Tuesday, May 1, 2012

हमारी शिक्षा और हम

( समय-यात्रा करते वक्त समययात्री अक्सर कुछ ना कुछ सोचना शुरू कर देता है| पता नहीं क्यों? वह खुद नहीं जानता..... लेकिन तमाम साथ वालों के यह कहने के बावजूद कि धरती पर दूसरों के लिए सोचना या तो गुनाह है या पोलिटिक्स, वह सोचता है........ )   
प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन ने कहा था, “शिक्षा का उद्देश्य किसी विषय में विशेषज्ञता हासिल किये गये ग़ुलाम पैदा करना नहीं होता, शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य मानवता और देश-काल के प्रति ज़िम्मेदार, नैतिक मूल्यों से लबरेज़ इंसान पैदा करना होता है”। किसी अन्य विद्वान ने भी कहा है, “शिक्षा वह बचा हुआ ज्ञान होता है, जो कि अपने स्कूलों में सीखे गये समस्त ज्ञान के भूल जाने के बाद बचता है”। स्कूल हमेशा से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ज्ञान की संपदा हस्तांतरित करने के सशक्त और महत्वपूर्ण केन्द्र माने जाते हैं। यह वर्तमान में और भी महत्वपूर्ण संस्थान हो चुके हैं, ख़ास तौर पर जब वैश्वीकरण यानि ग्लोबलाइजेशन के दौर में आर्थिक और सामाजिक बदलाव इस स्थिति में आ चुके हैं कि किसी भी देश की परम्परायें, लोककलायें , भाषायें और अन्य परम्परागत विशेषतायें ख़तरे में हैं।
मानवता को बचाये रखने और अपनी परम्पराऒं से अच्छा ग्रहण करते रहने की प्रक्रिया में शैक्षिक संस्थायें और महत्वपूर्ण हो जातीं हैं।  ये सवाल पूरी दुनियाँ की शैक्षिक संस्थाओं के समक्ष है कि क्या वे संस्थायें अपनी पुरानी पीढ़ियों से मिले सकारात्मक और नैतिक ज्ञान को अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों में हस्तान्तरित कर पा रहीं हैं? चूंकि पश्चिमी देशों में नवजागरण हमसे पहले आया, और वहाँ विकास की आँधी हमारे यहाँ से पहले आयी, यह समस्या पश्चिमी देशों में हमसे पहले दृष्टिगोचर हुयी। यहाँ हमसे भी भूल हुयी कि हम इस आँधी से खुद को बचा भी नहीं पाये। मुझे लगता है, कि स्थिति तब से अत्यन्त गम्भीर हुयी है, जब से शिक्षा को एक उद्योग के रूप में देखा जाने लगा।
भारत में इसकी शुरुआत सन 1986  से हुयी, जब भारत में शिक्षा के निजीकरण के लिये संसद ने शिक्षा के दरवाजे खोल दिये। यहाँ यह बात भी नहीं भूलनी चाहिये कि शिक्षा के निजीकरण से वहाँ भी स्कूल खुले जहाँ सरकार तुरन्त स्कूल नहीं खोल सकती थी, मगर इस तरह शिक्षा से पैसे कमाने की प्रथा भी शुरु हुयी। इस प्रक्रिया में कुछ निजी शैक्षिक संस्थानों ने लगन और मेहनत से बेहतर शिक्षा प्रदान की, इसके तमाम फायदों सहित कुछ गम्भीर नुकसान भी हुये। जिनमें से प्रमुख था, सरकारी संस्थाओं में शिक्षा के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव कम होना। सरकारी शैक्षिक संस्थाओं के नुमाइंदों ने ये सोचना शुरु कर दिया कि अच्छी शिक्षा निजी स्कूल देते हैं, अब हमें आराम करना चाहिये, या जिन्हें अच्छी शिक्षा चाहिये वे निजी स्कूलों में दाखिला लें। इस तरह शिक्षा को दोगुना नुकसान हुआ। जहाँ एक तरफ़ सरकारी शैक्षिक संस्थाओं ने सामाजिक ज़िम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लिया, वहीं दूसरी तरफ़ निजी शैक्षिक संस्थाऒं का प्रमुख उद्देश्य उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करना था ही नहीं। उनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना था, चूंकि निजी शैक्षिक संस्थान शिक्षा के उद्योगीकरण के फलस्वरूप अस्तित्व में आये थे। इसके नुकसान सभी देशों में विकास प्रक्रिया के अलग अलग चरणों में दृष्टिगोचर हुये। यहाँ एक बात और याद रखनी होगी कि इस प्रक्रिया में मिशनरियों और समाज सेवी संस्थाओं कि द्वारा संचालित स्कूलों ने अपने स्तर को बचाये रखा। लेकिन ये भी सत्य है कि ये समाजसेवी संस्थायें और मिशनरियाँ पैसे कमाने के लिये स्कूल नहीं चला रहीं थीं, उनके शैक्षिक संस्थायें संचालित करने के पीछे उनके अपने उद्देश्य थे।
पिछले कुछ सालों के दौरान, मुझे कुछ महत्वपूर्ण हस्तियों से मिलने और उनसे तमाम मुद्दॊं पर बातचीत करने का मौका मिला, इस मुद्दों में शिक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण मुद्दा रहा, जिसपर कई बार बहसें लम्बी भी चलीं। आकाशवाणी, इलाहाबाद में संविदा आधारित उद्‍घोषक के रूप में काम करते हुये मुझे संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र के वैश्विक व्यक्तित्व एन.आर.नारायणमूर्ती से बातचीत करने का मौका मिला, जो संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित कम्पनी “इन्फ़ोसिस” के संस्थापक सदस्य और पूर्व चेयरमेन भी हैं। वे कर्नाटक के एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे थे, उनका परिवार बड़ा था। ग़रीब परिवार में पले बढ़े होने के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर “इन्फ़ोसिस” जैसी कम्पनी की स्थापना की, जो कि भारत की सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक है। शिक्षा के सम्बन्ध में मुझे उनके विचारों ने प्रभावित किया। उनका मानना था कि, “भारत में खास तौर से शिक्षा का मतलब डिग्रियों के तमगे लगाना हो गया है। उन्होंने कहा कि छात्रों का लक्ष्य स्कूलों, कॉलेजों में ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिये न कि अच्छे अंक पाना। सिर्फ़ इतना ही पर्याप्त नहीं है, छात्रों को सोचना चाहिये कि जो भी भौतिकी, रसायन, समाजशास्‍त्र वे अपनी कक्षा में पढ़ रहे हैं, उस विषय का उपयोग समाज की समस्याओं को दूर करने में कैसे किया जा सकता है? और इस दिशा में प्रयास करने चाहिये”। शिक्षा प्राप्त करने का यह नज़रिया काफ़ी महत्वपूर्ण है। क्या सचमुच हमारे छात्र ऐसा सोचते हैं? मेरी समझ में ऐसा देश के सर्वोच्च्‍ संस्थान के छात्र भी शायद नहीं सोचते हैं। वे सिर्फ़ ऐसे कोर्स करना चाहते हैं जिससे एक अच्छी रकम वाला वेतन दिलाने वाली नौकरी मिल जाये। अगर वास्तव में युवाऒं को देश का नाम रोशन करना है तो नारायणमूर्ती जी के शब्द उनके लिये महत्वपूर्ण हैं। चेन्नई में सम्पन्न हुये एक वैज्ञानिक सम्मेलन में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक “प्रो. रिचर्ड आर. अर्न्स्ट” से बातचीत करने का मौका मिला। उनका साक्षात्कार लेते वक़्त और साक्षात्कार के बाद अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उनका कहना था, “हम में से हर एक को यह सोचना चाहिये कि हमने अपनी पुरानी पीढ़ियों से कितना कुछ लिया, मगर हम अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को क्या देकर जा रहे हैं? ग्लोबल वार्मिंग, आतंकवाद, आर्थिक अस्थिरता…..क्या हमारे पास आगामी पीढ़ियों को देने के लिये कुछ नहीं है?...ऐसे में शिक्षा, शिक्षकों और छात्रों की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हम सबको, खास तौर से समझदारों, बुद्धिजीवियों, और सक्षम लोगों को स्वयं से ऊपर उठ कर सोचना शुरु करना पड़ेगा। हमें अपने वेतन, अपने स्तर आदि से ऊपर उठकर समाज, देश और विश्व के बारे में सोचना चाहिये, तभी एक सुरक्षित भविष्य की आशा की जा सकती है। वर्तमान में युवाओं पर यह ऎतिहासिक ज़िम्मेदारी है”।
विचारों की परिधि में स्वयं को रखते हुये क्या हम इन ज़िम्मेदारियों निभाने के लिये स्वयं को तैयार कर पाये हैं? अगर देखा जाये तो कुछ हद तक ऐसा हो रहा है, शुरुआतें हो चुकी हैं। इस तरह की कुछ समस्यायें किसी एक ख़ास स्थान विशेष की समस्यायें नहीं हैं बल्कि इन समस्याओं का वैश्विक स्तर पर हल निकाले जाने की आवश्य‍क्ता है।

