Monday, February 13, 2012

Doomsday and Market of Phobia


-Meher Wan
  
           As we have entered in 2012, speculations about Doomsday are on full swing in common public to internet. The stories of doomsday got rebirth after the movie “2012” directed by Roland Emmerich, which was based on supposed uncontrolled devastation in 2012. This movie neither talks about the fictional planet “Nibiru” nor Polar shift of earth with appropriate clarity. Presently, there is much amount of material around us regarding doomsday-2012. You can find approximately 200 books dealing with doomsday on book-selling website ‘Amazon’. Many other websites are claiming of doing research for survival of mankind during doomsday crisis. News of this hoax is blossomed on every face of media and public.

       The saga began with the claims that a supposed planet ‘Nibiru’, which was discovered by the Sumerians of Mayan civilization, will collide with our earth in Dec, 2012. A controversial fiction writer Zecharia Sitchin writes about Sumer of the Mesopotamian civilization. He wrote in his many books (e.g. “The twelfth planet”), that he has found the strong evidences of planet ‘Nibiru’ in ancient Sumerian documents. Some so-called specialists of Mesopotamian civilization claim that the Mayan calendar will end in December 2012 and Mesopotamian people were aware of this doomsday. That was the main reason, they had calculated the days of their calendar till 2012 only. Some speculate that magnetic poles of earth will shift their position in Dec, 2012 and this will cause huge destruction. Till now, there are a number of theories regarding doomsday in 2012, which consists change in earth’s rotation axis, huge solar storms, alignment of sun with galactic center, black hole in galactic center, the dark rift in milky-way and many more. The limit was crossed when I read about end of life on earth due to global warming in 2012.
        There is nothing wrong in the fact that Mayan calendar will have so-called end in Dec, 2012. Mayan method of calculating the weeks and years was very hectic and tiring as it was a very long method. Neither had they advanced methods of arithmetic nor the computers as we have today. They could have calculated these spans of time with pen and papers. We can guess the complexity of these calculations by knowing, that in Mayan calendar one Alautun (Mayan unit of time) is equal to approximately twenty three billion days. All the calendars have a sort of periodicity in dates or in other parameters. Some experts and astronomers are saying that Mayans’ calendar system has cycles when their parameters match after a certain time, period of this cycle is 5128 years. Current cycle in Mayan calendar system was thought to have started in 3114 BC and it will end in 2012. According to this theory, the next cycle will end in 7140 AD. This is the point when hype overtakes reality.
         ‘Nibiru’ is a name in Babylonian astrology sometimes associated with the god Marduk. Nibiru appears as a minor character in the Babylonian creation poem Enuma Elish as recorded in the library of Assurbanipal, King of Assyria (668-627 BCE). Sumer flourished much earlier, from about the 23rd century to the 17th century BC. It is a supposed name of a hypothetical planet. Thousands of astronomers all over the globe with Hubble telescope in space are scanning the surroundings of earth with keen giant telescopes in visible, infrared and ultraviolet region. If this planet is to be collided with earth in Dec, 2012, this object should be in visible range of our giant telescopes from at least beginning of this year. If we consider the speculations that Nibiru is orbiting sun in every 3600 years, calculated speed of this object in its’ proposed orbit will be much less than speed of light. Thus, this should be seen by our telescopes spread all over the globe. Unfortunately, no object of this profile has been seen in any telescope till now. If any astronomer had seen it, he was supposed to publish his too much important finding related to whole life on earth.

            Magnetic Pole Shift Theory is also not possible in a very short period of time. This process may take some millions of years. Thus it will also not happen suddenly on proposed doomsday date 21-12-12. Similarly, with the laws of physics, rotation axis of earth will not be shifted suddenly in one day or even one month.  All these types of news are a hoax to create fear and anxiety in general public.
      
    The question is who are responsible for creating these types of hoax in the media, which create phobia and panic in public? Also, what are the benefits of creating these types of hoax? Movies are being released dealing with public fear about many topics from collapse of dams to doomsday. News channels are eager to sell phobia by showing breaking news and special reports with live coverage. A new type of market is evolving in the mean time and that is market of fear. After long sell of the dreams, sex etc, now it’s time to sell fear. I have seen some websites encouraging people to register for a lottery to those who will be saved during doomsday crisis. These websites are encouraging people to spend their money as nothing will remain after doomsday to enjoy or whatever people want without any question of right or wrong. Creating this sort of fake websites is a new advertising technique called “vi­ral marketing”, by analogy with computer viruses. We should understand that these types of hypes are reinforced by cheap market. The world will not end so quickly, it will go on with its direct and indirect contradictions.

Thursday, January 26, 2012

अमेरिकी इंटरनेट कानून और बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा का प्रश्न







