनर” ने बताया और इनके सम्बन्ध में प्रयोगों का प्रदर्शन किया। यह एक महत्वपूर्ण खोज थी, मगर इसका भी मानव की पहचान सुनिश्चित करने से कॊई ख़ास लेना देना नहीं था। यह पूर्णतः जैविकी से सम्बन्धित खोज थी, इस खोज के कारण हर रोज हो रहीं तमाम मौतों से लोगों को बचा लिया गया। डॉक्टरों ने बिना रक्त समूह की जाँच किये रक्त को मरीज़ के शरीर में डालना बन्द कर दिया। लेकिन, ये रक्त समूह सिर्फ़ चार प्रकार के थे और औसत रूप से एक चौथाई जनसंख्या का रक्त समूह समान था, इस तरह किसी आपराधिक घटना में यदि १० लोगों को गिरफ़्तार किया जाये तो दस में से पाँच के रक्त समूह समान होने की बहुत अधिक सम्भावना है। यह बात ज़रुर है कि यदि घटना स्थल पर मिले रक्त का रक्त समूह अभियुक्त के रक्त समूह से नहीं मिलता तो घटना में उस व्यक्ति के शामिल होने की सम्भावना खत्म हो जाती है। अतः रक्त समूह के आधार पर किसी व्यक्ति की त्रुटिरहित पहचान करने के लिये न सिर्फ़ अपर्याप्त था, बल्कि स्वपन लोक की कल्पना की तरह था।
घटना स्थल से मिले अवशेषों में रक्त ही एक ऐसा जैव-शारीरिक पदार्थ था जिससे मानव पहचान के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों को सबसे ज़्यादा आशायें थीं, साथ ही वैज्ञानिकों की नज़र में मानव चिकित्सा की नज़र से भी रक्त एक महत्वपूर्ण पदार्थ है। इस कारण से वैज्ञानिक चिकित्सा और जीव शरीर विज्ञान की नज़र से रक्त की विशेषताऒं का विश्लेशण कर रहे थे। इसी के साथ-साथ फोरेंसिक क्षेत्र के वैज्ञानिक भी अपने लिये शोध कर रहे थे। समय के साथ वैज्ञानिकों ने रक्त की अन्य महत्वपूर्ण विशेषताओं को खोजा। जिनमें से 1937 में हुय़ी एक महत्वपूर्ण खोज थी रक्त के Rh गुणाँक (factor) की खोज। मानव रक्त में ऐसे 100 गुणाँक होते हैं, जिनकी सहायता से रक्त के आधार पर व्यक्ति की बहुत त्रुटिहीनाता के साथ सही पहचान हो सकती है। यह खोज भी एक क्राँतिकारी खोज थी, और इस तकनीक की सहायता से 99% से भी अधिक निश्चितता के साथ पहचान साबित की जा सकती थी। फिर भी, जिस स्पष्टता और निश्चितता (यानि 99.999%) की माँग किसी भी देश का न्यायालय करता है, या जीवन मरण के फ़ैसले देने के लिये जिस स्तर की स्पष्टता और सुनिश्चितता होनी चाहिये, वह स्पष्टता और सुनिश्चितता उपरोक्त तकनीक उपलब्ध कराने में अक्षम थी। अतः इस तरह शोध कार्य चलता रहा।
                                                               --Meher Wan

Wednesday, June 1, 2011

सिगमंड फ़्रायड के नाम अल्बर्ट आइंस्टीन का राजनैतिक पत्र

( यह व्यक्तिगत पत्र “आइन्स्टीन” द्वारा सन १९३१ या १९३२ की शुरुआत में “सिगमंड फ़्रायड” को लिखा गया था। जो कि “Mein Wettbild, Amsterdam: Quarido Verlag” में सन १९३४ में प्रकाशित हुआ था।)