-मेहेर वान


Wednesday, April 25, 2012

गणित के जादूगर: श्रीनिवास रामानुजन

(आज महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन कि पुण्यतिथि है|  समययात्री इस महान व्यक्तित्व के बारे में जन्म से कहानियां सुनता चला आया है, और इन कहानियों से समययात्री भी हमेशा प्रभावित हुआ है| समय यात्री को एक महान गणितज्ञ को याद करते हुए गर्व महसूस हो रहा है....... )
            
            -मेहरबान राठौर

        श्रीनिवास रामानुजन विश्व के महानतम गणितज्ञों में गिने जाते हैं। अगर विश्लेषण किया जाये तो हम पायेंगे कि श्रीनिवास रामानुजन अल्बर्ट आइन्सटीन के स्तर के, अपने समय के सबसे अधिक प्रतिभावान लोगों में से एक थे। सामान्यतः महान लोग दो प्रकार के माने जा सकते हैं- एक तो ऐसे महान लोग कि अगर कोई व्यक्ति सामान्य से सौ गुना मेहनत करे तो उन लोगों जैसा महान व्यक्तित्व बन सकता है, लेकिन कुछ महान लोग जादूगरों की तरह होते हैं, उनके काम की प्रशंसा तो आप कर सकते हैं, मगर उन जैसा काम आप मेहनत के बल पर नहीं कर सकते। रामानुजन दूसरे तरह के महानतम व्यक्तित्वों में से ही एक थे। उनके लिखे कई सूत्र या प्रमेय आज भी हल नहीं किये जा सके है, या कहें कि उनकी उपपत्ति आज भी उपलब्ध नहीं है, मगर उन सूत्रों का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सफ़लता के साथ हो रहा है। पूरी दुनिया के तमाम महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ रामानुजन के द्वारा लिखे गये सूत्रों पर आज भी गहन शोध कार्य कर रहे हैं।


        यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि भारत में यह वर्ष “राष्ट्रीय गणित वर्ष” के रूप में मनाया जा रहा है। चेन्नई में सम्पन्न हुयी राष्टीय विज्ञान काँग्रेस में प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के जन्म के 125वें वर्ष को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। यह सर्व विदित है कि श्रीनिवास रामानुजम का जन्म तमिलनाडु में इरोड में एक बहुत ही साधारण परिवार में 22 दिसम्बर, 1887 को हुआ था। अत्यन्त साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद रामानुजम अद्वितीय प्रतिभा और तर्कशक्ति और सृजनात्मकता के धनी थे। रामानुजम बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे और मद्रास विश्वविद्यालय से सन 1903 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा कई पुरस्कारों के साथ पास की। हाई स्कूल के बाद ही उन्हें अत्यन्त प्रतिष्ठित “सुब्रयमण्यम छात्रवृत्ति” प्रदान की गयी जो कि उस समय गणित और अंग्रेजी के बहुत उत्कृष्ट छात्रों को दी जाती थी। उनका मन गणित की कठिन से कठिन समस्याओं को सुलझाने में खूब लगता था, और इसी कारण वे अन्य विषयों में उचित ध्यान न दे पाने की वजह से  ग्यारहवीं कक्षा में फेल हो गये। इसके बाद कुछ वर्षों तक वे ट्यूशन पढाकर और बही खाते लिखने और मिलाकर अपनी आजीविका चलाते रहे। 1906 में उन्होंने एक बार फिर मद्रास के पचियप्पा कॉलेज में ग्यारहवीं में प्रवेश लिया, और सन 1907 में उन्होंने बारहवी कक्षा की परीक्षा असंस्थागत विद्याथी के रुप में दी मगर पास नहीं हो पाये। इस तरह उनकी परंपरागत शिक्षा यहीं समाप्त हो गयी। ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं और कष्टों को लगातार झेलते हुये भी  उन्होंने गणित में अपना शोधकार्य सतत जारी रखा। रामानुजन का यह सफर अत्यन्त रोचक और प्रेरणादायी है।


          इसी बीच 14 जुलाई, 1909 को रामानुजम का विवाह कुंभकोणम के पास राजेन्द्रम गाँव के सम्भ्रान्त परिवार वाले श्री रंगास्वामी की पुत्री जानकीअम्मल से हो गयी। इसके बाद वे नौकरी की तलाश में निकल पडे।  बहुत प्रयास करने के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अपने रिश्तेदार और पुराने मित्रों से इस सम्बन्ध में मदद माँगी। वे अपने पूर्व शिक्षक प्रोफेसर अय्यर की सिफारिश पर नैल्लोर के तत्कालीन जिलाधीश श्री आर. रामचंद्र राव से मिले जो कि उस समय इंडियम मैथमैटिकल सोसाइटी के अध्यक्ष भी थे। आर. रामचंद्र राव ने रामानुजम की नोटबुक देखकर (जिसमें उन्होंने सूत्रों और प्रमेय लिखे थे जिनकी उपपत्ति उन्होंने स्वयं की थी) काफी सोच विचार करके रामानुजम के लिये पच्चीस रुपये प्रतिमाह की व्यवस्था कर दी थी। सन 1911, की शुरुआत से लगभग एक साल तक रामानुजम को यह पारितोषिक प्राप्त होता रहा। इसी साल रामानुजम का प्रथम शोध पत्र “जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी” में प्रकाशित हुआ। इस शोध पत्र में उन्होंने बरनौली संख्याओं के बारे में अध्य्यन किया था और इस शोध पत्र का शीर्षक था- “बरनौली संख्याओं की कुछ विशेषतायें” [जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी, वर्ष-3 पृष्ठ219-234]। एक वर्ष तक की अवधि वाले पारितोषिक के खत्म होने के बाद 1 मार्च 1912 को उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्र्स्ट में क्लास 3, चतुर्थ ग्रेड के क्लर्क के बतौर मात्र तीस रुपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी शुरु कर दी। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट की नौकरी करते हुये रामानुजम ने विशुद्ध गणित के अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र रुप से शोध कार्य किया, इस प्रक्रिया में वे किसी की मदद नहीं लेते थे और न ही उन्हें  उत्कृष्ट किताबें उपलब्ध थीं। शायद, गणित में शोध कार्य वे स्वांत सुखाय करते थे, उन्हें गणित के सूत्र हल करने में आन्तरिक आनन्द की प्राप्ति होती थी। रामानुजन ने एक बार कहा था, “यदि कोई गणितीय समीकरण अथवा सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिये निरर्थक है।” रामानुजन सामान्यतः स्लेट और चॉक के साथ समीकरणों और सूत्रों का हल करते और जो निश्कर्ष निकलकर सामने आते उन्हें वे अपनी एक नोटबुक में लिख लेते थे। ऐसा वे शायद इस लिये करते थे क्यों कि उनके पास कागज और पेन की सहायता से शोध करने के लिये पर्याप्त धन की कमी थी। हालाँकि मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में उनके पास जो काम होता था उसे वे अपनी गणितीय क्षमताओं के बल पर बहुत ही कम समय में पूरा कर देते थे और बाकी समय में कार्यालय के खराब कागजों पर सूत्र हल किया करते थे। 

      मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में रामानुजन के अधिकारियों का रवैया बहुत ही सौहार्द पूर्ण था, वे रामानुजन की गणितीय क्षमताओं के प्रशंसक थे और चाहते थे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में अपना कार्य जारी रखें। रामचन्द्र राव भी रामानुजन का पूरा ध्यान रखते थे। उनके ही कहने पर मद्रास इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर सी.एल.टी. ग्रिफिथ ने रामानुजन के कार्य को विभिन्न प्रसिद्ध और जानकार गणितज्ञों के पास भेजा, जिनमें यूनीवर्सिटी कॉलेज लन्दन के प्रसिद्ध गणितज्ञ एम. जे. एम. हिल प्रमुख थे। प्रो. हिल ने रामानुजन को अपनी समझदारी और प्रस्तुतिकरण में सुधार के सम्बन्ध में कई बार बहुत अच्छे सुझाव दिये लेकिन उन्होंने रामानुजन को विशुद्ध गणित में शोध के क्षेत्र में स्थापित होने के लिये कोई अन्य महत्वपूर्ण प्रया नहीं किये।
          इसके बाद रामानुजन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रमुख गणितज्ञों को पत्र लिखने शुरु किये और इन पत्रों के साथ अपने शोध कार्य के कुछ नमूने भी भेजे ताकि वे उनके कार्य का प्रथम दृष्टतया मूल्याँकन कर सकें। इसी बीच रामानुजन के ही एक पूर्व शिक्षक प्रो. शेषु अय्यर ने उन्हें प्रो.जी.एच. हार्डी को पत्र लिखने की सलाह दी। 16 जनवरी 1913 को पहली बार रामानुजन ने प्रो, हार्डी को पत्र लिखा और साथ में स्वयं द्वारा खोजी गयी प्रमेयों को भी अलग से संलग्न किया। संलग्न पृष्ठों में बीजगणित, त्रिकोंणमिति, और कैलकुलस की शब्दावली में अपने निश्कर्षों को लिखा था। रामनुजन ने प्रो. हार्डी को लगभग 120 प्रमेयों जो कि निश्चिततान्त्मक-समाकलन के मान निकालने, अनंत श्रेणियों के योग निकालने, श्रेणियों को समाकलनों से परिवर्तित करने, और इनका निकटतम मान निकालने आदि से सम्बन्धित थीं। प्रथमदृष्टतया प्रो. हार्डी को लगा कि कोई लडका शायद बडी बडी बातें कर रहा है, मगर चूंकि रामानुजन ने पत्र में अपनी प्रमेयों की उपपत्तियाँ नहीं लिखीं थी, अतः प्रो. हार्डी रामानुजन की प्रमेयों में उलझते चले गये, वे कुछ प्रमेयों के हल निकालने में असफल रहे, मगर उन्होंने पाया कि वे प्रमेय कई स्थानों पर प्रयोग करने पर सही सिद्ध होती थी। प्रो. हार्डी उस समय मात्र 35 वर्ष की आयु के होने के बावजूद इंग्लैड में गणित के क्षेत्र में नयी विचारधारा के प्रवर्तक के रुप में जाने जाते थे। इस प्रकार प्रो, हार्डी ने रामानुजन की प्रतिभा का लोहा माना और यह स्वीकार किया कि उन्हें पत्र लिखने वाला कोई साधारण लडका नहीं बल्कि असीम प्रतिभा का धनी गणितज्ञ है। इसके बाद प्रो. हार्डी ने रामानुजन को इंग्लैंड बुलाने के लिये निमंत्रण भी भेजा मगर रामानुजन उस समय विदेश जाने को तैयार नहीं हुये। इसी बीच उनका प्रो. हार्डी के साथ पत्र व्यवहार चलता रहा। 


          रामानुजन व्यक्तिगत कारणों से विदेश नहीं जाना चाह रहे थे, मगर बाद में 22 जनवरी, 1914 को प्रो.हार्डी को लिखे पत्र में वे इंग्लैड जाने के लिये सहमत हो गये।रामानुजन के इंग्लैंड जाने के लिये सहमत होने के पीछे भी एक कहानी प्रचलित है, जो कि लोगों में काफी प्रसिद्ध भी है। 17 मार्च, 1914 को वह समुद्री जहाज से इंग्लैडके लिये रवाना हो गये। तब तक रामानुजन गणितज्ञ के रुप में काफी प्रसिद्ध हो गये थे, और उन्हें जहाज पर छोडने आने वालों में कई गणमान्य लोग आये थे। 14 अप्रैल को वह टेम्स नदी के किनारे इंग्लैंड पहुंच गये, और अप्रैल के महीने में  ही कैम्ब्रिज में प्रो. हार्डी से मिलकर शोधकार्य शुरु कर दिया। यहाँ उन्होंने गणित के सिद्धान्तों को और अच्छी तरह से समझने के लिये कुछ अच्छे प्रोफेसरों की कक्षाओं में जाना शुरु कर दिया। धीरे धीरे रामानुजन ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करना शुरु किया। मार्च 1916 में उन्हें कैन्ब्रिज विश्वविद्यालय के द्वारा अपने 62 पृष्ठों वाले अंग्रेजी में प्रकाशित शोध लेख “हाईली कम्पोजिट नम्बर्स” के आधार पर बी.ए. (शोध के द्वारा) की उपाधि दी गयी। सन 1915 से 1918 तक उन्होंने कई शोध पत्र लिखे। 6 दिसम्बर, 1917 को रामानुजन प्रो. हार्डी के प्रयासों से लंदन मैथमेटिकल सोसाइटी में चुन लिये गये। । इसके बाद, मई 1918 में रामानुजन को “रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन” का फेलो चुन लिया गया। यह किसी भारतीय के लिये बहुत ही सम्मान की बात थी। इस बीच रामानुजन का स्वास्थ्य लगातार गिरता चला गया था। इन सम्मानों के कारण रामानुजन के उत्साह में पुनः परिवर्तन आया और उन्होंने प्रो. हार्डी को कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष भेजे। इसके बाद उनका एक शोध पत्र “सम प्रोपरटीज ऑफ पी(एन), द नम्बर ऑफ पार्टीशन्स ऑफ ’एन’ प्रोसीडिंग्स ऑफ द कैम्ब्रिज फिलोसोफ़िकल सोसाइटी के सन 1919 के अंक में भी प्रकाशित हुआ। इसके तुरंत बाद, इसी वर्ष एक और शोध पत्र “प्रूफ ऑफ़ सर्टेन आइडेंटिटीज इन कंबीनेटोरियल एनालिसिस” भी इसी शोध जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उनके दो महत्वपूर्ण शोध पत्र और प्रकाशित हुये जिनमें उन्होंने पार्टिशन फलनों और प्रथम एवं द्वितीय रोजर-रामानुजन के बीच सम्बन्ध स्थापित किये थे। 27 मार्च, 1919 को रामानुजन बम्बई आ गए। अपने चार साल के अल्प प्रवास में उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं थी। उनके विशुद्ध गणित के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे और कई फ़ेलोशिप्स भी उन्हें मिल चुकी थीं। सबसे महत्वपूर्ण उपाधि रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन से उन्हें अपना फ़ेलो  (एफ.आर. एस.) चुना जाना था। चार साल के अल्प प्रवास में इतनी बडी उपलब्धियाँ कोई असाधारण ही प्राप्त कर सकता है।

         उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड रहा था, मगर वे लगातार गणित में शोध कार्य करते जा रहे थे। अपने अन्तिम समय में उन्होंने मॉक थीटा फलन और फाल्स थीटा फलन पर शोध कार्य किया जो कि उनका सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट कार्य माना जाता है। 12 जनवरी, 1920 को उन्होंने प्रो. हार्डी को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने उन्होंने कई निष्कर्ष भेजे। इन निष्कर्षों में 4 तीसरी श्रेणी के. 10 पाँचवी श्रेणी आदि ”मॉक थीटा फलन” के कई नये सूत्र थे। उनका मॉक थीटा और क्यू-सीरीज पर किया गया कार्य विस्तृत है, कुल मिलाकर इसमें 650 सूत्र हैं। 26 अप्रैल, 1920 को रामानुजन लम्बे समय तक खराब स्वास्थ्य के कारण सुबह ही अचेत हो गये और कुछ घन्टों बाद वह चिर निद्रा में सो गये।
          रामानुजन के सुत्रों पर विदेशों में उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के प्रतिभावान वैज्ञानिक शोध कार्य में लगे हुये है। रामानुजन को भौतिकी के अल्बर्ट आइन्स्टीन की कोटि का गणितज्ञ कहा जाना चाहिये, जिन्होंने गणित में बिना किसी औपचारिक शिक्षा के ग्रहण किये भी गणित के विकास की दिशा को न सिर्फ़ प्रभावित किया बल्कि नये आयाम दिये। रामानुजन भारतीय प्रतिभा के प्रतीक हैं और सिरमौर भी। उनके जन्म की 125वीं वर्षगाँठ को भारत “राष्ट्रीय गणित वर्ष” के रुप में मना रहा है। रामानुजन अपने शोध कार्य और गणितीय प्रतिभा के कारण अनन्त काल तक हमें प्रेरणा देते रहेंगे। 