           -मेहेर वान
         अमेरिका में ऑनलाइन दस्तावेजों की चोरी और अवैध नकल को रोकने सम्बन्धी कानून बनाने को लेकर शुरु हुये विवादों का कोई स्पष्ट निबटारा नहीं हो सका है। इस मुद्दे पर अमेरिकी मनोरंजन और फ़िल्म निर्माण सम्बन्धित उद्योगों के लोगों में एक धूमिल विभाजक रेखा उभर कर सामने आने लगी है। इन उद्योगों से जुड़े लोग इस विवाद में चाहे जिस ऒर हों, मगर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली आम जनता ने, अमेरिकी सरकार द्वारा प्रस्तावित ऑनलाइन दस्तावेज़ों की अवैध नकल और चोरी रोकने सम्बन्धी कानूनों का बड़े पैमाने पर विरोध किया है। अमेरिकी संसद में पास किये जाने के लिये प्रस्तावित “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम (SOPA)” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम (PIPA)” के विरोध में विश्व भर की जनता ने विरोध जताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का अधिनियम आने पर इंटरनेट पर स्वतंत्र इच्छाशक्ति और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की संकल्पना खत्म हो जायेगी।
         पिछले दिनों भारत में भी मानव संसाधन एवं विकास मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर राष्ट्रविरोधी और देश के खास वर्ग के लोगों में असंतोष और हिंसा भड़काने वाले वक्तब्यों को सार्वजनिक रूप से पोस्ट करने पर रोक लगाने के सम्बन्ध में बयान दिये गये थे। वस्तुतः ये बयान भी अमेरिकी संसद में बहस के लिये प्रस्तुत किये जाने वाले कानूनों से प्रभावित होकर दिये जाने वाले बयान कहे जा सकते हैं। इन बयानों के कारण कपिल सिब्बल को भी काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा था। ठीक यही अमेरिका के “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम” के साथ भी हुआ है। ये अधिनियम इंटरनेट पर बौद्धिक सम्पदा की सुरक्षा और ऑनलाइन दस्तावेज़ों की अवैध नकल रोकने के लिये बनाये जाने वाले थे। वस्तुतः इन अधिनियमों का प्रमुख निशाना अमेरिका के बाहर से संचालित होने वाली वे वेबसाइट्स हैं जिन पर फ़िल्मों और संगीत से लेकर अन्य बौद्धिक सम्पदा उपलब्ध है और इन इन वेबसाइट्स से फ़िल्में, संगीत आदि को बिना कोई भुगतान किये डाउनलोड किया जा सकता है। इस तरह से फ़िल्मों और संगीत से जुड़ी कई मनोरंजन कम्पनियों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ता है। अनेकों वेबसाइट्स पर टीवी चैनलों के कई रियालिटी शो और खेल प्रतियोगितायें अवैध तरीके से दिखाईं जाती हैं। इंटरनेट के ज़रिये इन्हीं अवैध तरीकों से पैसे कमाने पर रोक लगाने के लिये अमेरिकी सरकार, दो विधेयक संसद में बहस के लिये लाने वाली थी। लेकिन इन विधेयकों का स्वरूप कुछ इस तरह है कि इन विधेयकों के पास होने पर गूगल जैसे बड़े सर्च इंजन और फ़ेसबुक जैसी सोशल वेबसाइट्स भी सीधे तौर पर खतरे में पड़ जायेंगीं, जिन्होंने इंटरनेट को एक बड़े उद्योग के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
          इंटरनेट पर अवैध नकल रोकने और बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा के सम्बन्ध में पहले से ही कई नियम हैं। इन नियमों को ध्यान में रखते ही गूगल द्वारा संचालित वेबसाइट “यूट्यूब” पर पिछले वर्ष वीडियो हटाने सम्बन्धी लगभग पाँच लाख शिकायतें आयीं थी, गूगल के अनुसार जिनमें से वैध शिकायतों का निबटारा छैः घन्टे की समय सीमा के अन्दर किया गया था। इसी तरह संवैधानिक तरीके से निवेदन करने पर विभिन्न वेबसाइट्स को संचालित करने वाले सर्वरों द्वारा विवादित दस्तावेज़ वेबसाइट से हटा लिये जाते हैं। गूगल जैसे सर्च इंजन भी विवादित दस्तावेज़ों वाली वेबसाइट्स से न्यायालय के आदेश पर या संवैधानिक निवेदन पर सिर्फ़ विवादित दस्तावेज़ अदृश्य कर देते हैं। लेकिन “ऑनलाइन अवैध नकल रोधक अधिनियम” और “बौद्धिक सम्पदा सुरक्षा अधिनियम” में इस सम्बन्ध में बहुत ही कठोर दण्डों का प्रावधान है। इन अधिनियमों का सबसे कमज़ोर पक्ष यह है कि इन अधिनियमों में बहुत ही अस्पष्ट शब्दावली का प्रयोग किया गया है। जैसे कि अगर किसी वेबसाइट या सर्च इंजन पर कोई अवैध सामग्री पाई जाती है तो उसके खिलाफ़ कार्यवाई में पूरी वेबसाइट या सर्च इंजन के सर्वर को ब्लॉक यानि बन्द कर दिया जायेगा। यानि कि अगर फ़ेसबुक जैसी वेबसाइट पर कोई सामान्य उपभोक्ता आपत्तिजनक या अवैध सामग्री पोस्ट करता है तो पूरी फ़ेसबुक वेबसाइट का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। इन अधिनियमों में आपत्तिजनक सामग्री वाली वेबसाइट्स के बैंक एकाउँट और पेनपाल जैसी सुविधायें भी बन्द कर दिये जाने का प्रस्ताव है। इस तरह ये कानून इंटरनेट उद्योग की दशा और दिशा में अप्रत्याशित परिवर्तन करने वाले हैं, और अधिकतम परिवर्तन मुख्यतः नकारात्मक ही होंगे।
        पिछले दिनों तमाम वेबसाइट्स ने इन अधिनियमों के खिलाफ़ आवाज़ उठाई है। प्रसिद्ध गैर-लाभग्राही वेबसाइट विकीपीडिया ने 24 घंटों तक अपनी स्क्रीन काली रखी। गूगल और याहू समेत नौ तकनीक कम्पनियों ने अमेरिकी सरकार को पत्र लिखकर याद दिलाया कि 13 महत्वपूर्ण देशों की जीडीपी में 3.4 प्रतिशत योगदान इंटरनेट का होता है, जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में इंटरनेट का योगदान अन्य देशों की तुलना में सर्वाधिक है। गूगल और विकीपीडिया की मुहिम को विश्व भर में लाखों इंटरनेट उपभोक्ताओं का समर्थन मिला है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कानून,  अमेरिकी वेबसाइट्स को नुकसान पहुँचाये बिना, अमेरिका के बाहर की वेबसाइट्स को बन्द किये जाने  के लिये किये गये साफ़ सुथरे प्रयास हैं। वास्तव में, सिलिकन वेली के पास ’स्पॉटीफ़ाई’ और ’नेट्फ़्लिक्स’ जैसे भी कुछ सेवा प्रदान करने वाले प्रक्रम हैं, जो कि इस तरह के अधिनियमों के बिना इस गम्भीर समस्या पर काबू पा सकते हैं। सही मायनों में, इंटरनेट पर अवैध नकल और दस्तावेज़ों की चोरी की समस्या से निबटने के लिये इस उद्योग के रचनात्मक लोगों पर ही विश्वास किया जाना चाहिये कि वे नये उपक्रमों से ये अपराध कम कर पायेंगे। राजनीतिक नियमों और गुटबाज़ी से ये समस्यायें और जटिल होतीं चलीं जायेंगीं।

Thursday, December 15, 2011

आसक्ति और अनासक्ति के बीच बने राग का सूफ़ी: जगजीत सिंह


---मेहेर वान
          
 (हालांकि समय-यात्री आम तौर पर विज्ञान की दुनियाँ के सफ़र पर निकलता है, मगर उसे संगीत भी बहुत पसंद है| समय यात्री का एक हमसफ़र, एक दिन उससे अलविदा कह गया| उसी हमसफ़र को याद करते हुए- )
       