प्रिय प्रोफ़ेसर फ़्रायड,

        आपमें सत्य को जानने समझने की उत्कंठा, जिस तरह अन्य उत्कंठाऒं पर विजय प्राप्त कर चुकी है, प्रशंसनीय है। आपने अत्यन्त प्रभावी सुबोधगम्यता से दर्शाया है, कि मानव चित्त में प्रेम ऐइर जीवटता के साथ युद्धप्रिय और विनाशकारी मूलप्रवृत्तियाँ कितने अविलग ढंग से बंधी हैं। लेकिन, ठीक उसी क्षण वाद विवाद के अकाट्य तर्कों में मानवता की युद्ध से बाह्य और आन्तरिक मुक्ति के महान लक्ष्य हेतु ह्गहरी अभिलाषा भी प्रकाशमान होती है। इस महान लक्ष्य की घोषणा जीसस क्राइट्स से लेकर गोथे और कान्ट तक, सभी नैतिक और आध्यात्मिक नेताओं के द्वारा किन्हीं अपवादों के बिना तथा देश काल से परे होकर की गयी थी। क्या यह महत्वपूर्ण नहीं है कि इन लोगों को वैश्विक स्तर पर नेताओं के रूप में स्वीकार किया गया, यद्यपि यह भी कि मानवीय मुद्दों की विषय वस्तु को साँचे में ढालने के उनके प्रयासों में (जनता की) सहभागिता तो हुयी, मगर अत्यंत छोटी सफलता के साथ?
         मैं स्वीकार करता हूँ कि वे महान लोग, जिनकी उपलब्धियाँ कैसे भी किसी क्षेत्र तक प्रतिबन्धित कर दी जातीं हैं, वही उपलब्धियाँ उन्हें अपने आसपास के लोगों से उन्हें ऊँचा उठा देती हैं, समान आदर्श के अपरिहार्य विस्तार का सहभागी भी बनाती हैं। परन्तु, उनका प्रभाव राजनीतिक घटनाओं की विषयवस्तु पर कम है। यह करीब करीब ऐसे प्रतीत होता है, जैसे उसी क्षेत्र को हिंसा और राजनीतिक सत्ताधारियों की गैरज़िम्मेदारियों पर अपरिहार्य रूप से छोड़ दिया गया हो, जिस कार्यक्षेत्र पर राष्ट्रों की तकदीर निर्भर करती है।
          राजनीतिक नेताओं सरकारों की वर्तमान स्थिति कुछ बल और कुछ चर्चित चुनावों के कारण है। वे अपने अपने राष्ट्रों में नैतिक और बौद्धिक रूप से, जनता के सर्वोत्कृष्ट प्रतिनिधि नहीं ठहराये जा सकते। बुद्धिजीवी संभ्रांतों का इस वक्त देशों के इतिहास पर कोई सीधा प्रभाव नहीं है: उनकी सम्बद्धता में कमी उन्हें समकालीन समस्याओं के निराकरण में सीधे प्रतिभागिता करने से रोकती है। क्या आप नहीं सोचते? कि जिनके क्रियाकलाप और पूर्ववर्ती उपलब्धियाँ; उनकी योग्यता और लक्ष्य की पवित्रता की गारन्टी का निर्माण करतीं हैं, उन लोगों के मुक्त संगठन के द्वारा इस दिशा में परिवर्तन किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति के इस गठबंधन के सदस्यों को आवश्यक रूप से शक्ति और विचारों आदान-प्रदान, पत्रकारों के समक्ष अपना दृष्टिकॊंण प्रेषित करके आपस में संपर्क में रहना होगा। किसी खास अवसर पर ज़िम्मेदारी सदैव हस्ताक्षरकर्त्ताऒं पर रही है-और यह राजनीतिक प्रश्नों के निराकरण हेतु सामान्य से काफ़ी अधिक और सलाम लरने योग्य नैतिक प्रभाव छोड़ती है। निश्चित रूप से ऐसे संगठन, उन सभी बुराइयों जो कि अक्सर ज्ञानवान समाजों को विखन्डन के रास्ते पर ले जातीं हैं, और खतरों जो कि अविलग रूप से मानव मनोवृत्तियों की कमियों से जुड़े होते हैं, के लिये शिकारी की तरह होंगे। इस तरह के प्रयासों  को मैं अनिवार्य कर्तब्य से कमतर नहीं देखता हूँ।
      यदि ऐसी समझ वाले वैश्विक  संगठन का निर्माण हो पाता है, जिसका कि मैंने पूर्व में वर्णन किया; यह युद्ध के विरुद्ध संघर्ष हेतु आध्यात्मिक संस्थाओं को संगठित कर्ने का सत प्रयत्न भी कर सकता है। य उन तमाम लोगों के लिये अनुग्रह होगा, जिनके उत्कृष्ट ध्येय, निराशाजनक निष्कासन के कारण विकलाँग हो चुके हैं। अंततः, मुझे विश्वास है, यदि अपनी अपनी दिशाओं के अत्यन्त आदरणीय लोगों का संगठन बन पाया, जैसे कि मैंने वर्णित किया, तो राष्ट्र संघ के उन तमाम देशों को जो कि वास्तव में एक महान लक्ष्य की दिशा में कार्यरत हैं और जिस ध्येय के लिये संघ का अस्तित्व है, को महत्वपूर्ण नैतिक (आधार) सहयोग प्रदान करने हेतु अत्यन्त उपयुक्त सिद्ध हो सकता है।
      मैंने यह प्रस्ताव विश्व के किसी अन्य के अलावा आपके समक्ष इसलिये रखा, क्योंकि आप अन्य सभी लोगों में सबसे कम, अपनी इच्छाओं के द्वारा ठगे जाते हैं, क्योंकि आपके आलोचनात्मक निर्णय, ज़िम्मेदारी के सबसे गहरे एहसास पर आधारित होते हैं।