Saturday, April 14, 2012

विदेशों में बढ़ रहा है आयुर्वेद का क्रेज़


        भारत में चिकित्सा के परंपरागत तरीकों के सम्बन्ध में लोग भले ही बहुत गम्भीर न हों, मगर भारत के बाहर कई देशों ने आयुर्वेद जैसी चिकित्सा पद्धतियों को बहुत उत्साह के साथ स्वीकार किया है। एलोपेथिक दवाइओं के लगातार बढ़ते साइड-इफ़ेक्ट्स के कारण लोगों का ध्यान चिकित्सा के परंपरागत तरीकों की ओर जाने लगा है। अब, भारत की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के दीवाने विश्व भर के तमाम हिस्सों में देखने को मिल जाते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं की ख़ास विशेषता यह है कि ये किन्हीं सिन्थेटिक रसायनों की मदद के बिना नेचर से सीधे प्राप्त करके बनाईं जाती हैं यह बिना खराब हुये बहुत अधिक दिनों तक इस्तेमाल के लायक रहतीं हैं और साथ ही इनके साइड इफ़्फ़ेक्ट्स भी नहीं होते। इसी तरह के कुछ कारणों से विदेशों में इंडिया की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति धूम मचा रही है।
      
      भारत में परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों के सम्बन्ध में उतनी रिसर्च नहीं हुयी जितनी कि होनी चाहिये थी। ये पद्धतियाँ समय के साथ किये गये प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर विकसित हुयी हैं, इस कारण हर दवा के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। कई बार मरीज़ों को इन पद्धतियों से आराम तो मिल जाता है लेकिन डॉक्टर्स और साइंटिस्ट आयुर्वेदिक दवाओं के प्रभाव के कारणों के बारे में नहीं समझ पाते। पिछले सौ सालों में डॉक्टरों और स्पेशलिस्टों ने आयुर्वेद में कम इन्टेरेस्ट दिखाया। इस कारण से यह परंपरागत चिकित्सा पद्धति धीरे धीरे चलन से बाहर हो गयी थी। मगर पिछले कुछ सालों में दुनियाँ भर के लोगों ने इनका इस्तेमाल करना शुरु किया है, और इन चिकित्सा पद्धतियों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।

        विदेशों में कई डॉक्टर आयुर्वेद में अपना इंटेरेस्ट दिखा रहे हैं। अर्जेन्टीना के डॉ. सर्गिओ सूरेज़ एक ऐसे स्पेशलिस्ट हैं, जिन्होंने अपना कैरियर आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के प्रचार-प्रसार और विकास में बनाया। डॉ. सर्गिओ का आयुर्वेद में इन्टेरेस्ट तब जागा, जब वह 1980 में इंडिया घूमने आये थे। उस समय लैटिन अमेरिका में आयुर्वेद को कोई नहीं जानता था। तीस साल के लम्बे संघर्ष में, डॉ. सर्गिओ ने आयुर्वेद को लैटिन अमेरिका में चर्चा का विषय बनाया है। वह आज भी सुबह जागने के बाद योगा और मेडीटेशन करते हैं। वे इंडियन फिलेसॉफ़ी के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। सोलह साल तक डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के बीच आयुर्वेद, योगा और मेडिटॆशन के बारे में जानकारियाँ देने के प्रयासों के साथ, डॉ. सर्गिओ अर्गेन्टीना के एक विश्वविद्यालय में आयुर्वेदिक मेडिसिन का डिपार्टमेंट शुरु कराने में कामयाब रहे। इसकी सफ़लता को देखते हुये, यूनीवर्सिटी ऑफ़ ब्यूनस आयर्स ने आयुर्वेद के कुछ कोर्स शुरु किये थे। इनके बाद कैथोलोक यूनीवर्सिटी और कॉर्डोबा यूनीवर्सिटी ने भी आयुर्वेद पर कई कोर्सेज़ शुरु किये, जिनकी अर्जेन्टीना के छात्रों में खासी लोकप्रियता है। डॉ. सर्गिओ ने अर्जेन्टीना में ही नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका के कई देशों में डॉक्टरों को आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की ट्रेनिंग दी। ब्राज़ील की हेल्थ मिनिस्ट्री ने डॉ. सर्गिओ को अपने देश में 350 डॉक्टरों के एक ग्रुप को आयुर्वेदिक चिकित्सा की ट्रेनिंग देने के लिये आमंत्रित किया था। डॉ. सर्गिओ ने ब्राज़ील के कई शहरों में जाकर ब्राज़ीलियन पुलिस को डिप्रेशन और टेन्शन से बचने के लिये योगा और मेडीटेशन की ट्रेनिंग दी। इन कार्यक्रमों से ब्राज़ील में भी आयुर्वेद चर्चित हो गया। इसके बाद, लैटिन अमेरिका के एक टीवी चैनल ने आयुर्वेदिक चिकित्सा, योगा और मेडिटेशन पर डॉ. सर्गिओ को लैक्चर देने के लिये आमंत्रित किया और इस तरह लैटिन अमेरिका में भारतीय चिकित्सा पद्धतियाँ काफ़ी चर्चित हुयीं। डॉ. सर्गिओ चाहते हैं कि अर्जेन्टीना और लैटिन अमेरिका में आयुर्वेद, योगा और मेडीटेशन को ऑफ़ीशियल और लीगल स्तर पर मान्यता मिले, और इसके लिये वह लगातार प्रयासरत हैं।

        अनुभवों और प्रयोगों के निष्कर्षों पर आधारित आयुर्वेद जैसी तमाम परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों के सम्बन्ध में हमें बहुत पहले ही गम्भीर रिसर्च शुरु करना चाहिये थी और इनके बेहतर पहलुओं का प्रचार-प्रसार करना चाहिये था। आशा है नयी जनरेशन यह अधूरा काम पूरा करेगी।

Monday, February 13, 2012

Doomsday and Market of Phobia


-Meher Wan
  
           As we have entered in 2012, speculations about Doomsday are on full swing in common public to internet. The stories of doomsday got rebirth after the movie “2012” directed by Roland Emmerich, which was based on supposed uncontrolled devastation in 2012. This movie neither talks about the fictional planet “Nibiru” nor Polar shift of earth with appropriate clarity. Presently, there is much amount of material around us regarding doomsday-2012. You can find approximately 200 books dealing with doomsday on book-selling website ‘Amazon’. Many other websites are claiming of doing research for survival of mankind during doomsday crisis. News of this hoax is blossomed on every face of media and public.

       The saga began with the claims that a supposed planet ‘Nibiru’, which was discovered by the Sumerians of Mayan civilization, will collide with our earth in Dec, 2012. A controversial fiction writer Zecharia Sitchin writes about Sumer of the Mesopotamian civilization. He wrote in his many books (e.g. “The twelfth planet”), that he has found the strong evidences of planet ‘Nibiru’ in ancient Sumerian documents. Some so-called specialists of Mesopotamian civilization claim that the Mayan calendar will end in December 2012 and Mesopotamian people were aware of this doomsday. That was the main reason, they had calculated the days of their calendar till 2012 only. Some speculate that magnetic poles of earth will shift their position in Dec, 2012 and this will cause huge destruction. Till now, there are a number of theories regarding doomsday in 2012, which consists change in earth’s rotation axis, huge solar storms, alignment of sun with galactic center, black hole in galactic center, the dark rift in milky-way and many more. The limit was crossed when I read about end of life on earth due to global warming in 2012.
        There is nothing wrong in the fact that Mayan calendar will have so-called end in Dec, 2012. Mayan method of calculating the weeks and years was very hectic and tiring as it was a very long method. Neither had they advanced methods of arithmetic nor the computers as we have today. They could have calculated these spans of time with pen and papers. We can guess the complexity of these calculations by knowing, that in Mayan calendar one Alautun (Mayan unit of time) is equal to approximately twenty three billion days. All the calendars have a sort of periodicity in dates or in other parameters. Some experts and astronomers are saying that Mayans’ calendar system has cycles when their parameters match after a certain time, period of this cycle is 5128 years. Current cycle in Mayan calendar system was thought to have started in 3114 BC and it will end in 2012. According to this theory, the next cycle will end in 7140 AD. This is the point when hype overtakes reality.
         ‘Nibiru’ is a name in Babylonian astrology sometimes associated with the god Marduk. Nibiru appears as a minor character in the Babylonian creation poem Enuma Elish as recorded in the library of Assurbanipal, King of Assyria (668-627 BCE). Sumer flourished much earlier, from about the 23rd century to the 17th century BC. It is a supposed name of a hypothetical planet. Thousands of astronomers all over the globe with Hubble telescope in space are scanning the surroundings of earth with keen giant telescopes in visible, infrared and ultraviolet region. If this planet is to be collided with earth in Dec, 2012, this object should be in visible range of our giant telescopes from at least beginning of this year. If we consider the speculations that Nibiru is orbiting sun in every 3600 years, calculated speed of this object in its’ proposed orbit will be much less than speed of light. Thus, this should be seen by our telescopes spread all over the globe. Unfortunately, no object of this profile has been seen in any telescope till now. If any astronomer had seen it, he was supposed to publish his too much important finding related to whole life on earth.