जगजीत सिंह की आवाज़ कब जिंदगी की हमसफ़र बन गयी, पता ही नहीं चला। कभी इसी आवाज़ को दादा के रेडियो और पापा के टेप-रिकॉर्डर पर सुना था। जब स्कूल में था तो जगजीत की ग़ज़लों के अर्थ अनबूझे से लगते थे, जिन्हें महसूस करने के लिये शायद न तो हमारे लिये उपयुक्त परिस्थितियाँ थी न हमारा संघर्ष उन भावनाओं और एहसासों से मेल खाता था। धीरे-धीरे समय के साथ अनुभव और एहसास बदलते गये, तो जगजीत सिंह की ग़ज़लें क़रीब आती गयीं। इसका कारण सिर्फ़ ग़ज़लों के बेहतरीन शब्द ही नहीं थे, जो मध्यवर्गीय संघर्ष और भावनाओं के ज्वार-भाटों को किनारा देते हुये प्रतीत होते थे। उन शब्दों को सुरों से सजाने वाली आवाज़ भी उतनी ही असरदार और अपनापे का एहसास कराने वाली थी कि जगजीत के चाहने वालों में उम्र का फ़र्क मिट जाता है। शायद यही कारण है कि, हर कोई अपने-अपने स्तर पर जगजीत की ग़ज़लों से जुड़ने का कारण तलाश लेता है। जगजीत सिंह ने ग़ज़ल गायिकी को उस समय एक नयी दिशा दी, जब ग़ज़लों के चाहने वाले लगातार कम हो रहे थे। ६० के दशक में ग़ज़ल गायिकी में शास्त्रीय संगीत का प्रभाव ज़्यादा था। उन्होंने ग़ज़ल गायिकी को परंपरागत संगीत और गायन से अलग करते हुये, उसमें पार्श्व संगीत का उपयुक्त समायोजन करते हुये नयी तरह से ग़ज़ल गाना शुरु किया। ग़ज़ल को सुगम और सुग्राह्य बनाने के लिये उन्होंने अपेक्षाकृत सरल शब्दों वाली रचनायें भी गायन के लिये चुनीं, उनका यह प्रयोग सफ़ल रहा और इससे आम लोगों में ग़ज़ल की पहुँच लगातार बढ़ती गयी।
             जगजीत सिंह का संगीत में बचपन से ही रुझान था और वे अपने पैतृक गाँव श्रीगंगा-नगर में पं०छगनलाल शर्मा से संगीत की शिक्षा लेना शुरु कर चुके थे। इसके बाद, महान गायक तानसेन के सैनिया घराना के गायक उस्ताद जमाल खान के यहाँ भी उन्होंने छः साल तक ठुमरी, खयाल ध्रुपद और भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की। संगीत की बारीकियाँ उन्होंने यहीं सीखीं। इसके साथ ही जगजीत सिंह ने इतिहास में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से परास्नातक की पढ़ाई भी की। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सूरजभान उनकी गायन प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने ही जगजीत सिंह को गायन में अपना कैरियर बनाने कि लिये प्रेरित करते हुये बम्बई जाने की सलाह दी थी। जगजीत सिंह, अपने परिवार में जीत सिंह के नाम से जाने जाते थे, और गायिकी की शुरुआत में वे जगमोहन के नाम से गाते थे, बाद में वे अपना नाम बदल कर जगजीत सिंह के नाम से गाने लगे। बम्बई में फ़िल्मों में पार्श्व गायन्के लिये आये थे मगर गायन के क्षेत्र में उनकी शुरुआत विज्ञापनों में गाये जाने वाले “जिंगल्स” से हुयी। सुरेश अमीन की गुज़राती फ़िल्म “धरती ना छोरू” में उन्हें सबसे पहले ब्रेक मिला। विज्ञापनों में जिंगल्स गाते हुये उनकी भेंट चित्रा सिंह से हुयी, चित्रा सिंह भी गायन से जुड़ी हुयीं थीं। बाद में इस जोड़ी ने कई बेहतरीन दिल को छू लेने वाली सुरीली धुनों से सजी गज़लों से भारतीय संगीत से नवाज़ा।
            १९७० का दौर नूर जहाँ, मल्लिका पुखराज, बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ, मेंहदी हसन, तलत मेहमूद, और बेग़म अख़्तर की ग़ज़ल गायिकी का दौर था। सन १९७६ में जगजीत सिंह ने अर्द्ध-शास्त्रीय भारतीय संगीत पर आधारित ग़ज़ल-संग्रह “द अन्फ़ोरगेटबल्स” के नाम से निकाला, जिसकी परंपरागत आलोचकों ने ग़ज़ल गायन की संरचना को बदलने के कारण काफ़ी निन्दा भी की। इसके बावजूद यह ग़ज़ल संग्रह अपनी धुनों के सुरीलेपन और जगजीत की ताज़ी मखमली आवाज के कारण जनता में काफ़ी पसन्द किया गया। इस संग्रह ने ग़ैर-फ़िल्मी संगीत के कैसेटों की बिक्री के कीर्तिमान स्थापित किये। १९८० के ही दशक में उनकी दो फ़िल्में आयीं- “अर्थ” और “साथ-साथ” जिसके गीतों से सुनने वालॊं को आज भी उतना ही प्यार है जितना कि उस दौर में था। इसके बाद जगजीत सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद उनके लगातार ग़ज़ल संग्रह आते रहे जिनमें उनका ग़ज़ल-चयन, धुन-निर्माण, और गायन शैली का संगम इतना बेमिसाल रहा कि संगीत के चाहने वालों ने उन्हें सर आँखों पर लिया। उनके प्रमुख संग्रहों में सर्च इनसाइट, मिराज, विज़न, कहकशाँ, लव इज़ ब्लाइंड, चिराग, मरासिम, फ़ेस टू फ़ेस, आइना, वादा, सहर , लम्हे और कोई बात चले आदि बेहद पसन्द किये गये। इनमें से १९९० के के पहले के लगभग सभी ग़ज़ल संग्रह उन्होंने चित्रा जी के साथ गाये। चित्रा जी के साथ उनका अंतिम संग्रह आया-  “समवन सम्व्हेयर” (कोई कहीं) और इसके बाद अपने इकलौते बेटे की असमय मौत के कारण चित्रा जी ने गायन से संन्यास ले लिया। इस के बाद लता मंगेशकर जी के साथ  उनका एक अल्बम आया “सजदा”, यह अल्बम बहुत ही सुरीली धुनों पर आधारित है और बहुत चर्चित भी हुआ। यहाँ उनके एक और अल्बम को याद करना ज़रूरी है। १९९० की शुरुआत में “बियॉन्ड टाइम” अल्बम आया जिसमें उन्होंने चित्रा जी के साथ गाया। यह अल्बम मल्टीट्रेक रिकॉर्डिंग तकनीक पर रिकॉर्ड हुआ था जो कि उस समय शायद भारतीय ग़ैर-फ़िल्मी गायकों की पहुँच से काफ़ी दूर था। इसमें प्रचलित सांगीतिक उपकरणॊं के सुरों के इतर भी कुछ आवाज़ें डाली गयीं थीं। जगजीत सिंह ने मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, क़तील शिफ़ाई, गुलज़ार और निदा फ़ाज़ली तक के समय के शायरों के कलामों को अपनी आवाज़ दी। उनकी गायी, बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़ल “लगता नहीं है दिल मेरा..” काफ़ी चर्चित हुयी थी। जगजीत सिंह के पंजाबी लोक संगीत में योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता।
               जगजीत सिंह की गायन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने ग़ज़ल को आम लोगों के स्तर तक उतारा, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने ग़ज़ल की गम्भीरता को वैसे ही बनाये रखा जैसे कि वह पहले थी। उन्होंने ग़ज़ल को सरल और सुगम और अधिक सुरीला तो बनाया ताकि जनता और बेहतरी से ग़ज़ल को समझ और महसूस कर सके, लेकिन ग़ज़ल गायिकी का सरलीकरण नहीं होने दिया। शायद यही प्रमुख कारण है जिसके लिये जगजीत सिंह लम्बे समय तक याद किये जायेंगे। ज़िंदगी की कठिन पहेली को समझने में आसक्ति और अनासक्ति के बीच बना जो सूफ़ियाना अंदाज़ होता है वह इस आवाज़ में न जाने कितनी रंगतों के साथ मुखर हो रहा था। “न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बन्धन..” जैसे शब्दों को हिन्दी फ़िल्मों के गानों में न जाने कितनी बार दोहराया गया है लेकिन जगजीत सिंह  की आवाज़ में ये गीत सुनने पर न जाने क्यों दिल की अन्तिम गहराइयों तक जाता है, दरअसल यह उनकी आवाज़ और उनके एहसास ही थी जो कि शब्दों को उनके बृहद अर्थ देते थे। यह बाद भी विचारणीय है कि तलत महमूद, किशोर कुमार, महेंद्र कपूर, हेमंत कुमार जैसे प्रभावशाली गायकों के होते हुये ७० और ८० के दशक में जगजीत का उदय कैसे हुआ? ये वह दौर था जब फ़िल्मी संगीत तेज़ी से बीट पर आधारित पश्चिमी संगीत से प्रभावित हो रहा था। गानों में शोर और कोलाहल से युक्त बीट वाला संगीत दिया जा रहा था। जगजीत सिंह की धुनों का सुरीलापन और माधुर्य तथा आवाज़ का मखमली अंदाज़ संगीत सुनने वालों को ऐसे समय में बेहतर विकल्प प्रदान करता था। जगजीत सिंह की आवाज़ शास्त्रीय और अर्द्ध-शास्त्रीय संगीत की परम्पराऒं से बंधी तो हुयी थी मगर अपनी मौलिकता भी लिये हुयी थी। उनकी सफ़लता का कारण शायद यही है कि उन्होंने शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत को बहुत ही करीने से साथ साधकर पेश किया। जगजीत सिंह ने ग़ज़लॊं का चयन भी बहुत बेहतर ढ़ंग के साथ किया। उनकी गायी ग़ज़लें हमेशा साधारण जीवन के संघर्षों के साथ-साथ चलती रहीं। शहरीकरण के दौर में गायी गयी ग़ज़ल ”ये शहर भी कितना अजीब है, न कोई दोस्त है न कोई रक़ीब है..” को याद कीजिये, ये वही समय था जब लोगों ने शहरों की तरफ़ भागना शुरु किया था। रोज़गार और नौकरी की तलाश में युवा शहरों की तरफ़ भाग रहे थे। ये युवा अपने घर-बार, गाँव, कस्बे छोड़कर शहरआकर आर्थिक रूप से अशक्त तो हो रहे थे लेकिन छूटते साँस्कृतिक संसार और बिखरते रिश्तों के अकेलेपन में ये ग़ज़लें उनकी तन्हाई और अकेलेपन में साथी बन रहीं थीं। “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो…” जैसी ग़ज़लॊं को अपने निराले अंदाज़ और एहसासॊं के समन्दर से बनी मखमली आवाज़ से सजाकर उन्होंने लोगों के संघर्ष और विजय-पराजय के दुखों-सुखों को किनारा दिया। जगजीत सिंह गायकी के साथ हमेशा प्रयोग करते रहे। टीवी सीरियल मिर्ज़ा ग़ालिब में नसीरुद्दीन शाह के बेहतरीन अभिनय और जगजीत की बेमिसाल गायकी से इस टीवी सीरियल में मिर्ज़ा ग़ालिब के चरित्र की जटिलतायें और बेहतर ढ़ंग से सामने आ सकीं। वस्तुतः, यह एक तरह की प्रयोगधर्मिता और नया करने की कोशिश भी थी जो जगजीत को अपने अन्य समकालीनों से अलग करती थी।   