                                                                      आपका
 
                                                                 (अल्बर्ट आइन्स्टीन)


अनुवाद: मेहेर वान 
 

Monday, May 9, 2011

अमेरिकी राष्ट्रपति रुज्वेल्ट के नाम अल्बर्ट आइन्स्टाइन का पत्र

       (अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने इस पत्र को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूलों में से एक करार दिया था। इस पत्र के बाद अमेरिकी सरकार नाभिकीय बम निर्माण की दिशा में और सतर्क हो गयी थी, अंततः हिरोशिमा और नागासाकी इतिहास में हमेशा के लिये दर्ज हो गया। साथ ही विज्ञान के आभिशापिक पहलुऒं पर बहस भी तेज़ हो गई।)



                                                       अल्बर्ट आइन्स्टीन
                                                         ओल्ड ग्रोव रोड
                                                         नासाऊ प्वाइन्ट
                                                         पेकोनिक,
                                                        लोन्ग आइस- लैन्ड
                                                         २ अगस्त, १९३९
एफ़. डी. रूज़्वेल्ट
राष्ट्पति, स॓युक्त राज्य अमेरिका,
ह्वाइट हाउस
वाशिन्गटन, डी.सी.

श्रीमान्‍,
    ए. फ़र्मी और एल. स्ज़िलार्ड के द्वारा किया गया कुछ ताज़ा कार्य, जो कि मुझे पान्डुलिपि के रूप मे॑ प्रेषित किया गया है; मुझे आशा दिलाता है, कि यूरेनियम तत्व, निकट भविष्य मे॑ ऊर्ज़ा के नये और महत्वपूर्ण स्त्रॊत के रूप मे॑ परिवर्तित किया जा सकता है| उभर कर सामने आयी॑ परिस्थितियो॓ के कुछ पहलू आँखें खुली रखने और आवश्यकता पड़े, तो प्रशासन की ऒर से त्वरित प्रतिक्रिया की पुकार करते प्रतीत होते है॓| अत: मुझे विश्वास है कि निम्नलिखित तथ्यॊं और सिफ़ारिशॊं की ऒर आपका ध्यान खींचना मेरा कर्तव्य है|
     पिछ्ले चार महीनों में, फ़्राँस के जुलियट और साथ ही अमेरिका के फ़र्मी और स्ज़िलार्ड के काम के द्वारा ये सम्भव हॊ चुका है – कि यूरॆनियम के अत्यधिक द्रव्यमान मे॓ नाभिकीय अभिक्रिया स्थापित करना सम्भव हो सकता है, जिसकॆ द्वारा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा और रेडियम जैसे तत्व उत्पन्न हो सकेंगे| ऐसा निकट भविष्य मे प्राप्त हो सकेगा, ये लगभग प्रतीत होता है|
    यह नया तथ्य बमो॓ के निर्माण का रास्ता तैयार करेगा और ये कल्पनीय है- यद्यपि बहुत कम निश्चित- कि अत्यधिक अप्रत्याशित क्षमता वाले नई तरह के बमॊं का निर्माण भी किया जा सकेगा|  इस तरह का केवल एक बम, जिसे कि नाव के द्वारा ले जाकर बन्दरगाह में विस्फ़ोट किय जाये, बन्दरगाह और उसके साथ कुछ आस-पास की बस्तियों को बहुत अच्छी तरह से ध्वस्त कर सकता है| हाँलाकि, ये बम हवाई यातायात के लिये काफ़ी भारी सिद्ध होंगे|
     संयुक्त राष्ट्र के पास युरेनियम के अयस्क अत्यधिक घटिया और काफ़ी कम मात्रा मे है| कनाडा और पूर्व चॆकोस्लोवाकिया में (यूरेनियम के) कुछ अच्छॆ अयस्क हैं, जबकि युरेनियम का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत बेल्ज़ियन कोन्गो है|
     परिस्थिति को ध्यान मे॓ रखते हुए आप सोच सक्ते हैं कि प्रशासन और अमेरिका मे काम कर रहे भौतिकविदो॓ के समूह का आपस मे॓ स्थायी सम्बन्ध होना आशान्वित है| इसे प्राप्त करने का, आपके लिये एक सम्भव रास्ता ये हो सकता है, कि इस कार्य से जुडॆ एक व्यक्ति को , जिस पर आपको भरोसा हो, यह कार्य सोंप दें, और जॊ यद्यपि कार्यालयी क्षमता से परे अपनी सेवायें दे सके| उसके कार्यॊं मे कुछ कार्य ये भी हो सकते है॓|:-
(क)           सरकारी विभागों से सम्बन्ध रखना, तात्कलिक प्रगति के बारे में उन्हें अवगत रखना, सरकारी क्रियाकलापॊ॓ के लिये सिफ़ारिश करना; विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र का युरेनियम अयस्क  की पूर्ति की सुरक्षा की समस्या की ऒर  ध्यान खी॓चना|
(ख)           विश्वविद्यालयी प्रयॊगशालाओ॓ मे सीमित बज़ट के साथ हो रहे प्रयोगिक कार्य (अनुसन्धान) की गति को तेज़ करना| आपके और उसके व्यक्तिगत सम्बन्धों के द्वारा , जो लोग इस समस्या के लिये सहयोग के इच्छुक हैं , उनसे फ़न्ड उपलब्ध कराके, यदि इस तरह के फ़न्ड की आवश्यक्ता है तो, और साथ ही उन औद्योगिक प्रयोगशालाओं की सहकारिता को भी प्राप्त करके, जिनके पास आवश्यक उपकरण उपलब्ध है॑|
मैं समझता हूँ कि जर्मनी, वास्तव मे॓ चॆकॊस्लॊवाकिया की खदानॊं से यूरॆनियम की बिक्री बन्द कर चुका है, जिन पर कि उसने पहले कब्ज़ा किया था| उसके(जर्मनी) के इस ज़रूरी कदम को इस तरह समझा जाना चाहिये, कि जर्मनी के प्रति-राष्ट्र सचिव का पुत्र वोन वीज़सेकर (प्रसिद्ध और अत्यन्त प्रतिभाशाली नाभिकीय भौतिकविद) कैसर-विल्हेम इन्स्टीट्यूट, बर्लिन से सम्बन्धित है| जहा॓ युरेनियम पर अमेरिका में किया गया कुछ कार्य (अनुसन्धान) पुनः दोहराया जा रहा है|