            Magnetic Pole Shift Theory is also not possible in a very short period of time. This process may take some millions of years. Thus it will also not happen suddenly on proposed doomsday date 21-12-12. Similarly, with the laws of physics, rotation axis of earth will not be shifted suddenly in one day or even one month.  All these types of news are a hoax to create fear and anxiety in general public.
      
    The question is who are responsible for creating these types of hoax in the media, which create phobia and panic in public? Also, what are the benefits of creating these types of hoax? Movies are being released dealing with public fear about many topics from collapse of dams to doomsday. News channels are eager to sell phobia by showing breaking news and special reports with live coverage. A new type of market is evolving in the mean time and that is market of fear. After long sell of the dreams, sex etc, now it’s time to sell fear. I have seen some websites encouraging people to register for a lottery to those who will be saved during doomsday crisis. These websites are encouraging people to spend their money as nothing will remain after doomsday to enjoy or whatever people want without any question of right or wrong. Creating this sort of fake websites is a new advertising technique called “vi­ral marketing”, by analogy with computer viruses. We should understand that these types of hypes are reinforced by cheap market. The world will not end so quickly, it will go on with its direct and indirect contradictions.

Thursday, January 26, 2012

अमेरिकी इंटरनेट कानून और बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा का प्रश्न







           -मेहेर वान
         अमेरिका में ऑनलाइन दस्तावेजों की चोरी और अवैध नकल को रोकने सम्बन्धी कानून बनाने को लेकर शुरु हुये विवादों का कोई स्पष्ट निबटारा नहीं हो सका है। इस मुद्दे पर अमेरिकी मनोरंजन और फ़िल्म निर्माण सम्बन्धित उद्योगों के लोगों में एक धूमिल विभाजक रेखा उभर कर सामने आने लगी है। इन उद्योगों से जुड़े लोग इस विवाद में चाहे जिस ऒर हों, मगर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली आम जनता ने, अमेरिकी सरकार द्वारा प्रस्तावित ऑनलाइन दस्तावेज़ों की अवैध नकल और चोरी रोकने सम्बन्धी कानूनों का बड़े पैमाने पर विरोध किया है। अमेरिकी संसद में पास किये जाने के लिये प्रस्तावित “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम (SOPA)” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम (PIPA)” के विरोध में विश्व भर की जनता ने विरोध जताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का अधिनियम आने पर इंटरनेट पर स्वतंत्र इच्छाशक्ति और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की संकल्पना खत्म हो जायेगी।
         पिछले दिनों भारत में भी मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर राष्ट्रविरोधी और देश के खास वर्ग के लोगों में असंतोष और हिंसा भड़काने वाले वक्तब्यों को सार्वजनिक रूप से पोस्ट करने पर रोक लगाने के सम्बन्ध में बयान दिये गये थे। वस्तुतः ये बयान भी अमेरिकी संसद में बहस के लिये प्रस्तुत किये जाने वाले कानूनों से प्रभावित होकर दिये जाने वाले बयान कहे जा सकते हैं। इन बयानों के कारण कपिल सिब्बल को भी काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा था। ठीक यही अमेरिका के “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम” के साथ भी हुआ है। ये अधिनियम इंटरनेट पर बौद्धिक सम्पदा की सुरक्षा और ऑनलाइन दस्तावेज़ों की अवैध नकल रोकने के लिये बनाये जाने वाले थे। वस्तुतः इन अधिनियमों का प्रमुख निशाना अमेरिका के बाहर से संचालित होने वाली वे वेबसाइट्स हैं जिन पर फ़िल्मों और संगीत से लेकर अन्य बौद्धिक सम्पदा उपलब्ध है और इन इन वेबसाइट्स से फ़िल्में, संगीत आदि को बिना कोई भुगतान किये डाउनलोड किया जा सकता है। इस तरह से फ़िल्मों और संगीत से जुड़ी कई मनोरंजन कम्पनियों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ता है। अनेकों वेबसाइट्स पर टीवी चैनलों के कई रियालिटी शो और खेल प्रतियोगितायें अवैध तरीके से दिखाईं जाती हैं। इंटरनेट के ज़रिये इन्हीं अवैध तरीकों से पैसे कमाने पर रोक लगाने के लिये अमेरिकी सरकार, दो विधेयक संसद में बहस के लिये लाने वाली थी। लेकिन इन विधेयकों का स्वरूप कुछ इस तरह है कि इन विधेयकों के पास होने पर गूगल जैसे बड़े सर्च इंजन और फ़ेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट्स भी सीधे तौर पर खतरे में पड़ जायेंगीं, जिन्होंने इंटरनेट को एक बड़े उद्योग के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
          इंटरनेट पर अवैध नकल रोकने और बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा के सम्बन्ध में पहले से ही कई नियम हैं। इन नियमों को ध्यान में रखते ही गूगल द्वारा संचालित वेबसाइट “यूट्यूब” पर पिछले वर्ष वीडियो हटाने सम्बन्धी लगभग पाँच लाख शिकायतें आयीं थी, गूगल के अनुसार जिनमें से वैध शिकायतों का निबटारा छैः घन्टे की समय सीमा के अन्दर किया गया था। इसी तरह संवैधानिक तरीके से निवेदन करने पर विभिन्न वेबसाइट्स को संचालित करने वाले सर्वरों द्वारा विवादित दस्तावेज़ वेबसाइट से हटा लिये जाते हैं। गूगल जैसे सर्च इंजन भी विवादित दस्तावेज़ों वाली वेबसाइट्स से न्यायालय के आदेश पर या संवैधानिक निवेदन पर सिर्फ़ विवादित दस्तावेज़ अदृश्य कर देते हैं। लेकिन “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम” में इस सम्बन्ध में बहुत ही कठोर दण्डों का प्रावधान है। इन अधिनियमों का सबसे कमज़ोर पक्ष यह है कि इन अधिनियमों में बहुत ही अस्पष्ट शब्दावली का प्रयोग किया गया है। जैसे कि अगर किसी वेबसाइट या सर्च इंजन पर कोई अवैध सामग्री पाई जाती है तो उसके खिलाफ़ कार्यवाई में पूरी वेबसाइट या सर्च इंजन के सर्वर को ब्लॉक यानि बन्द कर दिया जायेगा। यानि कि अगर फ़ेसबुक जैसी वेबसाइट पर कोई सामान्य उपभोक्ता आपत्तिजनक या अवैध सामग्री पोस्ट करता है तो पूरी फ़ेसबुक वेबसाइट का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। इन अधिनियमों में आपत्तिजनक सामग्री वाली वेबसाइट्स के बैंक एकाउँट और पेनपाल जैसी सुविधायें भी बन्द कर दिये जाने का प्रस्ताव है। इस तरह ये कानून इंटरनेट उद्योग की दशा और दिशा में अप्रत्याशित परिवर्तन करने वाले हैं, और अधिकतम परिवर्तन मुख्यतः नकारात्मक ही होंगे।
        पिछले दिनों तमाम वेबसाइट्स ने इन अधिनियमों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई है। प्रसिद्ध गैर-लाभग्राही वेबसाइट विकीपीडिया ने 24 घंटों तक अपनी स्क्रीन काली रखी। गूगल और याहू समेत नौ तकनीक कम्पनियों ने अमेरिकी सरकार को पत्र लिखकर याद दिलाया कि 13 महत्वपूर्ण देशों की जीडीपी में 3.4 प्रतिशत योगदान इंटरनेट का होता है, जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इंटरनेट का योगदान अन्य देशों की तुलना में सर्वाधिक है। गूगल और विकीपीडिया की मुहिम को विश्व भर में लाखों इंटरनेट उपभोक्ताओं का समर्थन मिला है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कानून,  अमेरिकी वेबसाइट्स को नुकसान पहुँचाये बिना, अमेरिका के बाहर की वेबसाइट्स को बन्द किये जाने  के लिये किये गये साफ़ सुथरे प्रयास हैं। वास्तव में, सिलिकन वेली के पास ’स्पॉटीफ़ाई’ और ’नेट्फ़्लिक्स’ जैसे भी कुछ सेवा प्रदान करने वाले प्रक्रम हैं, जो कि इस तरह के अधिनियमों के बिना इस गम्भीर समस्या पर काबू पा सकते हैं। सही मायनों में, इंटरनेट पर अवैध नकल और दस्तावेज़ों की चोरी की समस्या से निबटने के लिये इस उद्योग के रचनात्मक लोगों पर ही विश्वास किया जाना चाहिये कि वे नये उपक्रमों से ये अपराध कम कर पायेंगे। राजनीतिक नियमों और गुटबाज़ी से ये समस्यायें और जटिल होतीं चलीं जायेंगीं।