         
         १० अक्टूबर, २०११ को यह महान संगीतज्ञ हमें छोड़कर विदा हो गया, लेकिन ज़िंदगी की घनी धूप में उनकी ग़ज़लें घना साया बनकर हमारे बीच हमेशा ज़िंदा रहेंगी। ये अलग बात है कि उनके जाने के बाद हमें ये आभास हो- “तुम  चले जाओगे तो हम सोचेंगे, हमने क्या खोया हमने क्या पाया…”।



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Friday, December 9, 2011

शून्य से शिखर तक के सफर का यात्री- हर गोविन्द खुराना


                                                                                                                -मेहेर बान
      बचपन में जीव विज्ञान की किताबों में जब कोशिकीय अंगों के बारे में शिक्षक पढ़ाया करते थे, तो तमाम आविष्कारकों की सूची में सिर्फ़ एक ही नाम होता था जो कुछ अपना सा लगता था। परीक्षा में लिखने के लिये, इस नाम को कभी रटने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हम तो बस इतने में ही खुश रहा करते थे कि विज्ञान के अटपटे नामों के अथाह समन्दर में से एक नाम अपना सा है, और वो नाम एक बहुत बड़े वैज्ञानिक का है। उस समय अध्यापक ने बताया था कि गिने-चुने भारतीय वैज्ञानिकों में से एक हर गोविन्द खुराना भी हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। तब हमें यह अन्दाज़ा भी नहीं था कि नोबेल पुरस्कार कितना बड़ा होता है, हमारे लिये तो यही बहुत आश्चर्य कई बात थी कि जो कोशिका हमें दिखाई तक नहीं देती, उसके अंगों के काम करने की प्रक्रिया के बारे में इतना कुछ ये वैज्ञानिक कैसे जान लेते थे। बहुत बाद में विज्ञान की पढ़ाई करने पर तमाम संशयों के धुन्ध में कुछ सत्य दिखाई देने लगे, तो हर गोविन्द खुराना जैसे वैज्ञानिकों का महत्व बेहतर समझ आने लगा। प्रो.हर गोविन्द खुराना ने कोशिकाओं के अन्दर आनुवाँशिक सूचनाऒं के प्रोटीन में पहुँचने की प्रक्रिया को पहली बार समझाया था। इसी प्रक्रिया के ज़रिये जीवित कोशिकाओं में अन्य प्रक्रियायें सुचारु रुप से सम्पन्न होती हैं। इस कार्य के लिये उन्हें शरीर क्रिया विज्ञान के क्षेत्र में दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। विज्ञान के क्षेत्र में वे प्रो.सी.वी.रमन और प्रो.चन्द्रशेखर के बाद भारतीय मूल के तीसरे वैज्ञानिक थे, जिन्हें अपने आविष्कारों के लिये नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
       प्रो. हर गोविंद खुराना का सफ़र अविभाजित भारत के पंजाब (जो कि अब पाकिस्तान में है) के एक छोटे से गाँव रायपुर से शुरु हुआ और दुनियाँ के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक संस्थानों में से एक मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेकनोलॉजी, अमेरिका तक पहुँचा। हर गोविन्द खुराना की वास्तविक जन्मतिथि मालूम नहीं है, स्कूल में नाम दर्ज़ कराते समय 9 जनवरी 1922 की तिथि उनके जन्मदिन के रुप में लिख दी गयी थी। वो चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे थे। बताते हैं कि उस समय इस गॉव में सिर्फ़ डॉ.हर गोविन्द का परिवार ही साक्षर था। वर्तमान पश्चिमी पंजाब के मुल्तान (पाकिस्तान) में डी.ए.वी. कॉलेज़ से हाईस्कूल की पढ़ाई करने के बाद, उन्होनें पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर से बी.एससी. और एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। बाद में अपने संस्मरणों में, वे अपने प्रारम्भिक शिक्षकों में से रतन लाल और महान सिंह को अक्सर अपने शैक्षिक जीवन के प्रकाश स्त्रोतों की तरह याद करते। 1945 में उन्हें इंग्लैंड में पढाई करने के लिये सरकारी वज़ीफ़ा प्राप्त हो गया। डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिये वे इंग्लैंड के लिवरपूल विश्वविद्यालय चले गये। वहाँ उन्होंने  प्रसिद्ध वैज्ञानिक रोज़र एस.बीर के निर्देशन में शोध कार्य शुरु किया। 1948-1949 में पोस्ट-डॉक्टोरल के लिये वे स्विट्ज़रलैंड आ गये जहाँ उन्होंने प्रोफ़ेसर व्लादिमीर प्रेलॉग के साथ काम किया, यही वो जगह थी जहाँ उन्होंने विज्ञान के प्रति नया नज़रिया मिला, जिसने उन्हें पूरा जीवन बिना थके हुये लगातार विज्ञान की सेवा की। 
         सन 1949 में कुछ समय के लिये वे भारत आये और 1950 में वे फिर सरकारी वज़ीफ़ा मिलने पर वापस इंग्लैंड चले गये, जहाँ उन्होंने कैम्ब्रिज़ विश्वविद्यालय में प्रो. ए.आर. टॉड के साथ काम किया, यहीं पर उनकी रुचि न्यूक्लियिक अम्लों और प्रोटीन्स में उत्पन्न हुयी। 1952 में उन्हें काउंसिल ऑफ़ ब्रिटिश कोलम्बिया, कनाडा से नौकरी का प्रस्ताव आया और वे कनाडा चले आये। 1952 में ही उन्होंने अपने स्विटज़रलैंड के समय की दोस्त ’एस्थर सिब्लर’ से शादी की। तत्पश्चात 1960 में वे आगे के शोध कार्य के लिये विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, अमेरिका चले आये। यहीं इंस्टीच्यूट ऑफ़ एन्जाइम्स रिसर्च में किये गये शोध कार्य के लिये उन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1966 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार कर ली और 1968 में उन्हें शरीर क्रिया विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रॊ. खुराना का शोधकार्य कभी बाधित नहीं हुआ, वे 1970 में मेसाच्युसेट्स इंस्टीच्य़ूट ऑफ़ टेकनोलॉजी में सम्मानित ’अल्फ़्रेड स्लोन प्रोफ़ेसर ऑफ़ केमिस्ट्री एंड बायोलॉजी’ नियुक्त किये गये। यहाँ पर शोध कार्य करते हुये प्रो. खुराना ने आनुवाँशिकी से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कार्य किया। सन 2007 में वे सेवानिवृत्त हो गये। वर्तमान में वे एम.आई.टी में एमेरिटस प्रोफ़ेसर थे। 10 नवंबर 2011 को मेसाच्युसेट्स इंन्स्टीच्यूट ऑफ़ टेकनोलॉजी ने अपनी वेबसाइट पर घोषणा की कि रसायन शास्त्र और शरीर क्रिया विज्ञान के शिखरों में से एक प्रो. हर गोविन्द खुराना 9 नवंबर 2011, को हमें हमेशा के लिये छोड़कर चले गये। वे 89 वर्ष के थे और अंतिम समय तक छात्रों शोधकर्त्ताओं से लगातार मिलते रहे और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया से लगातार जुड़े रहे। 