                                                   आपका आत्मीय
                                                     
                                                   (अल्बर्ट आइन्स्टीन)                              
                                                                                                 
अनुवाद: मेहेर वान

Wednesday, April 20, 2011

नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन पर पुनरावलोकन


                                         
जापान में आये अत्यधिक तीव्रता के भूकंप और सुनामी ने दुनियाँ को तबाही के एक और मंज़र का गवाह बना दिया। इस भूकंप से जापान को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है, यह जापान में आये अब तक के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से एक है। शक्तिशाली भूकंप आने से जमीन के अन्दर टेक्टोनिक प्लेटों में हुई उथल पुथल से समुद्र में हलचल हुई और यह सुनामी में परिवर्तित हो गई। इस प्राकृतिक आपदा के सबसे गम्भीर प्रभावों में से एक फ़ुकुशिमा नाभिकीय रियक्टर में धमाके होना था। भूकंप और सुनामी से प्रभावित क्षेत्र में यातायात, जल और बिजली आपूर्ति ठप हो गयी थी, जिस कारण से फ़ुकुशिमा नाभिकीय रियक्टर में ईंधन कॊ ठंडा रखने वाले शीतकों ने काम करना बंद कर दिया और नाभिकीय़ ईंधन में धमाके हुये। इन धमाकों से रियक्टरों की स्थिति लगातार बिगड़्ती चली गयी और फ़ुकुशिमा में स्थित नाभिकीय रियक्टरों में आंशिक “नाभिकीय मेल्ट्डाउन” की आशंका जताई जाने लगी। नाभिकीय मेल्त्डाउन या नाभिकीय गलाव किसी नाभिकीय रियक्टर की वह स्थिति होती है,  जब परमाणु विद्युत उत्पादन यंत्र पूरी तरह विफल हो जाता है। नाभिकीय गलाव की स्थिति में परमाणु रिक्टरों में प्रयुक्त शीतलक काम करना बंद कर देते हैं। शीतलक के निष्क्रिय होने पर यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे विखंडनकारी पदार्थ परमाणु भट्टी को अत्यंत गर्म कर देते हैं। ऐसा होने से रेडियो-सक्रिय किरणें वायुमंडल और वातावरण में फैलकर जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों को घातक हानि पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि परमाणु भट्टी या परमाणु भवन इस्पात, कंक्रीट से पूरी तरह वायुबंद बनायी जाती है, जिसकी दीवार डेढ़ से ढाई मीटर मोटी होती है।  जापान के फ़ुकुशिमा स्थित परमाणु केन्द्र में छह परमाणु रियक्टर्स हैं। फ़ुकुशिमा परमाणु केन्द्र दुनियाँ के पन्द्रह सबसे बड़े परमाणु केन्द्रों में से एक है। इन रियक्टर्स में हो रहे धमाकों के बाद यह तक कहा जाने लगा कि हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु हमले के बाद जापान दूसरी नाभिकीय विभीषिका का सामना करने जा रहा है। हालाँकि बाद में जापान के वैज्ञानिकों ने स्थिति पर अनुमानित समय सीमा से बहुत पहले काफ़ी हद तक काबू पाकर अन्य देशों के सामने मिसाल पेश की। मगर इस परिघटना ने एक बार फिर वैज्ञानिकों और नीतिनिर्धारकॊं के समक्ष कई महत्वपूर्ण और गम्भीर सवाल खड़े कर दिये, जिनसे नीतिनिर्धारक लगातार स्वयं को बचाते चले आ रहे थे।