Thursday, December 15, 2011

आसक्ति और अनासक्ति के बीच बने राग का सूफ़ी: जगजीत सिंह


---मेहेर वान
          
 (हालांकि समय-यात्री आम तौर पर विज्ञान की दुनियाँ के सफ़र पर निकलता है, मगर उसे संगीत भी बहुत पसंद है| समय यात्री का एक हमसफ़र, एक दिन उससे अलविदा कह गया| उसी हमसफ़र को याद करते हुए- )
       




जगजीत सिंह की आवाज़ कब जिंदगी की हमसफ़र बन गयी, पता ही नहीं चला। कभी इसी आवाज़ को दादा के रेडियो और पापा के टेप-रिकॉर्डर पर सुना था। जब स्कूल में था तो जगजीत की ग़ज़लों के अर्थ अनबूझे से लगते थे, जिन्हें महसूस करने के लिये शायद न तो हमारे लिये उपयुक्त परिस्थितियाँ थी न हमारा संघर्ष उन भावनाओं और एहसासों से मेल खाता था। धीरे-धीरे समय के साथ अनुभव और एहसास बदलते गये, तो जगजीत सिंह की ग़ज़लें क़रीब आती गयीं। इसका कारण सिर्फ़ ग़ज़लों के बेहतरीन शब्द ही नहीं थे, जो मध्यवर्गीय संघर्ष और भावनाओं के ज्वार-भाटों को किनारा देते हुये प्रतीत होते थे। उन शब्दों को सुरों से सजाने वाली आवाज़ भी उतनी ही असरदार और अपनापे का एहसास कराने वाली थी कि जगजीत के चाहने वालों में उम्र का फ़र्क मिट जाता है। शायद यही कारण है कि, हर कोई अपने-अपने स्तर पर जगजीत की ग़ज़लों से जुड़ने का कारण तलाश लेता है। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल गायिकी को उस समय एक नयी दिशा दी, जब ग़ज़लों के चाहने वाले लगातार कम हो रहे थे। ६० के दशक में ग़ज़ल गायिकी में शास्त्रीय संगीत का प्रभाव ज़्यादा था। उन्होंने ग़ज़ल गायिकी को परंपरागत संगीत और गायन से अलग करते हुये, उसमें पार्श्व संगीत का उपयुक्त समायोजन करते हुये नयी तरह से ग़ज़ल गाना शुरु किया। ग़ज़ल को सुगम और सुग्राह्य बनाने के लिये उन्होंने अपेक्षाकृत सरल शब्दों वाली रचनायें भी गायन के लिये चुनीं, उनका यह प्रयोग सफ़ल रहा और इससे आम लोगों में ग़ज़ल की पहुँच लगातार बढ़ती गयी।
             जगजीत सिंह का संगीत में बचपन से ही रुझान था और वे अपने पैतृक गाँव श्रीगंगा-नगर में पं०छगनलाल शर्मा से संगीत की शिक्षा लेना शुरु कर चुके थे। इसके बाद, महान गायक तानसेन के सैनिया घराना के गायक उस्ताद जमाल खान के यहाँ भी उन्होंने छः साल तक ठुमरी, खयाल ध्रुपद और भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। संगीत की बारीकियाँ उन्होंने यहीं सीखीं। इसके साथ ही जगजीत सिंह ने इतिहास में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई भी की। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सूरजभान उनकी गायन प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ही जगजीत सिंह को गायन में अपना कैरियर बनाने कि लिये प्रेरित करते हुये बम्बई जाने की सलाह दी थी। जगजीत सिंह, अपने परिवार में जीत सिंह के नाम से जाने जाते थे, और गायिकी की शुरुआत में वे जगमोहन के नाम से गाते थे, बाद में वे अपना नाम बदल कर जगजीत सिंह के नाम से गाने लगे। बम्बई में फ़िल्मों में पार्श्व गायन्के लिये आये थे मगर गायन के क्षेत्र में उनकी शुरुआत विज्ञापनों में गाये जाने वाले “जिंगल्स” से हुयी। सुरेश अमीन की गुज़राती फ़िल्म “धरती ना छोरू” में उन्हें सबसे पहले ब्रेक मिला। विज्ञापनों में जिंगल्स गाते हुये उनकी भेंट चित्रा सिंह से हुयी, चित्रा सिंह भी गायन से जुड़ी हुयीं थीं। बाद में इस जोड़ी ने कई बेहतरीन दिल को छू लेने वाली सुरीली धुनों से सजी गज़लों से भारतीय संगीत से नवाज़ा।
            १९७० का दौर नूर जहाँ, मल्लिका पुखराज, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, मेंहदी हसन, तलत मेहमूद, और बेग़म अख़्तर की ग़ज़ल गायिकी का दौर था। सन १९७६ में जगजीत सिंह ने अर्द्ध-शास्त्रीय भारतीय संगीत पर आधारित ग़ज़ल-संग्रह “द अन्फ़ोरगेटबल्स” के नाम से निकाला, जिसकी परंपरागत आलोचकों ने ग़ज़ल गायन की संरचना को बदलने के कारण काफ़ी निन्दा भी की। इसके बावजूद यह ग़ज़ल संग्रह अपनी धुनों के सुरीलेपन और जगजीत की ताज़ी मखमली आवाज के कारण जनता में काफ़ी पसन्द किया गया। इस संग्रह ने ग़ैर-फ़िल्मी संगीत के कैसेटों की बिक्री के कीर्तिमान स्थापित किये। १९८० के ही दशक में उनकी दो फ़िल्में आयीं- “अर्थ” और “साथ-साथ” जिसके गीतों से सुनने वालॊं को आज भी उतना ही प्यार है जितना कि उस दौर में था। इसके बाद जगजीत सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उनके लगातार ग़ज़ल संग्रह आते रहे जिनमें उनका ग़ज़ल-चयन, धुन-निर्माण, और गायन शैली का संगम इतना बेमिसाल रहा कि संगीत के चाहने वालों ने उन्हें सर आँखों पर लिया। उनके प्रमुख संग्रहों में सर्च इनसाइट, मिराज, विज़न, कहकशाँ, लव इज़ ब्लाइंड, चिराग, मरासिम, फ़ेस टू फ़ेस, आइना, वादा, सहर , लम्हे और कोई बात चले आदि बेहद पसन्द किये गये। इनमें से १९९० के के पहले के लगभग सभी ग़ज़ल संग्रह उन्होंने चित्रा जी के साथ गाये। चित्रा जी के साथ उनका अंतिम संग्रह आया-  “समवन सम्व्हेयर” (कोई कहीं) और इसके बाद अपने इकलौते बेटे की असमय मौत के कारण चित्रा जी ने गायन से संन्यास ले लिया। इस के बाद लता मंगेशकर जी के साथ  उनका एक अल्बम आया “सजदा”, यह अल्बम बहुत ही सुरीली धुनों पर आधारित है और बहुत चर्चित भी हुआ। यहाँ उनके एक और अल्बम को याद करना ज़रूरी है। १९९० की शुरुआत में “बियॉन्ड टाइम” अल्बम आया जिसमें उन्होंने चित्रा जी के साथ गाया। यह अल्बम मल्टीट्रेक रिकॉर्डिंग तकनीक पर रिकॉर्ड हुआ था जो कि उस समय शायद भारतीय ग़ैर-फ़िल्मी गायकों की पहुँच से काफ़ी दूर था। इसमें प्रचलित सांगीतिक उपकरणॊं के सुरों के इतर भी कुछ आवाज़ें डाली गयीं थीं। जगजीत सिंह ने मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, क़तील शिफ़ाई, गुलज़ार और निदा फ़ाज़ली तक के समय के शायरों के कलामों को अपनी आवाज़ दी। उनकी गायी, बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल “लगता नहीं है दिल मेरा..” काफ़ी चर्चित हुयी थी। जगजीत सिंह के पंजाबी लोक संगीत में योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता।
               जगजीत सिंह की गायन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने ग़ज़ल को आम लोगों के स्तर तक उतारा, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने ग़ज़ल की गम्भीरता को वैसे ही बनाये रखा जैसे कि वह पहले थी। उन्होंने ग़ज़ल को सरल और सुगम और अधिक सुरीला तो बनाया ताकि जनता और बेहतरी से ग़ज़ल को समझ और महसूस कर सके, लेकिन ग़ज़ल गायिकी का सरलीकरण नहीं होने दिया। शायद यही प्रमुख कारण है जिसके लिये जगजीत सिंह लम्बे समय तक याद किये जायेंगे। ज़िंदगी की कठिन पहेली को समझने में आसक्ति और अनासक्ति के बीच बना जो सूफ़ियाना अंदाज़ होता है वह इस आवाज़ में न जाने कितनी रंगतों के साथ मुखर हो रहा था। “न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बन्धन..” जैसे शब्दों को हिन्दी फ़िल्मों के गानों में न जाने कितनी बार दोहराया गया है लेकिन जगजीत सिंह  की आवाज़ में ये गीत सुनने पर न जाने क्यों दिल की अन्तिम गहराइयों तक जाता है, दरअसल यह उनकी आवाज़ और उनके एहसास ही थी जो कि शब्दों को उनके बृहद अर्थ देते थे। यह बाद भी विचारणीय है कि तलत महमूद, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर, हेमंत कुमार जैसे प्रभावशाली गायकों के होते हुये ७० और ८० के दशक में जगजीत का उदय कैसे हुआ? ये वह दौर था जब फ़िल्मी संगीत तेज़ी से बीट पर आधारित पश्चिमी संगीत से प्रभावित हो रहा था। गानों में शोर और कोलाहल से युक्त बीट वाला संगीत दिया जा रहा था। जगजीत सिंह की धुनों का सुरीलापन और माधुर्य तथा आवाज़ का मखमली अंदाज़ संगीत सुनने वालों को ऐसे समय में बेहतर विकल्प प्रदान करता था। जगजीत सिंह की आवाज़ शास्त्रीय और अर्द्ध-शास्त्रीय संगीत की परम्पराऒं से बंधी तो हुयी थी मगर अपनी मौलिकता भी लिये हुयी थी। उनकी सफ़लता का कारण शायद यही है कि उन्होंने शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत को बहुत ही करीने से साथ साधकर पेश किया। जगजीत सिंह ने ग़ज़लॊं का चयन भी बहुत बेहतर ढ़ंग के साथ किया। उनकी गायी ग़ज़लें हमेशा साधारण जीवन के संघर्षों के साथ-साथ चलती रहीं। शहरीकरण के दौर में गायी गयी ग़ज़ल ”ये शहर भी कितना अजीब है, न कोई दोस्त है न कोई रक़ीब है..” को याद कीजिये, ये वही समय था जब लोगों ने शहरों की तरफ़ भागना शुरु किया था। रोज़गार और नौकरी की तलाश में युवा शहरों की तरफ़ भाग रहे थे। ये युवा अपने घर-बार, गाँव, कस्बे छोड़कर शहरआकर आर्थिक रूप से अशक्त तो हो रहे थे लेकिन छूटते साँस्कृतिक संसार और बिखरते रिश्तों के अकेलेपन में ये ग़ज़लें उनकी तन्हाई और अकेलेपन में साथी बन रहीं थीं। “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो…” जैसी ग़ज़लॊं को अपने निराले अंदाज़ और एहसासॊं के समन्दर से बनी मखमली आवाज़ से सजाकर उन्होंने लोगों के संघर्ष और विजय-पराजय के दुखों-सुखों को किनारा दिया। जगजीत सिंह गायकी के साथ हमेशा प्रयोग करते रहे। टीवी सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब में नसीरुद्दीन शाह के बेहतरीन अभिनय और जगजीत की बेमिसाल गायकी से इस टीवी सीरियल में मिर्ज़ा ग़ालिब के चरित्र की जटिलतायें और बेहतर ढ़ंग से सामने आ सकीं। वस्तुतः, यह एक तरह की प्रयोगधर्मिता और नया करने की कोशिश भी थी जो जगजीत को अपने अन्य समकालीनों से अलग करती थी।   