         प्रो. हर गोविन्द खुराना का सफ़र शून्य से शिखर तक का सफ़र कहा जा सकता है। ग़रीब परिवार में जन्मे हर गोविन्द ने अपने जिज्ञासु दिमाग की भूख मिटाने के लिये आजीवन संघर्ष किया और इसी संघर्ष से जीवन और जीवन के सूक्षतम नींव के पत्थर कोशिका और उसके अंगों और उपअंगों की क्रियाविधि के बारे में वैश्विक वैज्ञानिक परिवार और मानव की समझदारी विकसित हुई। 1953 में वॉटसन और क्रिक ने डी.एन.ए. के दोहरी कुंडली जैसी संरचना के बारे में खोज की थी जिसके लिये वाटसन और क्रिक को भी नोबेल पुरस्कार मिला, लेकिन वे डी.एन.ए. से प्रोटीन की निर्माण प्रक्रिया और अन्य आनुवाँशिक और शारीरिक क्रियाविधियों में इसकी हिस्सेदारी के बारे में नहीं जानते थे। नीरेनबर्ग और खुराना ने पहली बार स्पष्ट किया कि कैसे न्यूक्लियोटाइड्स से बनी संरचना अमीनॊ अम्लों का निर्माण करते हैं जो कि  प्रोटीन का एक हिस्सा हैं। रसायनिक अभिक्रिया के ज़रिये प्रो.खुराना ने आर.एन.ए. में आनुवाँशिक कोडों की संरचना को स्पष्ट किया। नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने शोध कार्य सतत जारी रखा। 
       नोबेल मिलने के चार साल बाद उन्हें पूर्णतः कृत्रिम जीन का रसायनिक विधियों द्वारा निर्माण करने में सफ़लता प्राप्त हुई। इसके बाद उन्होंने कई जीनों का कृत्रिम तरीकों से निर्माण किया जिनमें से दृष्टिदॊष से सम्बन्धित जीन रोडोस्पिन का कृत्रिम निर्माण प्रमुख था। इन खोजों का मूलभूत विज्ञान और औद्योगिक क्षेत्र में क्रान्ति ला दी। आनुवांशिकी में प्रो.खुराना की खोजें आज भी महत्वपूर्ण हैं, इनका इस्तेमाल मूलभूत विज्ञान से लेकर औद्योगिक क्षेत्र में लगातार हो रहा है। प्रो. खुराना एक सफ़ल शिक्षक भी थे, वे हमेशा छात्रों से घिरे रहते। उनके एक शोध छात्र माइकल स्मिथ को भी 1993  में डी.एन.ए. में फ़ेरबदल करने की तकनीक खोजने के लिये नोबेल पुरस्कार मिला है। विज्ञान और तकनीक के भविष्य और अनुप्रयोगों के सम्बन्ध में हमेशा गम्भीर रहते थे। उनके छात्र उन्हें एक उत्कृष्ट शिक्षक और हमेशा बेहतर शोध करने के लिये उत्साहवर्धन करने वाले अच्छे इंसान के रुप में याद करते है। समकालीन जनमत सरल व्यक्तित्व वाले महान वैज्ञानिक को श्रद्धाँजलि देते हुये, विज्ञान और तकनीक का आमजन के हित में इस्तेमाल के प्रो.खुराना के सपनों को याद करता है।
        समय के इस मोड़ पर प्रो. हरगोविन्द खुराना जैसे वैज्ञानिक को सिर्फ़ श्रद्धाँजलि देना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। इस पड़ाव पर थोड़ा ठहरकर यह भी सोचने की ज़रूरत है कि आज से 66 वर्ष पहले वे 1945 में आगे की पढाई के लिये इंग्लैण्ड गये थे, उस समय भारत में न तो बहुत अच्छे वैज्ञानिक शोध संस्थान थे न ही विभिन्न क्षेत्रों के सर्वोत्कृट वैज्ञानिक। ऐसी परिस्थितिओं में देश से अनगिनत मेधावी देश छोड़कर पढ़ाई करने विदेश गये और देश में संसाधनों के अभाव के कारण पुनः देश नहीं आये। देश की आज़ादी के छः दशकों के लम्बे समय के बाद आज ये विचारणीय प्रश्न है कि क्या आज भी हम पुरानी परिस्थितियाँ बदल पाये हैं? या आज भी हम देश में एक ऐसे संस्थान् की कल्पना मात्र कर रहे हैं जिसमें विश्व स्तर पर प्रभावित करने वाला शोध कार्य हो जिससे नोबेल जैसे पुरस्कार भी अपना गौरव बढ़ा सकें। आज़ादी के बाद, विज्ञान के तमाम क्षेत्रों में से किसी एक में भी हम नोबेल पुरस्कार पाने में असफ़ल हुये हैं। ऐसे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारे देश की प्रतिभायें आज भी इन लक्ष्यों को दूर से देख पाने मात्र को मजबूर हैं।
प्रो. हर गोविन्द खुराना को श्रद्धाँजलि देने के साथ इस पर भी वैश्विक स्तर पर विचार होना आवश्यक है कि आज जब दुनियाँ के लगभग सभी देश विज्ञान और तकनीक के हर एक  खोज और परिणाम में सैनिक उपकरण और युद्ध में उपयोग की सम्भावनायें देख रहे हैं, ऐसी परिस्थितियों में अमेरिका में रहते हुये भी जहाँ की अर्थव्यवस्था ही युद्धक उपकरण बनाने के व्यापर से संचालित होती है, प्रो. हर गोविन्द खुराना ने अपनी आनुवाँशिकता और जैविक क्षेत्र की खोजों को सैनिक और रक्षा क्षेत्रों में उपयोग होने से बचाये रखा। वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय के लिये यह एक चुनौती है जिसका सामना उन्हें स्वयं को वैज्ञानिक चुनौतियों से निबटने के साथ-साथ समानान्तर करने के लिये स्वयं को तैयार करना होगा।
        प्रो. हर गोविन्द खुराना के गुज़र जाने की खबर भारतीय मीडिया में तीन दिन बाद आयी। वह मीडिया जो स्वय़ं को सबसे तेज़ और समय से आगे का मीडिया कहा करता है, इस मीडिया को इस महान वैज्ञानिक के छोड़कर चले जाने की खबर से कॊई वास्ता नहीं दिखा। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि तमाम दोयम दर्ज़े  के मुद्दों की खबरों और बहसों से भारतीय मीडिया को फ़ुरसत नहीं थी।
      सच्चे अर्थों में इस महान वैज्ञानिक को श्रद्धाँजलि देना इसी तरह से संभव होगा जब हम उसके सपनॊं को पूरा करने के लिये स्वयं को तैयार कर पायेंगे। प्रो. हरगोविन्द खुराना अपनी महान खोजों के जरिये हमारे दिमागों में हमेशा रहेंगे। 