हमारी औद्यौगिक सभ्यता का सबसे बड़ा आधार ऊर्जा है, जिसमें 85% योगदान जीवाश्म ईंधनों, कोयला, खनिज तेल एवं पेट्रोलियम गैस का है। कोयला का औद्योगिक क्षेत्र में सबसे पहले प्रयोग ब्रिटेन में तब शुरु हुआ जब वहाँ के जंगल उदयीमान औद्यौगिक क्षेत्र की ऊर्जा ज़रुरतों की पुर्ति नहीं कर पा रहे थे। कोयला विश्व के लगभग भागों में पाया जाता है और यह कई शताब्दियों तक हमारी ज़रूरते पूरी करेगा। पेट्रोलियम ने कोयले का स्थान उन्नीसवीं सदी में ले्ना शुरु किया और पेट्रूलियम का प्रयोग लगातार बढ़ता ही गया। खपत की वर्तमान दर से अगर अनुमान लगाया जाये तो पेट्रोलियम अगले कुछ और दशकों तक ही हमारी ज़रूरतों को पूरा कर सकता है। साथ ही खनिज तेल के स्त्रोत भी कुछ राजनीतिक रूप से अस्थिर समझे जाने वाले देशों में ही सीमित हैं। अतः खनिज ईंधनों का संरक्षण मात्र ऊर्जा समस्या का समाधान नहीं है, यह समस्या को मात्र टालना है। आँकड़ों के आधार पर, खनिज तेलॊं के दहन से वातावरण में प्रति वर्ष 2.30 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित करते हैं, यानि कि लगभग 730 टन प्रति सेकेन्ड। इस कार्बन उत्सर्जन का आधा भाग पेड़-पौधों और समुद्रों द्वारा सोख लिया जाता है, शेष लगभग उत्सर्जित भाग से हमारा पर्यावरण गम्भीरता से प्रभावित होता है। वर्तमान में ऊर्जा के वैकल्पिक और नवीकरणीय साधन जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जैव ईंधन या भूतापीय ऊर्जा औद्यगिक क्षेत्र की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने में पूरी तरह से समर्थ नहीं हैं, और इस क्षेत्रों में अभी शोध की महती सम्भावनायें हैं। ऐसे में नाभिकीय ऊर्जा को, ऊर्जा की वर्तमान ज़रुरतों को पूरा करने वाले विकल्प के तौर पर माना जाने लगा था।
नाभिकीय ऊर्जा निश्चित रूप से स्वच्छ, विश्वस्यनीय, संहत, प्रतिस्पर्धा योग्य, और कभी खत्म ना होने वाले ऊर्जा के विकल्प की रूप में उभर कर सामने आया। वर्तमान में इस ऊर्जा को अस्तित्व में आये लगभग पचास साल से भी अधिक हो गये हैं, अतः कुछ लोग इसे ऊर्जा का विकसित विकल्प भी कहने लगे हैं। नाभिकीय ऊर्जा के तमाम सकारात्मक पहलू हैं। जिनमें से कुछ का ज़िक्र हम यहाँ कर सकते हैं। नाभिकीय ऊर्जा के उत्पादन में कार्बन डाई ऑक्साइड, सल्फ़र डाई ऒक्साइड जैसी वायुमण्डल के लिये हानिकाराक गैसें उत्सर्जित नहीं होतीं हैं, जो कि खनिज तेलों के दहन में मुख्यता से उत्सर्जित होतीं हैं। नाभिकीय रियक्टर्स लगभग हमेशा क्रियान्वित रहते हैं। इनमें ऊर्जा उत्पादन तभी रुकता है जब इनमें ईंधन भरा जाता है। सौर ऊर्जा के स्त्रोत दिन के समय ही काम करते हैं और पवन ऊर्जा के स्त्रोत तभी काम करते हैं जब हवा चलती है।  नाभिकीय रियक्टर की औसत आयु चालीस साल होती है, मगर स्थिति के आधार पर इसे लगभग बीस साल का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है। चूँकि अभी नाभिकीय ईंधन के स्त्रोतों का उतना बाज़ारीकरण नहीं हुआ है जितना खनिज तेलों का; इसलिये नाभिकीय नाभिकीय ईंधन अपेक्षतया सस्ता है जबकि कच्चे खनिज तेल की कीमत बाज़ार के भरोसे होती है। वैसे तो यूरेनियम थोडा बहुत हर देश में पाया जाता है मगर आस्ट्रेलिया और कनाडा में ही इसके बेहतर स्त्रोत हैं। नाभिकीय प्लाँट को लगाने के लिये अपेक्षतया कम जगह की आवश्यक्ता होती है। मगर इसके आसपास का क्षेत्र खतरनाक क्षेत्र माना जाता है। ऊर्जा उत्पादन के बाद बचे नाभिकीय कूड़ा की मात्रा भी खनिज तेलों, और कोयले के दहन के बाद बचे कूड़ॆ की मात्रा से बहुत कम होती है। इस तरह ऐसे तमाम कारण हैं जो कि नाभिकीय ऊर्जा को ऊर्जा के अन्य संसाधनों से बेहतर बनाते हैं, और यही कारण हैं जिनके कारण आज पूरे विश्व में सैकड़ों रियक्टर्स काम कर रहे हैं।