         
         १० अक्टूबर, २०११ को यह महान संगीतज्ञ हमें छोड़कर विदा हो गया, लेकिन ज़िंदगी की घनी धूप में उनकी ग़ज़लें घना साया बनकर हमारे बीच हमेशा ज़िंदा रहेंगी। ये अलग बात है कि उनके जाने के बाद हमें ये आभास हो- “तुम  चले जाओगे तो हम सोचेंगे, हमने क्या खोया हमने क्या पाया…”।



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Friday, December 9, 2011

शून्य से शिखर तक के सफर का यात्री- हर गोविन्द खुराना


                                                                                                                -मेहेर बान
      बचपन में जीव विज्ञान की किताबों में जब कोशिकीय अंगों के बारे में शिक्षक पढ़ाया करते थे, तो तमाम आविष्कारकों की सूची में सिर्फ़ एक ही नाम होता था जो कुछ अपना सा लगता था। परीक्षा में लिखने के लिये, इस नाम को कभी रटने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हम तो बस इतने में ही खुश रहा करते थे कि विज्ञान के अटपटे नामों के अथाह समन्दर में से एक नाम अपना सा है, और वो नाम एक बहुत बड़े वैज्ञानिक का है। उस समय अध्यापक ने बताया था कि गिने-चुने भारतीय वैज्ञानिकों में से एक हर गोविन्द खुराना भी हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। तब हमें यह अन्दाज़ा भी नहीं था कि नोबेल पुरस्कार कितना बड़ा होता है, हमारे लिये तो यही बहुत आश्चर्य कई बात थी कि जो कोशिका हमें दिखाई तक नहीं देती, उसके अंगों के काम करने की प्रक्रिया के बारे में इतना कुछ ये वैज्ञानिक कैसे जान लेते थे। बहुत बाद में विज्ञान की पढ़ाई करने पर तमाम संशयों के धुन्ध में कुछ सत्य दिखाई देने लगे, तो हर गोविन्द खुराना जैसे वैज्ञानिकों का महत्व बेहतर समझ आने लगा। प्रो.हर गोविन्द खुराना ने कोशिकाओं के अन्दर आनुवाँशिक सूचनाऒं के प्रोटीन में पहुँचने की प्रक्रिया को पहली बार समझाया था। इसी प्रक्रिया के ज़रिये जीवित कोशिकाओं में अन्य प्रक्रियायें सुचारु रुप से सम्पन्न होती हैं। इस कार्य के लिये उन्हें शरीर क्रिया विज्ञान के क्षेत्र में दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। विज्ञान के क्षेत्र में वे प्रो.सी.वी.रमन और प्रो.चन्द्रशेखर के बाद भारतीय मूल के तीसरे वैज्ञानिक थे, जिन्हें अपने आविष्कारों के लिये नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
       प्रो. हर गोविंद खुराना का सफ़र अविभाजित भारत के पंजाब (जो कि अब पाकिस्तान में है) के एक छोटे से गाँव रायपुर से शुरु हुआ और दुनियाँ के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक संस्थानों में से एक मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेकनोलॉजी, अमेरिका तक पहुँचा। हर गोविन्द खुराना की वास्तविक जन्मतिथि मालूम नहीं है, स्कूल में नाम दर्ज़ कराते समय 9 जनवरी 1922 की तिथि उनके जन्मदिन के रुप में लिख दी गयी थी। वो चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे थे। बताते हैं कि उस समय इस गॉव में सिर्फ़ डॉ.हर गोविन्द का परिवार ही साक्षर था। वर्तमान पश्चिमी पंजाब के मुल्तान (पाकिस्तान) में डी.ए.वी. कॉलेज़ से हाईस्कूल की पढ़ाई करने के बाद, उन्होनें पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से बी.एससी. और एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। बाद में अपने संस्मरणों में, वे अपने प्रारम्भिक शिक्षकों में से रतन लाल और महान सिंह को अक्सर अपने शैक्षिक जीवन के प्रकाश स्त्रोतों की तरह याद करते। 1945 में उन्हें इंग्लैंड में पढाई करने के लिये सरकारी वज़ीफ़ा प्राप्त हो गया। डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिये वे इंग्लैंड के लिवरपूल विश्वविद्यालय चले गये। वहाँ उन्होंने  प्रसिद्ध वैज्ञानिक रोज़र एस.बीर के निर्देशन में शोध कार्य शुरु किया। 1948-1949 में पोस्ट-डॉक्टोरल के लिये वे स्विट्ज़रलैंड आ गये जहाँ उन्होंने प्रोफ़ेसर व्लादिमीर प्रेलॉग के साथ काम किया, यही वो जगह थी जहाँ उन्होंने विज्ञान के प्रति नया नज़रिया मिला, जिसने उन्हें पूरा जीवन बिना थके हुये लगातार विज्ञान की सेवा की। 
         सन 1949 में कुछ समय के लिये वे भारत आये और 1950 में वे फिर सरकारी वज़ीफ़ा मिलने पर वापस इंग्लैंड चले गये, जहाँ उन्होंने कैम्ब्रिज़ विश्वविद्यालय में प्रो. ए.आर. टॉड के साथ काम किया, यहीं पर उनकी रुचि न्यूक्लियिक अम्लों और प्रोटीन्स में उत्पन्न हुयी। 1952 में उन्हें काउंसिल ऑफ़ ब्रिटिश कोलम्बिया, कनाडा से नौकरी का प्रस्ताव आया और वे कनाडा चले आये। 1952 में ही उन्होंने अपने स्विटज़रलैंड के समय की दोस्त ’एस्थर सिब्लर’ से शादी की। तत्पश्चात 1960 में वे आगे के शोध कार्य के लिये विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, अमेरिका चले आये। यहीं इंस्टीच्यूट ऑफ़ एन्जाइम्स रिसर्च में किये गये शोध कार्य के लिये उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1966 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार कर ली और 1968 में उन्हें शरीर क्रिया विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रॊ. खुराना का शोधकार्य कभी बाधित नहीं हुआ, वे 1970 में मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्य़ूट ऑफ़ टेकनोलॉजी में सम्मानित ’अल्फ़्रेड स्लोन प्रोफ़ेसर ऑफ़ केमिस्ट्री एंड बायोलॉजी’ नियुक्त किये गये। यहाँ पर शोध कार्य करते हुये प्रो. खुराना ने आनुवाँशिकी से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य किया। सन 2007 में वे सेवानिवृत्त हो गये। वर्तमान में वे एम.आई.टी में एमेरिटस प्रोफ़ेसर थे। 10 नवंबर 2011 को मेसाच्युसेट्स इंन्स्टीच्यूट ऑफ़ टेकनोलॉजी ने अपनी वेबसाइट पर घोषणा की कि रसायन शास्त्र और शरीर क्रिया विज्ञान के शिखरों में से एक प्रो. हर गोविन्द खुराना 9 नवंबर 2011, को हमें हमेशा के लिये छोड़कर चले गये। वे 89 वर्ष के थे और अंतिम समय तक छात्रों शोधकर्त्ताओं से लगातार मिलते रहे और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से लगातार जुड़े रहे। 