Thursday, November 3, 2011

Interview with Prof.Richard Ernst, Nobel Laureate in Chemistry




Prof. Richard R. Ernst is a well known researcher in the field of Nuclear Magnetic Resonance (NMR) Spectroscopy. Prof. Ernst Ernst was awarded the Nobel Prize in Chemistry in 1991 for his contributions towards the development of Fourier Transform nuclear magnetic resonance (FT-NMR) spectroscopy and the subsequent development of multi-dimensional NMR techniques. These underpin applications of NMR both to chemistry (NMR spectroscopy) and to medicine (MRI). He also received Louisa Gross Horwitz Prize in 1991.

Prof. Ernst was born 1933 in Winterthur, Switzerland. His father, Robert Ernst, was teaching as an architect at the technical high school of our city. At the age of 13, He found in the attic a case filled with chemicals and the journey began. After diploma as a "Diplomierter Ingenieur Chemiker" and some extensive military service, Ernst started a PhD thesis in the laboratory of Professor Günthard. Fortunately, he came in contact with a young and brilliant scientist Hans Primas, who never went through any formal studies but nevertheless acquired rapidly whatever he needed for his work that was then concerned with high resolution nuclear magnetic resonance (NMR), a field in its infancy at that time. After some years of work, he became interested in industry and joined Varian Associates in US. During last years at Varian (1966-68), he developed numerous computer applications in spectroscopy for automated experiments and improved data processing with his co-workers. He continued to work on methodological improvements of time-domain NMR with repetitive pulse experiments and Fourier double resonance. In addition, he with his coworkers performed the first pulsed time-domain chemically-induced dynamic nuclear polarization (CIDNP) experiments. In this way, He struggled with the NMR technique, which was about to die at that time and made this technique so profound, accurate and thus useful in medicine that now we are observing the applications of NMR spectroscopy in medicine as Magnetic Resonance Imaging (MRI), which is very important tool in imaging of internal parts of body.
Prof. Richard Ernst is now 78 years old, but very hopeful and energetic and careful towards new responsibilities. He has keen interest in Asian arts, music, and culture. He enjoys interactions with young researchers and motivating them for doing valuable work for the betterment of the society.
Recently Mr. Meher Wan, got opportunity to interact with Prof. Richard R. Ernst on his life and research work. Here are the excerpts of interaction.
First of all, I thank you Professor for accepting my request for your. I feel that your thoughts will motivate young minds to opt science as their career with social responsibility.
Meher Wan.    Your work was considered for Nobel in 1991. After receiving Nobel Prize for Chemistry, How your life has been changed? What type of relax or responsibility do you feel after this award?
Prof. Richard R. Ernst .My life changed very little! You know that our shadow follows us irrespective of superficial successes. I was always my biggest own hurdle to overcome. I had afterward even less time to relax. But indeed, my responsibility grew. I feel obliged to say what I think about our egomaniac course of doing business and structuring our personal lifes. I try to teach as much as I can, being aware that after all it will not help too much except for providing me better sleep.
MW.   Let me ask you about your days of childhood. How do you remember the childhood and boyhood days of Richard? How did you perform in your schools? Where did you study?
R. Ernst. I went to school in our city Winterthur. I was not a good student. I was constantly thinking how I could annoy my teachers. I was almost thrown our of high school. I mostly learned by myself, for example by doing chemical experiments in the basement of our house; and I survived and became a chemist!
MW.   A very curious violinist moved towards chemistry, remember that times for us.
R. Ernst. I had two passions in my youth: chemistry and music. I played the cello and I was composing music besides doing chemistry experiments. But surely, I selected the proper profession!
MW.    You state in your autobiography for website of Swedish Academy, “I was rapidly disappointed by the state of chemistry in the early fifties as it was taught.” I think, this is the trend of schooling of science in many countries till now. According to you what should be the mechanism of education for best understanding of subject by a student? 
R. Ernst. The best way of education is to evoke the curiosity of the students and then let them discover nature and the world themselves. Classroom teaching is absolutely useless, it just causes boredom.
MW.    When you started your Ph.D., what was in your mind? Did you want to serve the nation or industry or somewhat else?
R. Ernst. I wanted to become a respectable person who contributes something of value for mankind and gains respect in this way
MW.  Which quality of NMR spectroscopy impressed you, that you were motivated to invest your whole life for this field of science?
R. Ernst. I was not primarily interested in NMR, but I was thrown into NMR and I started to like it. This happens so often in life. We are not born mathematicians or biologists. But our interests grow accidentally by doing. And then you have to stay in a field until you have achieved something.
MW.  Let us know the journey for making of Fourier Transform NMR. What problems did you face for this work? Any interesting story related to this instrumentation. I read somewhere; the research paper related to this work was rejected two times.
R. Ernst. NMR suffered from very sensitivity and it was necessary to find a way to improve sensitivity. Parallel data acquisition was the solution. It led to Fourier transformation.
MW.   Which scientific goal do you still want to achieve?
R. Ernst. In the moment I am working on pigment analysis in Central Asian paintings in order to understand their origin and dating and for finding means of conservation. NMR is useless for this purpose and I am using Raman spectroscopy.
MW.   What phenomenons lead your group to think about 2D Fourier transform NMR spectroscopy?
R. Ernst. For determining molecular structures, one needs spatial relations between nuclei. A two-dimensional map may contain this type of information.
MW. Now Multi-dimensional spectroscopy is in existence, what do you hope about future of this field?
R. Ernst. I hope that it will find even more wide-spread application.
MW. Techniques developed by you and your group have very wide applications now in different fields of science, How do you feel about? Have you expected the wide range of application of these, when you started the work on it?
R. Ernst.  What could I ask for more? There is nothing better in life than to experience the "usefulness" of your "children"!
MW.   In your valuable life which thing you missed, and want to do?
R. Ernst. I hope to find more time to contemplate on the sense of our lives. I hope earnestly to be less disturbed by obnoxious journalists!!!
MW.   You have interest in culture and art of different continents, how do the arts of Tibet impress you?
R. Ernst. I like in particular the colorfulness and the visuality that allows an easy entrance across language barriers. It contains a wealth of immortal truths.
MW. You often talk about the responsibilities of researchers.
R. Ernst. The responsibility is more with academic teachers than with the researchers. anyway research is only a means of teaching and learning. Academic teachers are the only ones who can express what they think without the danger of losing the job, as politicians and merchants would. Thus they are obliged to take advantage of their privileged position.
MW. What do you want to convey to the young minds who want to opt science as their career? and to common public also.
R. Ernst. When ever you try to honestly evaluate the surroundings and our responsibilities to improve them for the sake of future generations, you are in the midst of scientific reasoning and it is not far of becoming a professional scientist, researcher and in particular a responsible teacher.
I am very grateful to you that you invested your precious time for us. I am studying your articles about science and society. Hoping for next conversation on society, science and cultures very soon. 