मगर इस सिक्के का दूसरे पहलू भी हैं। इस तकनीक के सम्बन्ध में सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। ब्रह्माण्ड के इकलौते ग्रह जिस पर जीवन है, पृथ्वी पर जलवायु, जीवन स्तर और जीवन यापन की प्रणाली समेत यहाँ बसने वालॊं का भविष्य इस बात पर भी निर्भर है कि यहाँ ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिये किन तकनीकों या प्रणालियों का सहारा लिया जाता है। यह भी उपेक्षा करने योग्य नहीं है कि आज भी दुनियाँ की आबादी के बड़े हिस्से को बिजली आदि उपलब्ध नहीं है। सवाल सिर्फ़ ऊर्जा उत्पादन की प्रणाली को बदलने का नहीं है। नाभिकीय ऊर्जा का इतिहास किसी दुःस्वप्न की तरह है। नाभिकीय ऊर्जा का इस दुनिंयाँ में पदार्पण ही हिरोशिमा और नागासाकी के ज़रिये हुआ था। हालाँकि किसी एक घटना से किसी तकनीक के भविष्य के बारे में दृढ़्ता के साथ कुछ कहना आसान नहीं हैं, लेकिन नाभिकीय ऊर्जा के साथ ऐसा नहीं है। आज नाभिकीय ऊर्जा पचास साल से भी अधिक पुरानी ऊर्जा है। इस समय में इस तकनीक ने नाभिकीय ऊर्जा उद्योग की शक्ल ले ली है, आज कई व्यक्तिगत कम्पनियाँ इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा न सिर्फ़ कई देशों में योजना निर्माण के केन्द्र में रहती है, बल्कि अन्य योजनाओं को प्रभावित भी करती है। वर्तमान में नाभिकीय ऊर्जा से जुडी तमाम अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियाँ, संस्थायें और समितियाँ हैं।
अगर नाभिकीय ऊर्जा के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में बात की जाये तो, सबसे पहला बिन्दु नाभिकीय ऊर्जा के ईंधन यूरेनियम के खनन से सम्बन्धित है। य़ुरेनियम एक रेडियोएक्टिव यानि कि रेडियोसक्रिय पदार्थ होता है, जिससे अत्यधिक खतरनाक रेडियोसक्रिय विकिरण का उत्सर्जन होता है। यह रेडियोएक्टिव विकिरण जीवजन्तुऒं और पेड़ पौधों के लिये अत्यधिक हानि कारक होता है। इस विकिरण से कैंसर जैसा घातक रोग होने की आशंका रहती है। यह विकिरण सीधे तौर पर इसकी खुदाई करने वाले मज़दूरों को नुकसान पहुँचाता है। यूरेनियम खनिजों की चट्टानों से निकलने वाली रेडॉन गैस और रेडियम भी जीव जन्तुऒं के लिये हानिकारक होता है। इसके अत्यधिक ऊर्जा के कण आनुवाँशिक रोग और परिवर्तन करने में सक्षम होते हैं। इस विकिरण की अधिक मात्रा जीवों के प्रतिरक्षी तंत्र को हानि पहुँचाती है। उच्च कोटि के यूरेनियम खनिजों से खनन मज़दूर प्रष्ठ्भुमि विकिरण से एक हज़ार गुना तक गामा विकिरण प्राप्त करते हैं। यूरेनियम खनन की एक तकनीक “इन-सीटू लीचिंग” में भी इन रेडियोऎक्टिव पदार्थों का ज़मीनी-जल में घुलकर जनता तक पहुँचने का खतरा रहता है। खनिज खदानों में यूरेनियम को रसायनिक तरीकों से अन्य पदार्थों से अलग किया जाता है, इस प्रक्रिया में भी  यूरेनियम खनिज का कुछ भाग खदानों में छूट जाता है, यह अगर वायु में खुला छोड़ दिया गया तो हवा के साथ रिहायशी इलाकों में विकिरण के खतरे उत्पन्न करता है।  