         प्रो. हर गोविन्द खुराना का सफ़र शून्य से शिखर तक का सफ़र कहा जा सकता है। ग़रीब परिवार में जन्मे हर गोविन्द ने अपने जिज्ञासु दिमाग की भूख मिटाने के लिये आजीवन संघर्ष किया और इसी संघर्ष से जीवन और जीवन के सूक्षतम नींव के पत्थर कोशिका और उसके अंगों और उपअंगों की क्रियाविधि के बारे में वैश्विक वैज्ञानिक परिवार और मानव की समझदारी विकसित हुई। 1953 में वॉटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. के दोहरी कुंडली जैसी संरचना के बारे में खोज की थी जिसके लिये वाटसन और क्रिक को भी नोबेल पुरस्कार मिला, लेकिन वे डी.एन.ए. से प्रोटीन की निर्माण प्रक्रिया और अन्य आनुवाँशिक और शारीरिक क्रियाविधियों में इसकी हिस्सेदारी के बारे में नहीं जानते थे। नीरेनबर्ग और खुराना ने पहली बार स्पष्ट किया कि कैसे न्यूक्लियोटाइड्स से बनी संरचना अमीनॊ अम्लों का निर्माण करते हैं जो कि  प्रोटीन का एक हिस्सा हैं। रसायनिक अभिक्रिया के ज़रिये प्रो.खुराना ने आर.एन.ए. में आनुवाँशिक कोडों की संरचना को स्पष्ट किया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने शोध कार्य सतत जारी रखा। 
       नोबेल मिलने के चार साल बाद उन्हें पूर्णतः कृत्रिम जीन का रसायनिक विधियों द्वारा निर्माण करने में सफ़लता प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने कई जीनों का कृत्रिम तरीकों से निर्माण किया जिनमें से दृष्टिदॊष से सम्बन्धित जीन रोडोस्पिन का कृत्रिम निर्माण प्रमुख था। इन खोजों का मूलभूत विज्ञान और औद्योगिक क्षेत्र में क्रान्ति ला दी। आनुवांशिकी में प्रो.खुराना की खोजें आज भी महत्वपूर्ण हैं, इनका इस्तेमाल मूलभूत विज्ञान से लेकर औद्योगिक क्षेत्र में लगातार हो रहा है। प्रो. खुराना एक सफ़ल शिक्षक भी थे, वे हमेशा छात्रों से घिरे रहते। उनके एक शोध छात्र माइकल स्मिथ को भी 1993  में डी.एन.ए. में फ़ेरबदल करने की तकनीक खोजने के लिये नोबेल पुरस्कार मिला है। विज्ञान और तकनीक के भविष्य और अनुप्रयोगों के सम्बन्ध में हमेशा गम्भीर रहते थे। उनके छात्र उन्हें एक उत्कृष्ट शिक्षक और हमेशा बेहतर शोध करने के लिये उत्साहवर्धन करने वाले अच्छे इंसान के रुप में याद करते है। समकालीन जनमत सरल व्यक्तित्व वाले महान वैज्ञानिक को श्रद्धाँजलि देते हुये, विज्ञान और तकनीक का आमजन के हित में इस्तेमाल के प्रो.खुराना के सपनों को याद करता है।
        समय के इस मोड़ पर प्रो. हरगोविन्द खुराना जैसे वैज्ञानिक को सिर्फ़ श्रद्धाँजलि देना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। इस पड़ाव पर थोड़ा ठहरकर यह भी सोचने की ज़रूरत है कि आज से 66 वर्ष पहले वे 1945 में आगे की पढाई के लिये इंग्लैण्ड गये थे, उस समय भारत में न तो बहुत अच्छे वैज्ञानिक शोध संस्थान थे न ही विभिन्न क्षेत्रों के सर्वोत्कृट वैज्ञानिक। ऐसी परिस्थितिओं में देश से अनगिनत मेधावी देश छोड़कर पढ़ाई करने विदेश गये और देश में संसाधनों के अभाव के कारण पुनः देश नहीं आये। देश की आज़ादी के छः दशकों के लम्बे समय के बाद आज ये विचारणीय प्रश्न है कि क्या आज भी हम पुरानी परिस्थितियाँ बदल पाये हैं? या आज भी हम देश में एक ऐसे संस्थान् की कल्पना मात्र कर रहे हैं जिसमें विश्व स्तर पर प्रभावित करने वाला शोध कार्य हो जिससे नोबेल जैसे पुरस्कार भी अपना गौरव बढ़ा सकें। आज़ादी के बाद, विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में से किसी एक में भी हम नोबेल पुरस्कार पाने में असफ़ल हुये हैं। ऐसे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारे देश की प्रतिभायें आज भी इन लक्ष्यों को दूर से देख पाने मात्र को मजबूर हैं।
प्रो. हर गोविन्द खुराना को श्रद्धाँजलि देने के साथ इस पर भी वैश्विक स्तर पर विचार होना आवश्यक है कि आज जब दुनियाँ के लगभग सभी देश विज्ञान और तकनीक के हर एक  खोज और परिणाम में सैनिक उपकरण और युद्ध में उपयोग की सम्भावनायें देख रहे हैं, ऐसी परिस्थितियों में अमेरिका में रहते हुये भी जहाँ की अर्थव्यवस्था ही युद्धक उपकरण बनाने के व्यापर से संचालित होती है, प्रो. हर गोविन्द खुराना ने अपनी आनुवाँशिकता और जैविक क्षेत्र की खोजों को सैनिक और रक्षा क्षेत्रों में उपयोग होने से बचाये रखा। वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के लिये यह एक चुनौती है जिसका सामना उन्हें स्वयं को वैज्ञानिक चुनौतियों से निबटने के साथ-साथ समानान्तर करने के लिये स्वयं को तैयार करना होगा।
        प्रो. हर गोविन्द खुराना के गुज़र जाने की खबर भारतीय मीडिया में तीन दिन बाद आयी। वह मीडिया जो स्वय़ं को सबसे तेज़ और समय से आगे का मीडिया कहा करता है, इस मीडिया को इस महान वैज्ञानिक के छोड़कर चले जाने की खबर से कॊई वास्ता नहीं दिखा। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि तमाम दोयम दर्ज़े  के मुद्दों की खबरों और बहसों से भारतीय मीडिया को फ़ुरसत नहीं थी।
      सच्चे अर्थों में इस महान वैज्ञानिक को श्रद्धाँजलि देना इसी तरह से संभव होगा जब हम उसके सपनॊं को पूरा करने के लिये स्वयं को तैयार कर पायेंगे। प्रो. हरगोविन्द खुराना अपनी महान खोजों के जरिये हमारे दिमागों में हमेशा रहेंगे।