(This interview is published in 'Dream 2047' a bilingual magazine of Vigyan Prasar of DST, Govt of India, you can get it by clicking the link, you can read it in Hindi )

Sunday, October 30, 2011

दीवाली के बाद के संकट

                                             ----मेहेर वान


 दीपावली गुज़रते ही देश के विभिन्न शहरों से वायुप्रदूषण और ध्वनिप्रदूषण से जुड़ी खबरें आने लगीं हैं। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार दीपावली त्यौहार के बाद कोलकाता के वातावरण में हानिकारक गैस सल्फ़र डाई आक्साइड की मात्रा दो गुनी से भी अधिक मापी गयी है, कोलकता के कई अन्य स्थानों पर नाइट्रोजन डाई आक्साइड की मात्रा भी सामान्य से काफ़ी ऊपर पायी गयी है। वहीं वातावरण में हानिकारक पदार्थों के सूक्ष्म कणों की मात्रा भी सामान्य से तीन गुनी मापी गयी है। कोलकाता की संयुक्त कमिश्नर दमयन्ती सेन ने बताया कि दिवाली के दिन 713 व्यक्ति प्रतिबन्धित सीमा से ज़्यादा आवाज वाले पटाखे चलाते हुये गिरफ़्तार किये गये हैं और 883 किलोग्राम प्रतिबन्धित पटाखे बरामद किये गये हैं। इससे भी बुरा हाल चेन्नई का है, यहाँ के कुछ स्थानों पर वायु में हनिकारक पदार्थों के सूक्ष्म कणों की मात्रा सामान्य से चौदह गुनी मापी गयी है। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बॊर्ड ने इस साल कुछ विशेष स्थानों पर वायु और ध्वनि प्रदूषण मापक यंत्र लगाये थे जिनसे दीपावली के दिनों में पूरे समय प्रदूषण पर नज़र रखी गयी। दिल्ली समेत अन्य शहरों में भी वायु में हानिकारक गैसों और ज़हरीले सूक्ष्म कणॊं की मात्रा सामान्य से कई गुनी पायी गयी है। वातावरण में अचानक बढी हानिकारक और ज़हरीले पदार्थों की यह मात्रा सामान्य होने में काफ़ी समय लग जायेगा। इन दिनों में ये गैसें और अतिसूक्ष्म कण हमारी साँस के साथ फ़ेफ़ेड़ों में जाकर कई बीमारियाँ फ़ैला रहे हैं।

      आँकड़े बताते हैं कि शहरों में हर दिवाली के बाद अस्पतालों में साँस और श्वसन तंत्र से सम्बन्धित रोगियों की संख्या सामान्य से कई गुना अधिक हो जाती है, इसके साथ ही बच्चों में आँखों से जुड़ी समस्यायें भी दीपावली के वायुप्रदूषण के कारण बढ़ जातीं हैं। शहरों में अधिक आबादी घनत्व होने के कारण पहले से ही वायुप्रदूषण सामान्य मानकों से अधिक होता है। दीवाली में तेज़ आवाज़ वाले, हानिकारक पदार्थों से बने पटाखों और फ़ुलझड़ियों के कारण प्रदूषण की समस्या और भी भयानक हो जाती है। ये पटाखे निर्माण से लेकर प्रयोग होने तक ज़बर्दस्त तरीके से प्रदूषण फ़ैलाते हैं।
      दीवाली पर इस्तेमाल होने वाले पटाखे और फ़ुलझड़ियाँ बनाने में जिन पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है वे पदार्थ बहुत ही हानिकारक होते हैं, इनमें से अधिकतर पदार्थ ज़हरीले भी होते हैं। पटाखे फ़ोड़ने पर उत्सर्जित होने वाले पदार्थों में ताँबा, कैडमियम, लैड, मैग्नीशियम, सोडियम, ज़िंक, पोटेशियम समेत सल्फ़र डाई ऑक्साइड, नाइट्रिक ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें प्रमुख हैं। कॉपर यानि ताँबा के अतिसूक्ष्म कण हमारी साँस की नली में तेज़ जलन पैदा करते हैं। कैडमियम एक ज़हरीला पदार्थ है और यह किडनी को गन्भीर नुकसान पहुंचा सकता है। अत्यधिक मात्रा में कैडमियम शरीर में जाने से से उच्च रक्त दाब की शिकायत हो सकती है। पटाखों के निर्माण में लैड का उपयोग आवश्यक रुप से होता है। शायद बहुत कम लोगों को जानकारी हो कि लैड मानवों के केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र पर आक्रमण करता है, सामान्य से अधिक मात्रा में शरीर में जाने से कैंसर होने का खतरा भी रहता है। पटाखों से निकलने वाली गैसें भी वातावरण में प्रदूषण उत्पना करतीं हैं और साँस से रोग फ़ैलाने में सहायक होतीं हैं। जो मज़दूर इनकी सहायता से पटाखों का निर्माण करते हैं उन्हें इनसे होने वाली हानियों के बारे में जानकारी नहीं होती, और वे अपने शरीरों को गम्भीर नुकसान पहुँचाते हैं। इस प्रदूषण से छोटे बच्चों को सबसे अधिक मुश्किल होती है, बहुत से बच्चों को इन ज़हरीले सूक्ष्म कणों के आँखों में जाने से आँखों की समस्यायें बचपन मे ही शुरु हो जाती हैं।
  सन 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने त्यौहारों पर पटाखों और फ़ुलझड़ियों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण पर सख्त निर्देश दिये थे। जिनमें पटाखों की अधिकतम आवाज़ और निर्माण में प्रयुक्त होने वाले तत्वों के सम्बन्ध में मानक निर्धारित किये गये थे। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के मानकों के अनुसार पटाखों से होने वाली अधिकतम आवाज़ पटाखे से 4 मीटर दूरी पर 125 डेसीबल से अधिक नहीं होनी चाहिये। अलग-अलग सर्वे के अनुसार कहा जाता है कि अस्सी प्रतिशत पटाखे मानकॊं पर खरे नहीं उतरते। यही पटाखे हम अपने क्षणिक आनन्द के लिये इस्तेमाल करते हैं, मगर यह नहीं सोचते कि यह हमारे लिये कितने नुकसानदायक है। हमें इनसे होने वाले नुकसानों का इसलिये भी पता नहीं चलता क्यों कि थॊड़ी से सावधानी बरत कर हम अपने आप को सिर्फ़ जलने से बचाकर यह महसूस करते है कि अब हमें पटाखों से कॊई नुकसान नहीं है। लेकिन दीवाली के बाद अगर आपको साँस और आंखों से सम्बन्धित कॊई शिकायत अचानक होती है तो इसमें पटाखों का योगदान प्रमुख होता है।