यही खतरा नाभिकीय ऊर्जा य्त्पादन के दौरान बचे नाभिकीय कचरे के साथ भी है। नाभिकीय ऊर्जा के सामाजिक क्षेत्र में आने के पचास साल बाद भी अब तक नाभिकीय खतरे को सफ़लता से बिना किसी हानिकारक प्रभावों के साथ डिस्पोज़ करने की मुकम्मल तकनीक किसी भी देश के पास नहीं है। एक बड़ा नाभिकीय रियक्टर वर्ष में 25-30 टन नाभिकीय कचरा उत्पन्न करता है जो कि अत्यधिक खतरनाक होता है। सन 2000 में दुनियाँ भर के रियक्टरों द्वारा उत्पन्न कचरे की मात्रा दो लाख बीस हज़ार टन थी जो कि (10000) दस हज़ार टन प्रति वर्ष के हिसाब से हर साल बढ रही है। अमेरिका ने अपने देश में उत्पन्न क्चरे को नेवादा राज्य में उस जगह पर भंडारित करने की योजना बनायी थी, जहाँ उसने हाइड्रोजन बमों का परीक्षण किया था जिसके कारण यह जगह पहले से ही विकिरण का शिकार है। मगर पर्यावरणविदों और स्वयं नेवादा राज्य के विरोध के कारण यह अब तक टल रहा है। आँकडों के अनुसार इंग्लैण्ड में आज भी कुळ नाभिकीय कचरे का बड़ा हिस्सा डिस्पोज़ करने के लिये आज भी बचा हुआ है।  फ़्राँस ने भी नाभिकीय कचरे को ग्रेनाइट की गुफ़ाओं में भंडारित करने की योजना बनायी थी, लेकिन इसका ज़िम्मेदारी से क्रियान्वयन नहीं हो पाया है। भारत में भी नाभिकीय कचरा भंडारण एक बड़ा लक्ष्य है। वस्तुतः सभी देशों का प्रशासन खनन और भंडारण से जुड़ी समस्याओं पर गम्भीर नहीं रहा। सम्पूर्ण नाभिकीय उद्योग मूलतः य़ूरेनियम बेचने और नाभिकीय रियक्टर बनाने की तकनीक का व्यावसायिक फ़ायदा लेने में ही अपना अधिकतम ध्यान लगाता है क्योंकि यही वह क्षेत्र हैं जहाँ आर्थिक फायदों की संभावनायें रहतीं हैं।         
इसके अलावा भी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जहाँ नाभिकीय ऊर्जा से इतर वैकल्पिक ऊर्जा के साधनों पर अत्यधिक ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है। नाभिकीय रियक्टर बनने में  और क्रियान्वित होने में लगभग दस वर्ष लग जाते हैं अगर रियक्टर निर्माण और नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन से जुडे सभी नियमों का पालन किया जाये। इसके बनिस्बत वैकल्पिक और नवीकरर्णीय ऊर्जा के केन्द्र बनाने में और इन्हें क्रियान्वित करने में आठ महीने लगते हैं। कई देशों में नाभिकी रियक्टर्स बीस साल तक “निर्माणा्धीन” रहे हैं। उदाहरण के लिये मैक्सिको में “लेग्युना वेर्दे” रियक्टर का निर्मण कार्य सन 1977 में शुरु हुआ और 1994 में खत्म हुआ।  मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऒफ़ टेक्नोलोजी के वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने के लिये दुनियाँ भर में कम से कम एक हज़ार नाभिकीय रियक्टर्स होने चाहिये, जो कि वास्तविकता से बहुत दूर है। नाभिकीय रियकटर के निर्माण में आने वाला खर्च भी एक बड़ा कारक है। दक्षिण अफ़्रीका की सरकार को सन 2008 में नाभिकीय रियक्टर के निर्माण से सम्बन्धित टेन्डर बापस लेना पड़ा था।फिलीपीन्स में “बतान नाभिकीय ऊर्जा” केन्द्र का निर्माण कार्य 1974 में शुरु किया गया। बाद में इसका निर्माण कार्य एक घटना के बाद रोक दिया गया, इसकी सुरक्षा जाँच में लगभग चार हज़ार कमियाँ पायीं गयीं। 23 करोड़ अम्रेरिकी डॉलर्स खर्च करने के बाद यह सन 1984 में पूरा हुआ, जो कि प्रस्तावित बजट का पाँच गुना था।  अगर भारत की बात करें तो दस नाभिकीय रियक्टरों के निर्माण में बजट से  तीन गुना खर्च आया है। साथ ही नाभिकीय रियक्टर्स का क्रियान्वयन मूल्य भी अन्य ऊर्जा संसाधनों की अपेक्षा काफ़ी अधिक है। नाभिकीय रियक्टर्स में विकिरण से बचने किसी भी अप्रत्याशित या प्रत्याशित घटना से निबटने के लिये हमेशा सावधान रहना पड़ता है। नाभिकीय रियक्टर्स पर आतंकी हमले किसी भी देश के लिये काफ़ी परेशान करने वाले हो सकते हैं। ऐसा कोई हमला न सिर्फ़ जान माल के भारी नुकसान का कारक बन सकता है, बल्कि इससे कई पीढियों के लिये विकिरण का खतरा उत्पन्न हो सकता है। नाभिकीय रियक्टर क्षेत्रीय जनता को न के बराबर रोज़गार के अवसर प्रदान करता है, जबकि ऊर्जा के नवीकरणीय साधन जैसे पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, बायोमास ईंधन एवं जैविक ईंधन के साधन क्षेत्रीय जनता के बडे भाग को रोज़गार के अवसर प्रदान करते हैं।
अंततः, नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की तकनीक नाभिकीय हथियार बनाने की तकनीक से काफ़ी समान है जिससे और अन्य देशो के द्वारा नाभिकीय हथियार बनाये जाने की संभावना से इंनकार नहीं किया जा सकता यदि नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की तकनीक का विश्व में विस्तार किया जाता है। अगर विश्व में हम हज़ारों नाभिकीय़ रियक्टर्स बनाकर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सफ़ल हो गये फ़िर भी भविष्य में इन सर्वत्र फ़ैले रियक्टर्स पर आतंकी हमले के प्रयास नहीं होंगें या प्राकृतिक आपदाओं से कोई हानि नहीं होगी, इसकी गारंटी कौन ले सकता है? इसके अलावा, भविष्य में जो नाभिकीय कचरा उत्पन्न होगा, उस उपेक्षित और खतरनाक नाभिकीय कचरे के विशालकाय भंडार का कोई गलत इस्तेमाल नहीं करेगा, यह कहने वाले हम कौन होते हैं?
इन सभी समस्याऒं का हल नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा संसाधन हैं। ऊर्जा उत्पादन के ये संसाधन अपेक्षाकृत सस्ते तो हैं ही साथ ही इनसे भविष्य में कॊई बडे खतरे नहीं है। ऊर्जा उत्पादन की इन प्रणालियों में क्षेत्रीय जनता को रोज़गार भी मिलता है। वैकल्पिक और नवीकरणीय़ ऊर्जा के संसाधनों का क्रियान्वयन मूल्य वरर्तमान में अन्य प्रणालियों से काफ़ी अधिक है, जिसे कि विश्व भर में शोध को और बढावा देकर के उचित स्तर तक लाया जा सकता है।  नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में जर्मनी और स्वीडन जैसे देशों ने काफ़ी अनुकरणीय कार्य किया है। उम्मीद है कि भविष्य में वैकल्पिक और नवीकरणीय़ ऊर्जा के ये स्त्रोत ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में क्रान्ति लायेंगे बल्कि, स्वच्छ, सुरक्षित, प्रतिस्पर्धा योग्य, और भय रहित ऊर्जा उत्पादन के सपने को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे।
                           -मेहेर वान
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