Friday, October 28, 2011

जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के साथ छेड़छाड़

--मेहेर वान


 
कुछ दिनों पहले अमेरिका में वैज्ञानिकों, अवकाश प्राप्त सरकारी अफ़सरों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के एक पैनल ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सरकारों से कुछ ठोस कदम उठाने की सिफ़ारिश की। इस पैनल का मानना है कि पर्यावरण सुधार के लिये अब कुछ क्रांतिकारी तरीकों का इस्तेमाल होना चाहिये। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और यह बात तय हो चुकी है कि इसकी प्रमुख ज़िम्मेदार कार्बन डाई ऑक्साइड गैस है। कार्बन डाई ऑक्साइड गैस सूरज से आ रही गरमी को अपने अंदर सोख लेती है। पृथ्वी पर इस गैस की मात्रा वनॊं के जलने, बड़ी मात्रा में यातायात और जनसंख्या बढ़ने से लगातार बढ़ रही है। इस कारण पृथ्वी के वातावरण में गरमी सोखने की क्षमता भी लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि धरती गर्म हो रही है और वैश्विक तापन की विभीषिका से विश्व जूझ रहा है।
अमेरिका में वाशिंगटन स्थित ’बाईपार्टीसन शोध केन्द्र’ के इस दल ने सरकारों को सुझाव दिया है कि  वे अपने अपने देशों में पर्यावरण सुधार के लिये अतिवादी इंजीनियरिंग और तकनीक के विकास और क्रियान्वयन के लिये वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करें। एक समय तक ऐसा कहा जाता था कि अंतरिक्ष में सूरज से आ रही गर्मी को वापस अंतरिक्ष में भेजने के लिये बड़े-बड़े परावर्तक शीशे लगाने और वातावरण से कार्बन डाई ऑक्साइड को पृथक करके कहीं इकट्ठा करके ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने और पृथ्वी को ठंडा करने की नौबत कभी नहीं आयेगी। न ही कभी धरती को हमारे रहने लायक बनाये रखने के लिये, धरती की सतह पर सूक्ष्म कणों को तितर-बितर करने और भूगर्भ-अभियान्त्रिकी जैसी कठिन और अत्याधिक मंहगी तकनीकों का सहारा करना पड़ेगा। लेकिन वैज्ञानिकों, अफ़सरों और राजनयिकों के 18 सदस्यों वाले दल के अनुसार अब इन अतिवादी तकनीकों का उपयोग शुरु कर देना चाहिये।
समूचे पृथ्वी ग्रह को अतिवादी कृत्रिम ढ़ंगों से अपने अनुसार बदलने को कुछ लोग अचम्भित कर देने वाला मानते हैं। इसी दल के एक सदस्य, हार्वर्ड और कैलगैरी विश्वविद्यालय के डेविड कीथ भी इसे अचम्भित करने वाला निर्णय मानते हैं। लारेन्स लिवरमोर नेशनल लैब की उपनिदेशक और इस दल की उप-प्रमुख  जेन लोंग इसे सामान्य मानतीं हैं वह कहती हैं कि मानव ने तेजी से बड़ी मात्रा में वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस उत्सर्जित करके धरती से पहले ही खतरनाक छेड़छाड़ की है। उनके अनुसार अब हम इसे नज़रअंदाज़ करते हुये आगे नहीं बढ़ सकते। यह बात और है कि इस तरह की कृत्रिम छेड़्छाड़ हम अचानक कर रहे हैं और पृथ्वी इस छेड़छाड़ से परिचित नहीं है। वहीं, कुछ पर्यावरणविद इस तरह के निर्णयों को भ्रमित और खतरनाक मानते हैं।
पर्यावरण तापन से निबटने के लिये प्रयोग में लायी जाने वाली तथाकथित अतिवादी तकनीकों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। पहली तकनीक के अंतर्गत पृथ्वी पर अत्यधिक मात्रा में उत्सर्जित होने वाली ग्रीन हाउस गैस -कार्बन डाई ऑक्साइड को वातावरण से अलग करके बड़े बड़े पाइपों द्वारा भूगर्भ में इकट्ठा कर दिया जाये। इस तरह का भंडारण धरती के उन हिस्सों में किया जाता है जहाँ भूगर्भ में “बासाल्ट” नामक पदार्थ की चट्टानें होती हैं। ये चट्टानें कार्बन युक्त गैस से रासायनिक क्रिया करके चूना पत्थर में बदल जाती हैं। यह प्रक्रिया प्राकृतिक प्रकिया से एकदम मिलती जुलती है। अतः इस प्रयोग से भविष्य में बहुत बड़ी हानि या खतरे महसूस नहीं होते। यह कहना है स्टेन्फ़ोर्ड विश्वविद्यालय की पर्यावरणविद ’डॉ. केन काल्डेरिया’ का। आइसलैंड के ज्वालामुखी प्रभावित इलाके में वैज्ञानिकों की अंतर्राष्ट्रीय टीम इस तरह के कुछ प्रयोग ’कार्बफ़िक्स’ नाम से शुरु करने वाली है। जिसके तहत ज्वालामुखी के विस्फ़ोट से निकलने वाली गैसों से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को अलग करके लम्बे पाइपों द्वारा भूगर्भ में उस स्थान पर भंडारित कर दिया जायेगा, जहाँ भूगर्भ में बासाल्ट पत्थर की चट्टानें हैं। ये बासाल्ट की चट्टानें गैस के कार्बन से रासायनिक अभिक्रिया करके चूना पत्थर बना देंगीं जो कि भविष्य में पूर्णतः हानिरहित होगा। इस तरह कार्बन उत्सर्जन को शून्य के स्तर लाने की योजना है।  
पर्यावरण सुधार से जुड़ी प्रस्तावित अतिवादी तकनीकों में से दूसरे प्रकार की तकनीकें विवादों के घेरे में हैं। इन तकनीकों में से एक तकनीक है, पृथ्वी के वातावरण के ऊपरी हिस्से में बड़े-बड़े परावर्तक शीशे लगाना। जिससे सूरज से आ रहा प्रकाश और गरमी इन विशालकाय शीशों से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में चली जाये। इसके साथ ही यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि वातावरण में ऐसे सूक्ष्म कण कृत्रिम रूप से बिखेर दिये जायें जो कि प्रकाश के साथ आ रही गरमी को परावर्तित करें। इन्हीं तकनीकों में से एक है, कृत्रिम विधि से समुद्र में वाष्पन करके अधिक मात्रा में बादलों का निर्माण करना ताकि पृथ्वी को इन बादलों से ढ़ंका जा सके। इससे धरती ठंडी रहेगी और इसे वैश्विक तापन से बचाया जा सकेगा। मगर दूसरे प्रकार की ये सभी तकनीकें पृथ्वी की प्राकृतिक प्रकियाओं पर गम्भीर असर डाल सकतीं हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन अतिवादी कृत्रिम तकनीकों के प्रयोग से घरती के आंतरिक तंत्र में गड़बड़ी आ सकती है क्योंकि ज़रूरी नहीं है कि धरती इस तरह के बदलावों के लिये तैयार हो। अमेरिकी विकास केंद्र के ’जोइ रोम’ का मानना भी यही है। उनके अनुसार वैज्ञानिकों, अफ़सरों और राजनेताओं के इस पैनल को इस तरह की अतिवादी कृत्रिम तकनीकॊं के तत्कालीन उपयोग के मशविरों को तुरन्त वापस ले लेना चाहिये। धरती के साथ इस तरह के प्रयोग अभी बहुत ही खतरनाक साबित हो सकते हैं क्योंकि इन प्रयोगों के परिणामों के बारे में अभी कोई भी कुछ नहीं जानता। वैज्ञानिक इन तकनीकों के विस्तृत परिणाम खोजने के के बाद ही इनका उपयोग बड़े पैमाने पर करने के पक्ष में हैं, ताकि कोई बड़ी समस्या का सामना न करना पड़े।